इम्तिहान ( कितने पाप कितने पुण्य हिन्दी उपन्यास से )


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     इम्तिहान नजदीक आ रहे थे। पहला सेमेस्टर कब आया पता ही नही चला। इम्तिहान एक ऐसी चीज है, जो कोई भी विद्यार्थी देना नही चाहता है, परंतु देनी पड़ती है। अब कुछ ही दिन शेष रह गए थे। जब इम्तिहान की तारीक नजदीक आई तब कुछ होनहार विद्यार्थियो को लगा कि अब हमे किताबे खोलनी चाहिए। ढेरों विद्यार्थी जो कभी लेक्चर मे ध्यान तक नही देते थे वे अभी कॉलेज की लाइब्रेरी मे जाकर पढ़ने की भरपुर कोशिश करने लगे। कुछ तो पंद्रह मिनट पढ़कर थक गए थे क्योकि वे पूरे सेमेस्टर का एक साथ पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। उन्होनें कभी गौर से अपनी किताब तक नही देखी थी। पाठ के नाम भी पहली बार पढ़ रहे थे। इम्तिहान का माहौल था लिहाजा जिन विद्यार्थियो की किताब से अदावत थी वे भी अब उन्हें प्रेमिका की भाति नजदीक रखकर पढ़ रहे थे। कुछ तो उनके साथ बैठकर अध्ययन कर रहे थे जो पढ़ाई मे तेज हो। जो प्रत्येक लेक्चर मे बैठा हो। कॉलेज के जो शरारती छात्र थे, उनका मकसद साफ था। उनको सिर्फ उत्तीर्ण होना था। अच्छे अंको से उनका दुर दुर तक कोई नाता नही था। वे केवल उत्तीर्ण हो जाए इसी मे वे खुश थे। ऐसे छात्र जल्दी से अपना पेपर लिखते और सबसे पहले परीक्षा कक्ष से बैग लेकर बाहर निकल जाते है। जिनको सवालो के जवाब याद नही होते थे या समझने मे कठिन लगते थे वे छात्र सवालों के जवाबों को रट लिया करते थे। जवाब को रट लेने के बाद परीक्षा के वक्त किसी से पुछना नही पड़ता है बस जैसा याद है वैसा पूरा कागज पर उतार दो। शिक्षक हमेशा रटने के लिए मना करते है, लेकिन ऐसे विद्यार्थी सुनते कहा है शिक्षको की।
     पेपर मे एक सवाल को मुरत्तलिफ तरीके से पूछा जा सकता है किन्तु उसका जवाब कही ना कही एक ही होता है, इस प्रकार की कुछ बातें केशव और जय द्वारा युसुफ को बताई जा रही थी। केशव ने युसुफ को कह दिया था कि किसी भी प्रश्न का जवाब, जवाब की तरह ही लिखना, ना कि अपनी कोई दास्ताँ। वरना फिर अंक भी उसी प्रकार से कागज पर छपकर आएँगे। युसुफ ने प्रश्न और उत्तर से ज्यादा तो खुदा का नाम रट लिया था। उसका मानना था कि खुदा का नाम जुबां पर रखने से पेपर मे अच्छे अंक आ जाएंगे। परीक्षा के दिनो मे जिस लड़के के पीछे युसुफ को बैठना था उस लड़के से उसने पूरे सेमेस्टर बात तक नही की थी मगर इम्तिहान के डर से युसुफ ने उसको दोस्त बना लिया। अब उसके हाल-चाल पूछने के साथ ही साथ उसकी खुशामद भी करने लगा। ताकि वो खुश हो जाए और युसुफ की परीक्षा मे मदद कर दे। युसुफ वैसे तो हँसी-मजाक करने वाले लड़को मे से था लेकिन इम्तिहान का दबाव अब उसे पढ़ने के लिए मजबुर कर रहा था। युसुफ जहाँ सोता था वहाँ उसने सभी महत्वपूर्ण सवालों के सुत्र और कही सारे जवाब चिपका दिए थे। ये सोचकर कि दिखते रहेंगे तो जल्दी से याद हो जाएंगे।
     लक्षिता और सकीना दोनो साथ मे लाइब्रेरी मे पढ़ती थी। इम्तिहान के कुछ दिनो पहले से मानो लाइब्रेरी ही दोनो का घर बन गया हो। शाम तक पढ़ती थी उसके बाद दोनो अपने घर चली जाती थी। सकीना इम्तिहान के वक्त भी अपनी गजलें, कविताए पढ़ती या लिखती रहती थी। लिखने का वो अलग से वक्त निकाल ही लेती थी। एक प्रश्न के जवाब को याद करने के बाद पुरानी फिल्मों के गीत गुनगुनाने लगती थी। कभी 'अँखियों के झरोखे से' कभी 'उड़े जब जब जुल्फे तरी' तो कभी 'मैं एक सदी से बैठी हूँ' इस प्रकार के गाने गुनगुनाती और लक्षिता को भी सुनाती। इससे लक्षिता का भी मनोरंजन हो जाता था। जब लक्षिता को गजलें या कविताएँ सुनने का मन करता तो फटाक से सकीना को बोल देती थी। सकीना जैसा वक्त होता वैसी कविता सुनाती थी। इम्तिहान का माहौल था इसीलिए उसने प्रेरणादायक कविता सुनाने का फैसला किया। उसने आनंद बख्शी साहब की लिखी प्रथम प्रकाशित कविता पुरी सुना दी। कुछ इस तरह से - 
     
