सवाल भी मैं और जवाब भी मैं




नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर 
घर का रस्ता भूल गया
क्या है तेरा ? क्या है मेरा ?
अपना पराया भूल गया। 

( बस में बहुत भीड़ हो चुकी थी। मैं खिड़की के पास वाली सीट पर बैठा था। मेरी नज़र अचानक उसपर पड़ी जिसे मैं पिछले कुछ दिनों से देख रहा था। पांच फुट का आदमी लंबा सा ट्रेंच कोर्ट पहना। वो मेरी ओर पीठ किए खड़ा था। वो पिछले कुछ दिनों से रोज यही खड़ा रहता है। मूर्ति सा। ना हिलता है और न ही कही जाता है। मैंने अपने क़रीब बैठे आदमी से उसके बारे में पूछा। उसका जवाब सुन मेरे होश उड़ गए। उसका जवाब था कि मुझे तो वहां कोई आदमी नहीं दिखाई दे रहा है। मैंने आगे की सीट पर बैठे एक व्यक्ति से यही सवाल फिर पूछा, तो उसने भी कुछ ऐसा ही जवाब मुझे फिर दिया। बड़ी अजीब बात है। ये लोग इसे देख क्यों नहीं पा रहे ? 
 
कॉलेज से निकलते वक्त फिर वही आदमी मुझे दिखाई दिया। इस बार भी वो मेरी ओर पीठ किए खड़ा था। मूर्ति सा। दोनों हाथ पीछे किए खड़ा था। वो मेरी ओर मुँह करके क्यों नहीं खड़ा होता। मैंने अपने दोस्त से उसके बारे में पूछा। दोस्त ने कहा वहां कोई ऐसा व्यक्ति नहीं खड़ा है। दोस्त ने मुझे चश्मा बदलने की सलाह दी। उसके लिए ये मज़ाक था लेकिन मेरे लिए नहीं। 

कॉलेज से जल्दी फ्री होकर ऑफिस के लिए निकल गया। मैं लोकल ट्रेन के जिस कोच में सफर कर रहा था वहाँ मुझे वो आदमी फिर दिखा। कुछ भी अंतर नहीं। ट्रेंच कोर्ट पहना हुआ। हाथ पीछे करके खड़ा हुआ। स्टेशन आने पर मैं तो उतर गया लेकिन वो अभी भी वैसा ही खड़ा था। 

मैंने सोचा शायद अभी वो नहीं दिखेगा लेकिन मेट्रो की खिड़की से मैंने उसे फिर देखा। वो शायद दूसरी मेट्रो का इंतज़ार कर रहा था। वो फ़िर उसी मुद्रा में खड़ा था। ट्रेंच कोर्ट पहना हुआ। इस बार दोनों हाथ कोर्ट की जेब में डाले हुए था और वो काले जूते पहना हुआ था। मेट्रो अपनी रफ़्तार में चल दी और वो आदमी उसी रफ़्तार से पीछे छूट गया। 

ऑफिस में कंप्यूटर स्क्रीन पर दिन बिताने के बाद सर में दर्द सा होने लगा था। सर भारी - भारी हो चुका था। मैंने बैग में से सिर दर्द की गोली निकाली और ले ली। ऑफिस के टी बॉय को बुलाया और उसे चाय के लिए बोला। कुछ ही मिनटों में चाय डेस्क पर थी। चाय की चुस्कियाँ ले ही रहा था कि केबिन के बाहर से वो ही ट्रेंच कोर्ट पहना हुआ आदमी गुज़रा। मिडल से केबिन का डोर ब्लॉरिश था लेकिन नीचे से उसके जूते साफ़ साफ़ दिखे क्योंकि नीचे से डोर बिल्कुल पारदर्शी था। मैंने चाय की चुस्की झट से ली और डोर ओपन करके उसी दिशा में देखा जिस ओर वो गया था लेकिन वहाँ तो कोई नहीं था। वहाँ तो बस टी बॉय बैठा था। टी बॉय ने फिर चाय के लिए पूछा लेकिन मैंने मना कर दिया। मैंने टी बॉय से उस आदमी के बारे में पूछा। उसने कहा कि यहाँ से ऐसा कोई आदमी नहीं गुज़रा सर। मैंने पूछा श्योर हो ? उसने कहा बिल्कुल सर। मैं वापस केबिन में जा बैठा। 

