पहली दफा ( हिन्दी कविता )
बनारस की गलियाँ ऐसी है कि किसी को जल्दी समझ मे ही नही आती। मगर हाँ बनारस की यह गलियाँ पसंद बहुत आती है। कब गली खत्म हुई और कब नई गली जुड़कर शुरु हो गई इसका कुछ पता नही चलता है। ये गलियाँ बनारस की खुबसूरती है। पहली दफा ये कविता बनारस की गलियों पर नहीं है बल्कि बनारस की गलियों में जिसे देखा उस पर है। एक चेहरा जो मुझे बाद में कहीं दिखा ही नहीं।
पहली दफा
पहली दफा
बनारस की गलियों से होकर उसके
घर की ओर एक रस्ता जाता है ।
उस ढूंढ़ने में मेरा दिल इन्हीं
कहीं गलियों में खो जाता है ।
अस्सी घाट सा सुहाना है
उसका और मेरा टकराना है।
जब देखा उसे पहली बार
हुआ नहीं दिल पर विश्वास ,
सोचा कोई कैसे हो सकता
है इतना खूबसूरत यार ।
होठो पे मुस्कान,आंखों में
हल्का काजल लगाए रखती है ।
उल्फत की जुल्फो में न जाने
कितने राज़ वो छुपाए रखती है ।
खुदा के दरबार में इत्र के
सूगंध सी लगती है ।
हाथो में मेहंदी, कानों में बाली,
लड़की वो मीठी गाली सी लगती है ।
हसता खेलता ये दिल अब पागल
हो गया है उसे पाने को,
डर, फिक्र रहती है हर दफा
कहीं यकायक खो न दे उसको ।
वो केमिस्ट्री के किसी सवाल जैसी है जो
मुझे पूरी समझ में नहीं आती है ।
दिखती है कभी कभार इन गलियों में,
मगर मुस्कुराकर, करीब से निकल जाती है ।
हर बात में वो, हर फरियाद में वो
हर तरफ नजर आ रहा है ।
घड़ियां टिक-टिक चलती कहती मुझसे
तेरा वक्त यूहीं ख्वाब बुनने में ही जा रहा है ।
मैंने सोचा वो इस राह से गुजरेगा,
तब उसका नाम पूछकर 'हाय' ,'हेल्लो' कर लुंगा ।
मगर वो इस राह से गुजरा ही नहीं,
मेरे ख्वाब जैसा कुछ हुआ ही नहीं ।
मगर ये सच है कि....
जिससे मिले भी नहीं है उससे
कितना कुछ पाने की आशा रखते है।
कमाल है ना हम भी यारो,
बेवजह ही हद से ज्यादा उम्मीद लगाए रखते है ।
उसका ना मिलना इसका
हमे कोई मलाल ना हुआ ,
वैसे भी कहते है ना
जो खुदा ने चाहा वो हुआ
हमारे चाहने से क्या ही हुआ ।
लेकिन उसका मिलना जैसे ...
नई ज़िंदगी का मिलना ,
सहसा आंखों से आंखों का मिलना,
तेज धूप में छाव का मिलना,
थके हारे बाशिंदों को अच्छा पड़ोसी मिलना,
संगम पे दो नदियों का पानी मिलना,
किसी शायर को कुछ अल्फ़ाज़ ओर मिलना ,
सब इन जैसा उसका मिलना ।
इस बात को मध्य नज़र रखते हुए ,
कि जो खुदा चाहता है वो होता है ,
हमारे चाहने से कुछ नहीं होता है ,
और हुआ वहीं...
वो मुझे फिर कभी दिखा ही नहीं ,
किसी गली या मोहल्ले में नजर आया ही नहीं।
और मैं कलम उठाकर अपनी अगली कविता की ओर निकल गया,
ओर वो सिर्फ यादों की तरह किसी
काग़ज़ पर उतर गया ।
खुदा के दरबार में इत्र के
सूगंध सी लगती है ।
हाथो में मेहंदी, कानों में बाली,
लड़की वो मीठी गाली सी लगती है।
....रविन्द्र मुंडेतिया
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