     गिरेगी बिजलिया कब तक, जलेंगे आशियां कब तक
     खिलाफ अहल-ए-चमन के तू रहेगा आसमां कबतक।
     सतायेगा, रुलाएगा, जलाएगा जहान कबतक,
     ज़मीन, जहनो जिस्म, जान से, निकलेगा धुआँ कब तक।
     निजाम-ए-गुलिस्तान, अहल-ए-गुलिस्तान ही संभालेंगे,
     तेरी मनमानिया, तेरी हुकुमत, बागबान कब तक।
     हमारी बदनसीबी की आखिर कोई तो हद होगी,
     रहोगे तुम, ना मेहरबान, ऐ मेहरबान कब तक।
     मेरी आंखें बरसती हैं मुसलसल हिज्र में बख्शी,
     मुकाबिल इनके बरसेगी भला ये बदलिया कब तक।
     
     अध्ययन के साथ उसे ये सब चीजें ओर भी अच्छे से सवाल समझने मे मदद करती थी। शायद यही कारण है कि सकीना को इतना पसंद है गजलें और कविताएँ लिखना। 
     लक्षिता अपने लिखे हुए और पासबुक से सभी सवालो को ध्यानपुर्वक पढ़ चुकी थी। उसको अगर कोई सवाल समझाने को पुछता तो लक्षिता उसे समझा देती थी इससे उसका भी रिवीजन हो जाता था। जो सवाल उसको भी समझ मे नही आते थे या माथे के ऊपर से निकल जाते थे। फिर ऐसे ढिट सवालों को लेकर लक्षिता केशव या जय के पास जाती थी। जय, केशव पूरा सेमेस्टर थोड़ा थोड़ा अध्ययन करते रहते थे। इससे उनको परीक्षा के वक्त आसानी होती थी। इम्तिहान के एक दिन पहले जब केशव और जय लक्षिता को लेने कक्षा मे पहुचें तब लक्षिता और सकीना अपने दोस्तो को महत्वपूर्ण सवाल समझा रही थी। जब केशव ने लक्षिता को चलने को कहा तब उसने दो मिनट रुखने का इशारा किया। तत्पश्चात दोनो दोस्त लक्षिता और सकीना का कक्षा के बाहर रखी कुर्सी पर बैठकर बाट जोने लगे कि कब आए और घर की तरफ प्रस्तान करे। दो मिनट का कहकर पुरे बीस मिनट तक रुक गई थी। 
     चारो दोस्त कॉलेज के द्वार पर आ जाते है और कल की परीक्षा के लिए एक दुसरे को All the best बोल देते है।

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