स्मार्टफोने मे कैद बचपन

     आज स्मार्टफोन और इंटरनेट ने पूरी दुनिया को एक-दुसरे से जोड़ रखा है। जानकारी का आदान-प्रदान बड़ी आसानी से हो जाता है। मगर रफ्तार के इस युग में एवं तेजी से बढ़ते स्मार्टफोन और इंटरनेट ने बच्चों के बचपन पर भी असर डाला है। खेलकूद की उम्र में बच्चे अब एक जगह बैठकर वीडियो गेम खेलने में व्यस्त हो गए हैं। 

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     यह गेम अब बच्चों को भाने भी लगे हैं। बच्चों का मोबाइल फ़ोन के प्रति क्रेज कोरोना काल में या उसके बाद से ज्यादा देखने को मिला। बच्चों की यह लत अब ऐसी बढ़ चुकी है कि कहीं सारे अभिभावकों को अब साइकोलॉजिस्ट के चक्कर तक काटने पड़ रहे हैं। यह लत बच्चों को अपने माता-पिता, दोस्त और पढ़ाई से दूर कर रही है। उनका ध्यान भटकाकर अनावश्यक चीजों में लगा रही है जो उनके विचारों और व्यवहार में देखने को भी मिल रहा है।

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     कोरोना काल में जब ऑनलाइन क्लासेज शुरू हुई, उसके बाद से कुछ ज्यादा ही बच्चों के हाथों में मोबाइल देखने को मिला है। ऑनलाइन क्लासेज होने के कारण उन अभिभावकों ने भी बच्चों को स्मार्टफोन दिलाया जिनके पास पैसो की कमी थी। उन्होंने यह सोचकर स्मार्टफोन दिलाया था कि 'बच्चे बड़े' लेकिन अब परिस्थिति कुछ अलग ही रूप धारण कर चुकी है। बच्चे ऑनलाइन क्लासेज के बहाने इंटरनेट पर पांच से छह घंटे यूही बिता लेते हैं।

     स्मार्टफोन का बच्चों पर दुष्प्रभाव

1) लगातार देखने और सुनने से आंखों और कानों पर प्रभाव : बच्चों का ज्यादा समय मोबाइल फोन की स्क्रीन पर ही बीत रहा है, इससे उनकी आंखों पर भारी असर पड़ रहा है। स्मार्टफोन से निकली नुकसानदेह किरणे आंखों को खराब कर रही है। लगातार कान में ईयरफोन और हेडफोन लगाकर सुनने की वजह से बच्चों के कानों के पर्दों पर असर पड़ रहा है।
2) नींद कम आना : ऐसे कहीं सारे अभिभावक है जो अपने बच्चों पर ध्यान नहीं देते। वीडियो गेम, मोबाइल फोन चलाने की उनको खुली अनुमति रहती है। यह टेक्नोलॉजी बच्चों के नींद में अड़चन पैदा करती है। नींद सही से ना आने के कारण उनका पढ़ाई-लिखाई से ध्यान हट जाता है।
3) एग्रेसिव होना : आजकल हर मीडिया शो या फिल्मों में ज्यादातर हिंसा भरे कंटेंट दिखाई देते हैं। इन फिल्मों में हत्या, मारपीट, टॉर्चर जैसे दृश्य दिखाएं देते हैं। बच्चे मानसिक और शारीरिक रूप से इनकी चपेट में आ जाते हैं। इन सभी दृश्यों को बच्चे भी देखते हैं और उन दृश्यों से प्रभावित होकर वे भी आक्रामक हो जाते हैं।
4) शारीरिक विकास पर असर पड़ना : मैदानी खेल-कूद हमारे शरीर को तंदुरुस्त बनाते हैं। इसके विपरीत घर में बैठकर या स्मार्टफोन में खेले जाने वाले गेम हमारे शारीरिक विकास पर लगाम लगा देते हैं। कहीं दफा शरीर में दर्द होने लगता है, साथ ही साथ मोटापा भी बढ़ जाता है। ये लत फुरती को रोककर आलस को जन्म देती है। फिजिकल एक्टिविटी से बच्चों का शरीर सही तरह से बरकत करता है और ढेरों नई नई कौशलता उनमें विकसित होती है।

     निम्नलिखित कुछ उपाय : 

1) बच्चों के साथ समय बिताना : भागदौड़ भरी इस जिंदगी में अभिभावक अपने बच्चों को सही से वक्त भी नहीं दे पाते हैं। माता-पिता को अपने बच्चों के साथ फ्रेंडली व्यवहार करना चाहिए जिससे वह भी आपके साथ स्वतंत्र हो जाए।
2) नए नए कार्य करना : स्कूली किताबों के अलावा उनको बाहर का भी ज्ञान देना चाहिए। उनकी उम्र के मुताबिक उनको अलग-अलग किताबें पढानी चाहिए। उनके साथ बाहर घूमनेे जाना चाहिए।
3) मोबाइल फोन दूर रखो : ये काम माता पिता को धीरे धीरे करना चाहिए क्योंकि अगर एकदम से बच्चों के हाथों से मोबाइल फोन छीनने लगे तो वे आक्रामक हो जाएंगे। शाम होने पर बच्चों को मोबाइल से दूर कर दो ताकि रात होने तक उन्हें नींद आने लगे।

     यह एक डिसऑर्डर बन चुका है। इंटरनेट, ऑनलाइन गेम, ऐप, स्मार्टफोन इन सबकी लत को  साइकोलॉजिस्ट एक डिसऑर्डर मानते हैं। यह लत बच्चों में ही नहीं बल्कि युवाओं में भी देखी जाती है। यह लत एक नशे जैसी हो चुकी है। अगर ऐसे बच्चों के हाथों से स्मार्टफोन ले लिए जाए तो वे घबराने लगते हैं। कभी-कभी बच्चे तथा युवा आत्मघाती भी हो जाते हैं।

..रविंद्र मुंडेतिया  

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