ऑफिस से लॉग आउट करके निकलते वक्त मेरी नजरों में वो आदमी फिर क़ैद हुआ। ऑफिस के गलियारे में वो सबसे अंत में खड़ा था। अब की बार मैंने हिम्मत करके उसकी ओर क़दम बढ़ाए। मैं क़दम बढ़ा रहा था। अचानक मेरे फोन की रिंग बजी। मैंने कॉल उठाया। सामने से किसी की आवाज़ नहीं आ रहीं थी। लेकिन ये क्या ? वो आदमी कहाँ चला गया ? मुझे उससे बात करनी थी। आखिर वो है कौन ?  

"मेरे पीछे इन दिनों एक परछाई पड़ी हुई है। न जाने किसकी है। लंबा सा ट्रेंच कोर्ट पहना रहता है। आंखों पर उसके चश्मा रहता है। मैं नज़दीक जाता हूँ तो वो गायब हो जाता है। क्या ये सिर्फ़ मुझे ही दिखाई देता है ? बाकी सभी लोग उसकी ओर देख क्यों नहीं देखते ? वो मेरी ओर पीठ किए खड़ा रहता है। मैं उसका चेहरा भी देख नहीं पाता हूँ। वो मेरा पीछा कर रहा है या मैं उसका पीछा कर रहा हूँ। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। इतनी भीड़ में भी मेरी नजरें उसपर जा टिकती है। वो मुझे इसी ड्रेस में क्यों दिखता है ? हिंदुस्तान में तो कोई नॉर्मल व्यक्ति ऐसे कपड़े नहीं पहनता। ऐसा क्यों हो रहा है और... और ये क्या हो रहा है और मेरे साथ क्यों हो रहा है ?" अगली सुबह मैं एक मनोचिकित्सक के सामने बैठ ये सारी बातें बता रहा था। मनोचिकित्सक मेरी सारी बातें और समस्याएं सुन हल्का हल्का मुस्कुराया। मैंने सोचा शायद इसके पास मेरे जैसे मेंटल बहुत आते होंगे तभी ऐसा मुस्कुरा रहा है। उसने मेरी लाइफ में क्या चल रहा है ? कहाँ काम करता हूँ ? क्या काम करता हूँ ? कौन सी कॉलेज में पढ़ता हूँ ? क्या सब्जेक्ट्स है ? किसके साथ रहता हूँ ? फैमिली कहाँ रहती है ? अंतिम बार फैमिली वालों से कब बात हुई ? कितने बजे सोता हूँ और उठता हूँ ? क्या खाता हूँ ? नशा करता हूँ या नहीं ? इस प्रकार के सारे प्रश्न पूछे। पर इन सारे प्रश्नों का क्या अर्थ ? 

मनोचिकित्सक ने मुझे बताया कि मुझे सिज़ोफ्रेनिया नामक बीमारी हो सकती है। "सिज़ोफ्रेनिया ? ये भी कोई बीमारी है ?" मैंने मन ही मन सोचा। मनोचिकित्सक ने सिज़ोफ्रेनिया के बारे में बताना शुरू किया। उन्होंने कहा "सिज़ोफ्रेनिया एक भ्रम की तरह भी है। यह एक गंभीर मानसिक स्थिति है जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। यह मस्तिष्क के कामकाज को प्रभावित करती है, जिससे विचार, स्मृति, इंद्रियां और व्यवहार में समस्याएं आती हैं।"

उन्होंने आगे कहा "इससे, व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे कि सामाजिक संबंधों में समस्याएं और अपने विचारों को व्यवस्थित करने में कठिनाई।"

