मेट्रो... उन दिनों ( 'इकिगाई' वाली लड़की ) - 1


( Image : magicbricks )

वर्तमान 

मैं 'घाटकोपर मेट्रो स्टेशन' से 'डी.एन नगर' जा रहा था। हर रोज़ की तरह आज भी मेट्रो खचाखच भरा था। मैं खुश था कि मुझे कम से कम अपने दोनों पैरों पर खड़े रहने की जगह तो मिल गई। 'मरोल नाका' मेट्रो स्टेशन पर भीड़ कम हुई। मैं जिस तरफ़ मेट्रो का दरवाज़ा खुल रहा था उसकी तरफ़ पीठ किए और बैग को आगे लटकाए खड़ा था। मेट्रो की बड़ी सी खिड़की से उन सभी इमारतों को देख रहा था जिनको में रोज़ देखता हूँ और साथ ही कान में इयरफोन डाले गाने सुन रहा था। तभी पीछे से कंधे पर किसी ने हाथ रखा। मैंने पीछे देखा और मुस्कुरा दिया। 

( मेट्रो के मुसाफ़िर )

वो आज सफेद कुर्ती और जींस पेंट पहनी थी। कुर्ती के ऊपर लाल रंग का बंधनी दुपट्टा था जिसमें सफेद रंग के धब्बे थे। बालों में उसने आज क्लिप नहीं लगाया था। आंखों में हल्का काजल था और हाथ में बैग। वो मेरे करीब आई और मेट्रो में लगे ग्रेब हैंडल को पकड़ लिया।

"How are you prince ?" - उसने कहा। 

"Fine yaar" - मैंने कहा।

"So, आज कौन सी ब्रेकिंग न्यूज है ?" - वो मुस्कुराई तो उसके सभी सफेद दांत दिखे। 

"कुछ खास नहीं। नॉर्मल है। बस नेताओं ने एक दूसरे पर तंज कसा है।"- मैंने होठों पर मुस्कुराहट छोड़ते हुए कहा।

मैंने एक नज़र मेट्रो की खिड़की से बाहर देखने के बाद कहा - "You looking pretty."

"Thank you prince." - उसने बहुत ही प्यारी सी मुस्कान के साथ ये कहा।

हम दोनों लगभग रोज़ ही मेट्रो में मिल जाते है। जिस दिन मेट्रो छूट जाती है उस दिन मिलना असंभव सा हो जाता है। कभी मेरी मेट्रो छूट जाती है तो कभी उसकी। 

दो महीने पहले 


( संडे का दिन )

दो महीने पहले की बात है जब मैं रोजमर्रा की तरह ही मेट्रो से अपने ऑफिस जा रहा था। उस दिन संडे था। मेट्रो में बिल्कुल भीड़ नहीं थी। 'मरोल नाका' स्टेशन आया। मैं सीट पर बैठा था। मैं लिनन शर्ट और पेंट पहना था। पास वाली सीट खाली थी। टी - शर्ट और जींस पहनी एक लड़की आई और पास वाली सीट पर बैठ गई। मैं अपने फोन में लगा था। उसने अपने बैग में से एक किताब निकाली। किताब का नाम था 'इकिगाई'। मैं रह रहकर अपने फोन से नजरें हटाकर उसकी किताब में देख रहा था। उसने मेरी ओर देखा और कहा - "तुमको पढ़नी है ये किताब ?" मैंने सिर हिला दिया और कहा "मैं पढ़ चुका हूँ इसे।" 

उसने किताब में से एक वाक्य पढ़ा और कहा - "तो मुझे इस किताब की समरी बताओ।"

"तुमको पूरी पढ़नी चाहिए इसे।" - मैने एक गहरी साँस छोड़ते हुए कहा। 

"क्या ये किताब सच में मददगार है जीवन के लिए ?"- उसने किताब का कवर पेज दिखाते हुए मुझसे पूछा। 

"अगर तुम किताब में बताई गई सभी बातों पर अमल करो तो जरूर मददगार साबित होगी।"

