गोरा उपन्यास का सारांश

     रवींद्रनाथ टैगोर के सर्वश्रेष्ठ उपन्यास गोरा का सारांश।


     उपन्यास में गोरा मुख्य पात्र है। गोरा कट्टर हिन्दू ब्राह्मण है। उनके पिता का नाम कृष्णदयाल है। माता का नाम आनंदमयी हैं। गोरा ब्राह्मणत्व को बनाए रखने की कोशिश करता है। आसपास के लोग गोरा को महान मानते है और युवा तो उन्हें गुरु मानते है। 

     गोरा छुआ-छूत और जाति में विश्वास करता है। गोरा बचपन में अपनी नौकरानी लक्षमिनिया के हाथों पानी भी नहीं पिया करता था। लक्षमिनिया के माँ के कमरे में जाने पर गोरा अपनी माँ के कमरे में भी नहीं जाता था। 

     गोरा का एक दोस्त है जिसका नाम विनय है। विनय को अपनी सौतेली माँ से प्यार कभी नहीं मिला लेकिन गोरा की माँ ने विनय को भी अपने बेटे की तरह ही प्रेम किया और इसी कारण विनय हमेशा गोरा के घर आता जाता रहता है। गोरा के विचार, ब्राह्मण समाज के प्रति इतनी सेवा देख, निष्ठा देख विनय भी गोरा के मार्ग पर चलने लगा। कुछ दिनों बाद विनय को एक ब्रम्ह समाज में विश्वास करने वाले परेश बाबू की बेटी ललिता से प्रेम हो जाता है। विनय ललिता से शादी करना चाहता है। गोरा भी परेश बाबू के घर आता जाता रहता है। जब गोरा को पता चला कि मेरा दोस्त विनय ब्रम्ह समाज में शादी कर रहा है तब गोरा उससे सारे नाते तोड़ देता है। गोरा ने अपनी माँ को भी इस शादी में जाने से इन्कार कर दिया था। आनंदमयी गोरा की बातों को मानी नहीं क्योंकि वो विनय को भी अपने बेटे के समान मानती थी।

     अपने धर्म के खातिर गोरा ने अपनी दोस्ती तोड़ दी ये देख उसके समाज के लोग काफी प्रभावित हुए। गोरा के समाज के लोग गोरा को हिन्दू धर्म का प्रकांड पंडित्य की उपाधि देने के लिए एक यज्ञ करते है। उस यज्ञ में काफी दूर दूर के संत साधु गोरा को आशीर्वाद देने आते है। अब सब कुछ तैयार था यज्ञ की तैयारी हो चुकी थी। लेकिन बीच में ही गोरा के पिता की हालत गंभीर हो जाती है। गोरा के पिता कृष्णदयाल को गोरा से कुछ बात करनी थी। मृत्यु शैया पर लेटे हुए कृष्णदयाल को आभास हो जाता है कि वे अब नहीं बचेंगे। उनकी मौत निश्चित है इसलिए गोरा की सच्चाई उन्होंने जाने से पहले बता दी। 

     वे कहते है कि गोरा उनका लड़का नहीं है , उन्होंने तो गोरा को कहीं से पाया था। अंग्रेजों के युद्ध के दौरान गोरा के पिता मारे गए थे। वह एक आयरिश थे। लेकिन आनंदमयी को भी लड़का नहीं था लिहाज़ा उन्होंने गोरा को गोद ले लिया और गोरा को पाल पौश के बड़ा किया। गोरा ब्राह्मण क्या वो तो अब हिन्दू भी नहीं था , जो अपने पिता को मुखाग्नि भी नहीं दे सकता।    

     कृष्णादयाल के मुंह से सच्चाई जानकर गोरा बहुत दु:खी हुआ। गोरा सबसे पहले परेश बाबू के पास गया। परेश बाबू को भी ब्रम्ह समाज के लोगों ने विनय से अपनी बेटी की शादी करने के  आरोप में बाहर कर दिया। परेश बाबू और गोरा दोनों की स्थिति अब एक जैसी थी।

     गोरा अंत में घर आकर आंनदमयी के कदमों में गिर जाता है और कहता है "मां, तुम्हीं मेरी मां हो। जिस मां को मैं खोजता फिर रहा था, वह तो यही मेरे कमरे में बैठी हुई थी। तुम्हारी जाति नहीं है, तुम ऊंच-नीच का विचार नहीं करती, घृणा नहीं करती, तुम केवल कल्याण की मूर्ति हो। तुम मेरी भारतवर्ष हो।" गोरा के इतना कहने के बाद आनंदमयी ने उसे अपने कलेजे से लगा लिया। 


लेख: रविंद्र मुंडेतिया 

Comments

Popular posts from this blog

मेट्रो... उन दिनों ( 'इकिगाई' वाली लड़की ) - 1

सवाल भी मैं और जवाब भी मैं

मेट्रो... उन दिनों ( कहानी काव्या की ) - 4