बेनाम रिश्ता

बेनाम रिश्ता .....

     हम कॉलेज में कहीं दफा मिल चुके थे। कभी कैंटीन में, कभी कैंपस में, कभी कॉरिडोर में, कभी क्लास रूम में। यह बात मुझे आज तक समझ नहीं आई कि उसका सब्जेक्ट अलग था और मेरा सब्जेक्ट अलग था, फिर भी हम दोनों कॉलेज में कहीं ना कहीं मिल ही जाते थे। अलबत्ता इसमें भगवान की मर्जी हो। हम दोनों अभी तक इस रिश्ते को कोई नाम नहीं दे पाए थे और शायद देना भी नहीं चाह रहे थे। ना उसने कभी दोस्ती का हाथ बढ़ाया ना मैंने कभी बढ़ाया और बात भी सही है अगर कोई रिश्ता बेनाम ही अच्छा चल रहा है तो क्यों उस रिश्ते को नाम देकर हम बिगाड़ दे। मुझे यह रिश्ता बेनाम ही अच्छा लग रहा था और मैं इसे जीता रहा।
     मुझे कॉलेज के कामों से कभी कभी ही फुर्सत मिलती थी। मैं हर वक्त व्यस्त रहता था। आज लेक्चर दोपहर का था। काफ़ी दिन हो गए थे तारा से मिले हुए। तकरीबन एक महीने से ऊपर। इम्तिहान का जोर था लिहाज़ा तारा भी अपनी स्टडी में मसरूफ थी और में भी। मैंने लेक्चर खत्म होने के बाद, वॉट्सएप पर तारा को मेसेज किया।
     "Hi taara, aaj marine lines chale kya?"
     तकरीबन पांच मिनट के बाद तारा का मेसेज आया।
     "Haa chalte hai na, vaise bhi mujhe bahoot boaring lag raha hai".
     "Timing bata do".
     "5 baje chalte hai. Marine lines par shaam ko hi accha lagta hai or haa ham pahle girgaon chowpatty chalenge, phir waha se marine lines".
     "Thik hai".
     मेरे दोस्तो ने लास्ट टाइम बताया था कि अगर शांति चाहिए तो मरीन लाइन्स चला जा। पिछले दो सालों से मैं मरीन लाइन्स नहीं गया था। आज यूहीं मन किया तो सोचा मरीन जाता हूं और साथ में तारा को भी ले जाता हूं। मुझे थोड़ा डर भी था कि कहीं तारा मना ना कर दे लेकिन उसकी ओर से हां कर देना मुझे अच्छा लगा।
     सभी लेक्चर पांच बजे समाप्त हो गए थे। हम दोनों काफी दिनों बाद मिल रहे थे। कॉलेज के कैंपस में तारा मेरा इंतजार कर रही थी। हम दोनों ने फास्ट नोकल पकड़ी। नोकल का यह सफर हमने बातों से नहीं बल्कि आंखो ही आंखो में तय कर लिया था। मरीन लाइन स्टेशन आ चुका था। दो साल के बाद भी यह जगह मुझे वैसी ही दिख रही थी जैसे पहले दिखती थी। वहीं मस्तानी सी शाम, ठंडी हवा का आना जाना और सूरज का बालपन में लौट जाना।
     तारा और मैं गिरगांव चौपाटी की ओर जाने लगे। न जाने मुझे ऐसा लग रहा था जैसे सब मुझे ही देख रहे है। तारा मानो आज स्वतंत्र हो गई थी। हम अब गिरगांव चौपाटी की रेत पर चल रहे थे। सूरज अभी डूबने की तैयारी में नहीं था। उसे अभी पूर्ण रूप से केसरिया रंग का होने में वक्त था। तारा मरीन ड्राइव पर बैठकर सूरज को डूबते हुए देखना चाहती थी शायद यही कारण है कि तारा मुझे पहले गिरगांव चौपाटी ले आई ताकि मरीन पहुंचते पहुंचते अच्छी शाम हो जाए। 
