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किताबों से घिरी हुईं एक लड़की

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किताबों से घिरी हुईं एक लड़की...... इस शहर में कितने लोग मिलें सब भूल गए कुछ याद नहीं। एक शख़्स किताबों जैसा था, वो शख़्स ज़ुबानी याद हुआ।       किसी भी लेख या कहानी की शुरुआत करना बड़ा मुश्किल है। लिखने वाला हमेशा असमंजस की स्थिति में रहता है कि कहाँ से शुरू करू ? ये शुरूआत ठीक उसी प्रकार की होती है जैसे एक बच्चा बस चलना सीख रहा हो। इस चलने में वो कई दफ़ा गिर जाता है। लिखने की शुरूआत भी ऐसे ही होती है। एक लेखक काफी कुछ लिखता है और मिटा देता है। कुछ लिखना चलना है और कुछ मिटाना फ़िर गिर जाना है। लेकिन एक वक्त पर वह अपना लिखने का आधार बना लेता है, ठीक उसी प्रकार जैसे एक बच्चा गिर-गिरकर अपने चलने का आधार बना लेता है। कार्य चाहें कोई भी हो लेकिन उसकी शुरुआत हमेशा दिमाग़ को सोचने पर मजबूर कर देती है। मुख्य कहानी पर आने से पहले हमेशा एक कहानी पहले से चलती रहती है जिसका संबंध सीधा मुख्य कहानी से होता है। कहीं से तो शुरुआत करनी ही थी इसलिए मैंने यहाँ से कर दी।       अक्सर किसी नए दोस्त या व्यक्ती के साथ अचानक बाहर कहीं घूमने चले जाना मन में एक हल्कापन महसूस करवाता ...