मनोचिकित्सक ने बाद में बताया कि सिज़ोफ्रेनिया कब होता है और इसके कारण क्या है ? मैंने उनसे कारण पूछ ही लिए। उन्होंने कहा कि यूँ तो काफ़ी सारे कारण है लेकिन आपके केस में जो कारण है वो है आपका स्ट्रेस। आप दिन भर बस काम करते रहते हो। जॉब का प्रेशर, साथ ही कॉलेज का काम। इन सभी के चलते आप अपनी हेल्थ पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते हो। अपने मन पसंदीदा काम नहीं कर पाते हो। अच्छा बना के खा नहीं पाते हो। मतलब एक स्ट्रेस भरी लाइफ आप जी रहे हो वो भी इस ओवर क्राउडेड सिटी में। ये तब होता है जब आप अपनी वाली लाइफ नहीं जी पाते हो। आप सभी जगह हो, पर स्वयं में नहीं। नगरी नगरी घूम रहे हो लेकिन अपने घर का रास्ता भूल गए हो। 
"तो ये एक भ्रम है ?"
"हाँ, कोई शक नहीं।"
"और वो मुझे ट्रेंच कोर्ट में ही क्यों दिखाई देता है ? हर बार एक जैसा।"
"अब ये तो तुम्हारे अतीत को पता होगा। अगर वो तुमको इसी ड्रेस में दिख रहा है तो जरूर कोई कारण होगा। तुम फिल्में देखते हो ?" 
"नहीं, बहुत कम।"
"थिएटर ?"
"नहीं।"
मेरी नज़र उनके केबिन में टंगी एक तस्वीर पर गई। उस तस्वीर में चेक गणराज्य के प्राग शहर में वल्तावा नदी पर स्थित एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक चार्ल्स ब्रिज की फोटो थी। 
"क्या ये प्राग की तस्वीर है ?"
"हाँ, तुम गए हो प्राग ?"
"नहीं, लेकिन मैंने निर्मल वर्मा के एक उपन्यास में उस शहर के बारे में पढ़ा है।" - ये बात कहते ही मैं समझ गया कि वो आदमी मुझे उसी ड्रेस में क्यों दिखता है। दरअसल निर्मल वर्मा का उपन्यास 'वे दिन' मुझे काफ़ी पसंद आया था और ये उपन्यास मैंने कुछ ही महीनों पहले पढ़ा। ये उपन्यास प्राग शहर और वहाँ के लोगों को दर्शाता है। वहाँ के लोग ऐसे कपड़े ही पहनते है जैसा वो आदमी मुझे दिखाई देता है। निर्मल वर्मा भी उन दिनों लंबा सा कोर्ट पहने रहते थे। उस उपन्यास के किरदार के बारे में, मैं कही दफ़ा सोचता था। मैंने मनोचिकित्सक को ये सारी बातें बताई। 

( निर्मल वर्मा 1959 से 1962 तक प्राग (चेकोस्लोवाकिया) में रहे थे। ) 

मैंने उनसे इसके इलाज़ के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि कुछ ख़ास मत करो। बस जो तुमको अच्छा लगता है वो काम भी किया करो और थोड़ा व्यायाम और साथ ही जॉब की दुनिया से बाहर निकलकर प्रकृति की सुंदरता को निहारों। जाते जाते मैंने मनोचिकित्सक से एक अंतिम प्रश्न किया। "अगर वो कोर्ट वाला आदमी मुझे फिर दिखा तो ?" मनोचिकित्सक ने एक मुस्कुराहट होठों पर लाते हुए कहा कि "तो उससे बात करने की कोशिश करो। क्या पता तुम दोनों एक दूसरे को जानते हो ?"

पिछले कुछ दिनों से जो आदमी दिख रहा है था वो आज नहीं दिख रहा है। सुबह से शाम हो गई लेकिन अभी तक नहीं दिखा। हो सकता है ये सब मेरा भ्रम हो। आँखें कुछ दर्द करने लगी थी। कंप्यूटर का ब्राइटनेस कम किया। शाम गहरी हो चुकी थी। ऑफिस के लगभग सभी लोग निकल चुके थे। मेरा भी लॉग आउट करने का टाइम हो चुका था। मुँह धोने के लिए वॉश बेसिन के सामने खड़ा हुआ और मुँह पर पानी मारा। लॉग आउट किया और बाहर ऑफिस के गलियारे में आ गया। टी बॉय ने चाय का पूछा। मैंने मना कर दिया। ऑफिस से बाहर निकलने से पहले मैंने अपनी नजरें गलियारे के अंत तक पहुंचाई। वहाँ कोई नहीं खड़ा था। 