     हम दोनों गिरगांव चौपाटी के तट पर चलने लगे। तारा ने अपने जूते उतार दिये और हाथ में ले लिये। उसने मुझे भी जूते उतारने को कहा। मैंने भी अपने जूते उतार दिये और एक हाथ में पकड़ लिये। समुंदर का ठंडा ठंडा पानी हम दोनों के पैरो को छूकर वापस जा रहा था। पानी का इस तरह से हमारे पैरो को छूना, हम दोनों को बड़ा आनंदित कर रहा था। मानो कोई छोटा सा बालक हमारे पैरो पर हाथ फेर रहा हो। हम दोनों की बातें जारी थी। अचानक मेरा ध्यान मेरे राइट हैंड पर गया, जो तारा के कंधे पर था। यह हाथ कब तारा के कंधे पर पहुंचा इसका मुझे पता नहीं। शायद तारा की बातों ने और इस खुबसुरत नज़ारे ने मुझे यह याद ही नहीं रखने दिया कि ये हाथ कब उसके कंधे पर गया। तारा ने भी इसके बारे में कुछ नहीं बोला। अब मुझे पता होते हुए भी मैं तारा के कंधे से हाथ नहीं हटा पा रहा हूं। तारा ने अपने फोन में स्नैपचैट ओपन किया और सेल्फी लेने लगी। सेल्फी लेते वक्त तारा ने भी हर लड़की की तरह अपना कर्तव्य समझकर वैसा ही मुंह बनाकर सेल्फी ली जैसे हर लड़की लेती है। उस सेल्फी में मैं भी था, मगर मेरा मुंह नॉर्मल था। सेल्फी लेने के बाद हम दोनों का फिर चलना शुरू हुआ। हम दोनों सारी चिंताएं, उदासी, दुःख पीछे छोड़ते जा रहे थे। हमारे द्वारा पीछे छोड़े गए पैरो के निशान पानी में मिल जा रहे थे, मगर हमने पीछे का कुछ नहीं सोचा बस आगे पाव बढ़ाते गए, वो भी साथ-साथ में।
     चलते चलते मरीन लाईन नजदीक आ गया था और साथ ही साथ सूरज केसरिया रंग का होकर डूबने को बेकरार था। हम दोनों मरीन लाईन पर बैठ गए। हमारे पीछे एक अंकल चाय बेच रहे थे। मैंने दो कप चाय ले ली। तारा ने चाय की घूटक लेने से पहले मॉडर्न जेनरेशन का कर्तव्य निभाते हुए उसने उन दोनों कपो का फोटो लिया और इंस्टाग्राम पर स्टोरी डाल दी। उसने इस स्टोरी में मुझे भी मेशन कर किया। मेंशन करते हुए उसने लिखा- Evening tea with Ravindra at Marine lines.
     तारा ने चाय की एक घूटक लेने के बाद कहा -
     "आज अचानक यहां आने का मन कैसे किया?"
     मैंने भी एक घूटक लेने के बाद और डुबते सूरज को देखने के बाद कहा -
     "कोई ठोस कारण तो नहीं है, बस ऐसे ही। बहुत दिनों से कहीं घुमा नहीं, आज मन किया तो सोचा क्यों ना तुम्हे भी बता दू।"
     तारा ने मुस्कुराते हुए कहा -
     "हम्म, वैसे अच्छा किया जो मुझे बता दिया। मैं भी रोज कॉलेज आना और जाना इससे बोर हो गई थी।"
     तारा के लहराते हुए बाल, उसकी जुल्फे हवा का बहाना लेकर मेरे कंधे पर बैठी जा रही थी। तारा ने आसिम प्रयत्न किया अपने बालों को रोकने के लिए। तारा अपने बालों को कहीं दफा कान के पीछे ढकेल चुकी थी फिर भी जुल्फे उड़कर मेरे कंधो पर बैठ रही थी।
     "गाना सुनोगे?"- तारा ने एक इयरबड्स मुझे देते हुए कहा।
     मेरी इच्छा तो नहीं थी गाना सुनने की मगर मैंने इयरबड्ज ले लिया और राइट इयर में लगा दिया। तारा वक्त और रिश्ते के हिसाब से सही गाना सुन रही थी। गाने के लिरक्स मुझे भा गए। ऐसा लगा जैसे गीतकार ने यह गाना हमारे लिए ही लिखा हो। गाने के बोल कुछ ऐसे थे-
     "बेनाम रिश्ता वो
     बेचैन करता जो
     हो ना सके जो बयां
     दरमियान"
     रात हो चुकी थी। मरीन लाईन पर एक कतार में लाइटे चमक रही थी। बातों का सिलसिला जारी था। ना मैं बात करते हुए थक रहा था ना तारा। ना तारा घर चलने को कह रही थी ना मैं। बड़ा सुकून सा लग रहा था। इस तरह के रिश्ते भी अगर इतना सुकून और खुशी दे सकते है तो फिर यह रिश्ते सही है। इस रिश्ते को किसी भी नाम की जरूरत है ऐसा मुझे तो नहीं लगता। मैं इस रिश्ते को बेनाम ही रखना चाहता हूं ताकि यह इसी तरह बरकरार रहे।



रविंद्र मुंडेतिया .....

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