बनारस घाट पर एक शाम
( Image : Adobe stock )
यूं तो मुंबई शहर मुझे हमेशा से ही अच्छा लगता है। ये शहर मेरे दिल में बसा हुआ है क्योंकि ये मेरी कर्मभूमी है। मैं यहां पिछले तीन साल से एडवरटाइजिंग एजेंसी में काम कर रहा हूं। लेकिन कभी कभी काम का तनाव कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है। मैंने अपने दोस्त को इस तनाव भरी ज़िन्दगी के बारे में बताया। उसने सीधा एक रास्ता मुझे बता दिया। उसने कुछ दिनों के लिए मुझे बनारस आने का न्योता दे दिया। मैं इस न्योते को इंकार ना कर सका। मैंने जॉब से कुछ दिनों की छुट्टियां ले ली।
मैं बनारस सुरक्षित पहुंच गया था। इस पवित्र शहर को बनारस, वाराणसी, काशी तीनों नामों से जाना जाता है। इस सुंदर से शहर को लोग 'महादेव की नगरी' भी कहते है। मैं अब बनारस की गोद में खड़ा था, जहां की हवा, मिट्टी, पानी सबकुछ एक अलग अहसास दिला रही थी। ये नगरी हिंदी साहित्यकारों, कवि, लेखक, संगीतकारों और अनेक कलाकारों की जननी भी रही है।
बनारस में अनेकों घाट है, लेकिन मेरे लिए अस्सी घाट सबसे नजदीक था क्योंकि मेरा मित्र इस घाट के करीब ही रहता है। मैं अकेला ही अस्सी घाट की तरफ चल दिया। ये पहली बार हुआ जब में अकेला घूमने के लिए बाहर निकला। शाम लग चुकी थी। यहां ठंड कुछ ज्यादा थी। जिस्म को स्वेटर की जरूरत बेइंतिहा थी। हाथ स्वेटर की जेब से बाहर निकल ही नहीं रहे थे। घाट पर ज्यादा लोग नहीं थे मगर इतने कम भी नहीं थे कि उंगलियों पर गिन सकु।
मैं कुछ देर घाट के करीब बनी चाय की दुकान पर बैठ गया। कुल्हड़ के कप में उन्होंने मुझे चाय दी। मैंने दोनों हाथो से उस कुल्हड़ के कप को समेट लिया और चाय की घुटक लेने लगा। पत्थरों की सीढ़ियों से घाट बेहद खूबसूरत दिख रहा था। बीच-बीच में कभी मंदिरो के घंटो की आवाज कानों में दस्तक देती थी तो कभी किसी साधु के मंत्र मुझे न चाहते हुए भी भक्ति के इस सागर में डुबकियां लगाने को मजबूर करती थी। कहीं दूर से डमरू की आवाज़ आ रही थी जो साथ में सकारात्मक ऊर्जा भी संग ला रही थी। मानो वो सकारात्मक ऊर्जा मेरे अंदर प्रवेश कर रही हो। घाट पर साधु संतो का जमावड़ा देखा। कोई किसी की हथेली देख उसका भविष्य बता रहे थे, कोई मंत्र जाप करके माथे पर भभूत लगा रहे थे।
मैं चाय पीकर घाट की सीढ़ियों से नीचे उतर गया। मेरे पैर पानी की ठंडक को महसूस कर पा रहे थे। मैं इस वक्त तनाव से बिल्कुल मुक्त हो चुका था। मेरा मन घाट पर खड़ी नाव में बैठने का किया। वहाँ एक मल्लाह अपनी कश्ती में खड़े-खड़े मुझे ही देख रहा था। मैं उस कश्ती में जाकर बैठ गया। इस दिशा से ये घाट ओर भी अद्भुत और सुंदर दिख रहा था। उस मल्लाह को कुछ ओर भी सवारियों की जरूरत थी। कुछ देर हमने सवारियों की राह तकी मगर कोई नहीं आया। जैसे ही मल्लाह ने कश्ती घाट से हटाई तभी एक जवान लड़की भागती हुई आई और उसने रुखने का इशारा किया। कश्ती रुक गई और वो भी मेरे साथ बैठ गई।
वो अंजान थी लिहाज़ा मैंने उसे बतलाया नहीं लेकिन उसने मुझे बतलाने में देर ना की। बतलाने के बाद फिर बातों की कड़ी टूटी ही नहीं। वो अपने बारे में मुझे तो मैं अपने बारे में उसे बताता रहा। हमारी अच्छी खासी दोस्ती हो गई। उसने हाथ आगे बढ़ाया और अंग्रेजी में कहां "Now we are friends." मुझे भी ये दोस्त पसंद थी इसलिए मैंने हाथ मिला लिया। कश्ती घाट की ओर बढ़ने लगी। शाम ओर गहरी होती जा रही थी। घाट पर शाम की आरती होने लगी थी। अब हम दोनों के पास एक दुसरे का फोन नंबर था। सच में, बनारस की ये एक शाम मुझे हरदम याद रहेगी।
...रविंद्र मुंडेतिया

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