'उस आदमी के बारे में ज्यादा मत सोचो।' मुझे अचानक मनोचिकित्सक द्वारा बोली गई ये बात याद आई। क्योंकि उन्होंने कहा था जिस चीज़ के बारे में इंसान दिन रात सोचने लगता है फ़िर वही चीजें हमें दिखने लगती है। यह एक प्रेम रोग की तरह ही है जहाँ हमें किसी से प्रेम हो जाने के बाद वही इंसान हर जगह नज़र आने लगता है। 

मैं उस आदमी की छवि मन से निकालने की कोशिश करने लगा। मैं मेट्रो के इंतज़ार में खड़ा था। सामने वाले प्लेटफॉर्म पर बहुत भीड़ थी। सहसा वो आदमी मेरी नजरों में फ़िर आया। मेरे मन में विचार आने लगे। 'क्या मुझे उससे मिलना चाहिए ? या फिर मिले बगैर ही चला जाऊ ?' मन में विचार दौड़ने लगे। मेट्रो आने में अभी टाइम था। अंत में, मैं उससे बात करने का विचार बना लिया। मेरे कदम धीरे धीरे उसकी ओर बढ़ रहे थे। मुझे यक़ीन था कि वो गायब हो जाएगा, जैसे कल हुआ। मेरे एक हाथ में लैपटॉप का बैग था। मैं उसके ठीक पीछे जाकर खड़ा हो गया। इस बार वो गायब नहीं हुआ। 



मैंने हिम्मत कर अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। उसका कोर्ट गीला था, शायद बारिश के कारण। वो मेरी ओर मुड़ा। उसका चेहरा देखते ही मैं दो कदम पीछे चला गया। मेरी पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मुझे बिल्कुल यक़ीन नहीं हो रहा था। मैं आश्चर्यचकित की चरम सीमा पर खड़ा था। उसका चेहरा हूबहू मेरे से मेल खाता है। मेरे जैसा हेयर स्टाइल, मेरी जैसी आँखें, चश्मा भी वही, नाक, होठ, कान सबकुछ मेरे जैसा ही। त्वचा का रंग भी वही। उसके चेहरे पर तेज था और आँखें मुझे घूर रही थी। 


"तुम सोच रहे होंगे मैं कौन हूँ ? मैं कोई और नहीं बल्कि तुम्हारा ही अतीत हूँ जो हर रोज़ इन सभी जगहों से गुजरता है और यही ठहर जाता है। मेरा नाम भी वही है जो तुम्हारा है। मेरी हाइट भी उतनी ही है जितनी तुम्हारी है। कुछ अलग नहीं।"- उसने अचानक बोलना शुरू कर दिया। 
"तुम मुझे हर जगह क्यों दिख रहे हो ?" मैंने तनाव में आकर कहा। मेरे पास बोलने के लिए कुछ नहीं था। 
"क्योंकि तुम हर जगह हो ?"
"मतलब।"
"मतलब तुम अपने आप में नहीं हो। तुम पिछले कुछ महीनों से बस इस भीड़ का हिस्सा हो। जहाँ भीड़ जा रही है तुम भी उसी दिशा में चल रहे हो। स्वयं को बाहर खोज रहे हो। अपने अंदर झांकना तुमने बंद कर दिया है। अपने लिए वक्त निकालना बंद कर चुके हो। तुमने आखिरी बार कब कलम उठाकर अपने लिए कुछ लिखा था ? कब तुमने आखिरी बार बैडमिंटन खेला था ? कब आखिरी बार पहाड़ों और झीलों के बीच दिन गुजारा था। ये सब चीज़ें तुम्हारी उम्र लंबी करती है और तुमने इन सभी से ही अपना नाता तोड़ दिया।"

उसने बोलना जारी रखा - "चैन से सोने वाले तुम अब नींद की गोलियां लेकर सो रहे हो। पेरेंट्स से दैनिक हालचाल पूछना बंद कर चुके हो।"

