ये अंधेरा घना छाया हुआ

ये अंधेरा घना छाया हुआ ( प्रेरणादायक कविता )

     हम सब हमारी जिंदगी में किसी ना किसी लक्ष्य का पीछा जरूर करते हैं। इस लक्ष्य को हासिल करने मेंं कई दफा हमको असफलताओं का सामना भी करना पड़ता है, जोकि जरुरी भी है। कुछ लोग इन असफलताओं से लड़कर आगे बढ़़ जाते है तो कुछ लोग डिमोटिवेट होकर हार मान लेते हैं और घर के किसी एक कोने मेंं बैठकर दिन का गुजारा करने लगते हैं। इसी ख्याल को लेकर एक कविता लिखी गई है।
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ये अंधेरा घना छाया हुआ 
अंधेरे से कब तक डरोगे ? 
रखो कदम बाहर की दुनिया मे,
यू चार दिवारी मे कब तक रहोगे ?

जलना है तुम्हे अब इस भट्टी मे ,
मजबुत रखो दिल अपना ।
स्पष्ट नही यहाँ आगे बढ़ना ,
जटिल बहुत है रास्ता अपना ।

क्यो डरते हो जमाने से ?
जमाने की परवाह मत करो ।
चार लोग क्या कहेंगे, ये सोचकर ,
वक्त की बर्बादी मत करो । 

उठो अभी, कदम बढ़ाओ ,
वक्त की कमी बहुत है ।
सफ़र तुम्हारा विशाल होगा ,
यहाँ मुसाफिरो की भीड़ बहुत है ।

कही पीछे ना छूट जाओ तुम ,
वक्त की ज़रा सी कद्र करो ।
ये मिलता नही सबको जग मे ,
जब भी मिले इसका सदुपयोग करो ।

अर्श मे उड़ने का ख्वाब ,
तुझे अब देखना होगा ।
'हाँ' है सफ़र मे कांटे बहुत ,
मगर उन्ही काँटो पर तुझे चलना होगा ।

ना हार देख, ना जीत देख ,
ना शब देख, ना सुभह देख ।
अगर निकला है कुछ करने के लिए  ,
तो सिर्फ कामयाबी का वो छोर देख ।

मिलता नही यहाँ बिन मेहनत कुछ भी ,
कष्ट खुब सहना पड़ता है ।
आँखो मे आँसु क्यो ना आ जाए ,
आंसुओ से दोस्ती करना पड़ता है ।

बढ़ाएगा कदम आज ,
तो कल जय- जयकार होगा ।
'हाँ ' माना मुश्किल है पथ ज़रा सा, मेहनत कर ,
कल हर जुबां पर तेरा नाम होगा । (2)

ये अंधेरा घना छाया हुआ ,
अंधेरे से कब तक ड़रोगे ?
रखो कदम बाहर की दुनिया मे ,
यू चार दिवारी मे कब तक रहोगे ।

ये अंधेरा घना छाया हुआ ।

रविंद्र मुंडेतिया ...

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