"मुझे मेरी एक फ्रेंड ने ये किताब रिकमेंड की। कहा कि इसे पढ़ लेगी तो जिंदगी सुधर जाएगी।"- ये कहकर वो हँसने लगी। 

"सो, तुम्हारी फ्रेंड किताबें पढ़ती है ?" - सवाल पूछने के बाद मुझे थोड़ा अजीब लगा क्योंकि मैं उसको नहीं जानता और मैंने उसकी फ्रेंड के बारे में पूछ लिया। लेकिन उसने तुरंत ही जवाब दे दिया।

"हाँ, वो बहुत पढ़ती है।" 

"तुमको शौक नहीं है पढ़ने का ?"

"ज्यादा नहीं।"

"फिर भी कितना ?" - मैंने चेहरे पर हँसी लाते हुए कहा।

"रोज़ एक या दो पेज पढ़ लेती हूँ बस।"

"ठीक ही तो है। क्या पता आज तुमको एक या दो पेज पढ़ने में आलस आ रहा हो और कल कही तुम ही एक लेखिका ना बन जाओ।"

"मजाक अच्छा है।" - हम दोनों मंद मंद हँसने लगे।

"मुझे पसंद नहीं ज्यादा पढ़ना और स्पेशली लिटरेचर। You know लिटरेचर इस बोरिंग।"

"तुम कौन सा लिटरेचर पढ़ती हो ?"

"वैसे मैने कुछ ख़ास पढ़ा तो नहीं है। अभी तक की लाइफ में बस दो ही लिटरेचर की किताबें पढ़ी है।"

"बस दो ही! 

"हाँ।"

"मुझे लगता है, किसी भी चीज़ को बोरिंग या अच्छा कहने से पहले उसको एक्सप्लोर करना चाहिए। Am I right ?"

"Yes, no doubt. But पता नहीं पढ़ना अच्छा नहीं लगता।"

"I understand, But मेरे विचार में तुमको अभी और पढ़ना चाहिए। क्या पता लिटरेचर को लेकर तुम्हारे विचार बदल जाए।"

"तुमने पढ़ा है कोई लिटरेचर ?"- उसने पूछा।

"हाँ, कभी - कभी पढ़ लेता हूँ।"

"So, which literature do you read, Hindi or English ?"

"Mostly Hindi. Sometimes English."

"हिंदी में कोई पसंदीदा किताब ?"

"किसी एक विशिष्ट लेखक या उसकी लेखनी से प्रभावित नहीं हुआ हूँ मैं, इसलिए बता पाना मुश्किल है।"

"ओके। समझ गई।" 

बातों ही बातों में दो स्टेशन निकल गए। 'अंधेरी' स्टेशन आने वाला था। मेट्रो में अनाउंसमेंट हो रही थी कि अगला स्टेशन कौन सा आने वाला है और दरवाज़ा किस तरफ खुलेगा। क्योंकि आज संडे था लिहाज़ा भीड़ बहुत ही कम थी। उतरने और चढ़ने के लिए लोग ज्यादा नहीं थे। संडे के दिन मेट्रो में धक्का मुक्की नहीं होती है। क्योंकि अधिकतर धक्का मुक्की करने वाले लोग उस दिन छुट्टी पर होते है। धक्का मुक्की तब शुरू होती है जब सब दूसरे दिन काम पर जाते है। 

मैं कानों में इयरफोन डाले धीमी आवाज़ में गाना सुन रहा था और मेट्रो के दरवाज़े के ऊपर लगे उस टिमटिमाती रेखा को देख रहा था जो ये दर्शाती है कि अगला स्टेशन कौन सा है। अगला स्टेशन था 'आज़ाद नगर'। मुझे 'डी.एन नगर' उतरना था जो 'आज़ाद नगर' के बाद आता हैं। 

उसने बुक से मेरे कंधे पर धीरे से मारा। मैंने उसकी ओर देखा।

"तुम क्या करते हो ?" - उसने पूछा।

"मैं न्यूज चैनल में डेस्क रिपोर्टर हूँ। तुम ?"