उसके चेहरे पर गंभीरता थी। मेरे मुँह से शब्द क्यों नहीं निकल रहे थे ? ऐसा लग रहा है किसी ने मुझे चारों ओर से पकड़ लिया है। मानो लग रहा हो कि कॉलेज, ऑफिस और शहर की भीड़ मुझ पर हावी हो रही है। सभी मुझ पर प्रेशर बना रहे हो अच्छा परफॉर्म करने के लिए। कॉलेज वाले प्रेशर बनाते है अच्छे मार्क्स के लिए, घर वाले प्रेशर बनाते है ज्यादा कमाने के लिए, ऑफिस वाले प्रेशर बनाते है समयसीमा के अंदर टारगेट पूरा करने के लिए और शहर की भीड़ उसका क्या ? ये भीड़ तो कही का नही छोड़ती। मैं बंद चुका हूँ। मैं खुलना चाहता हूँ। 

"अगर फिर अपने आप में लौटना है तो स्वयं के अंदर झाकों। कई बार खुद में लौटना ही वर्तमान की दुनिया में लौटना होता है। स्वयं को खोजों रविंद्र। शोर शराबे की इस दुनिया में एकांत ढूंढों रविंद्र। कभी वो भी कार्य किया करो जिसमें तुम्हारा मन लगता है।"- वो मेरे बहुत नज़दीक था। वो कहते कहते मेरे करीब आ गया। उसके चेहरे के गंभीर भाव मैं महसूस कर पा रहा था। मैं प्लेटफॉर्म के किनारे पर खड़ा था। मुझे नहीं मालूम मैं किनारे के इतने करीब कब आ गया।

"क्यों ? ये सब कर पाओगे न ?"- वो मेरी ओर झुक गया जिससे मेरा बैलेंस बिगड़ गया। मेट्रो आ रही थी। बैलेंस बिगड़ने के कारण मैं अपने आप को संभाल नहीं पाया। मैं ट्रैक पर गिरने ही वाला था कि उसने मेरा दाहिना हाथ पकड़ा और अपनी ओर खींच लिया। जैसे ही उसने मुझे खींचा मेरा लंबा सा ) सपना अचानक टूट गया। 

मैं अपने आप को अपने बिस्तर पर पाता हूँ। मेरा दाहिना हाथ वास्तविकता की दुनिया में भी आगे की ओर बढ़ा हुआ था। माथे पर आया हुआ पसीना पोछा। धड़कने अचानक से तेज हो गई। हांफते - हांफते एक नज़र कमरे पर डाली। कमरा अस्तव्यस्त था। कुछ ही पलों में सारा सपना दिमाग में रिवाइंड हुआ।


लगता है बाहर बारिश हो रही है। मैं उठा लेकिन उठने में कुछ प्रॉब्लम हुई। पैरों पर खड़े होते ही कमर और घुटने दुखने लगे। मैं धीरे - धीरे खिड़की की ओर बढ़ा और पर्दे हटा दिए। बाहर सच में जोरों से बारिश हों रही थी। 

मैं बिस्तर पर बैठ उस सपने के बारे में सोचने लगा। वो सपना तो बिल्कुल सच था। मैंने घड़ी में टाइम देखा। सुबह के 6 बज रहे थे। मैंने अपना फोन उठाया। फोन का टाइम देखते ही मैं चौक गया। फोन में दिन था मंगलवार, तारीख थी 10 और बज रहे थे शाम के 6. मुझे याद है मैं रविवार की रात 12 बजे सोया था। मैंने नींद की गोलियां ली थी क्योंकि पिछले कुछ महीनों से मैं अच्छे से सो नहीं पा रहा था। उस रात मेरी गर्दन, आँखें और सिर दर्द कर रहा था। शायद गोलियां ज्यादा ले ली थी। इस वजह से इतना लंबा सो गया था। रविवार को सोया और मंगलवार की शाम को जगा। 





जो सपना आया था क्या वो सच में सपना था या फिर हक़ीक़त ? शायद ये सपना हक़ीक़त से बढ़कर था। ऐसा सपना जो बहुत कुछ कहकर और सिखाकर गया। मैंने गैस पर चाय चढ़ाई। डायरी और पेन उठाया। और दोनों को लेकर खिड़की के पास बैठ गया। और कुछ लिखने लगा। इस बार कंपनी के लिए नहीं बल्कि अपने लिए।


© रविंद्र मुंडेतिया 




Comments

Popular posts from this blog

मेट्रो... उन दिनों ( 'इकिगाई' वाली लड़की ) - 1

मेट्रो... उन दिनों ( कहानी काव्या की ) - 4