"मैं वीडियो एडिटर हूँ।"

"कहा पर ?"

"वर्सोवा में ऑफिस है। पॉडकास्ट के वीडियो एडिट करती हूँ। तुम्हारा ऑफिस कहा है ?"

"यही 'डी.एन नगर' में।"

"वैसे ये डेस्क रिपोर्टर करते क्या है ?" 

"तुमको सच में नहीं पता ?"

"नहीं पता इसलिए तो पूँछ रही हूँ।"

"डेस्क रिपोर्टर किसी भी न्यूज चैनल के आँख और कान होते है। कही पर भी कुछ हुआ तो जल्दी ब्यूरो चीफ़ को इनफॉर्म करना होता है ताकि रिपोर्टर वहाँ भेज सके।"

"ओह इंट्रेस्टिंग।"- उसके चेहरे पर मुस्कान थी। 

उसने दरवाज़े के ऊपर लगी टिमटिमाती रेखा को देखा। 'आज़ाद नगर' स्टेशन अभी निकला ही था। 'डी.एन नगर' उतरने वाले लोग दरवाजे के करीब जाकर खड़े हो गए थे। 

( 'डी.एन नगर' का इंतज़ार करता एक मुसाफ़िर ) 

"आने वाला है 'डी.एन नगर'।"- उसने कहा।

"हाँ।"

"तुम्हारा काम इंट्रेस्टिंग है। तुम्हारा तो जनरल नॉलेज भी अच्छा होगा।"

"कुछ ख़ास नहीं, लेकिन हाँ, डेली जो भी हैपनिंग होता है उसपर नज़र रहती है सो जानकारी है चीजों की बस।"- ये कहकर मैं धीमे से मुस्कुरा दिया और खड़ा हो गया। 

"ओके, बाय काव्या।"

मैंने जैसे ही उसका नाम लिया वो चौक गई। 

"तुमको मेरा नाम कैसे पता !"- उसने चौंकते हुए कहा।

काव्या ने जिस हाथ से मुझे इशारा कर पूछा था कि 'तुमको मेरा नाम कैसे पता' उसी पर उसकी नज़र पढ़ी। मैं उसकी ओर देखकर हँसने लगा। उसके सीधे हाथ की कलाई पर उसका नाम लिखा है। उसका नाम और नाम के ठीक नीचे एक छोटा सा दिल। 

"ओके, बाय।"

"तुम्हारा नाम क्या है ?"- उसने पूछा। मैंने उसकी ओर देखा। 

"तुमको तो बताना ही पड़ेगा। क्योंकि तुमने तो बिना नाम पूछे भी नाम जानने का कोई निशान अपनी बॉडी पर नहीं छोड़ा है। ना हाथ पर और ना ही गले पर।"

"एक्चुअली मुझे नहीं पसंद अपने शरीर पर कुछ भी टैटू बनवाना और लिखवाना।"

"बहुत सीरियस रहते हो तुम।"

"ऐसा कुछ भी नहीं।"

"मैंने मज़ाक किया था और तुम हँसे भी नहीं।"

"ओ... ।"- ये कहकर मैं मुस्कुराया। 

"अब बताओ नाम।"

'डी.एन नगर' स्टेशन लगभग आ चुका था और मेट्रो धीरे हो गई थी। मैंने अपना नाम नहीं बताया लेकिन मैंने कहा - 

"गूगल पर जाके लिखो 'थैंक्यू जी' स्टोरी कलेक्शन , मेरा नाम पता चल जाएगा।"

मेट्रो रुकी और दरवाजा खुल गया। मैं मेट्रो से बाहर निकलकर एस्केलेटर से नीचे आ गया। 

( विज्ञापन के साथ डी. एन नगर )


© रविंद्र मुंडेतिया 


( 'मेट्रो... उन दिनों' की कहानी अभी जारी है...


चैप्टर 2 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें -  'कॉमन' मेट्रो में एक और बात 'कॉमन' 


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