आगाखां पैलेस ( पुणे की सबसे खूबसूरत जगह )
यहाँ एक अलग ही वातावरण था। ऊपर नीला आसमान और नीचे हरा-भरा परिसर। पड़ों की पत्तियां हवा का सहारा लेकर बातें कर रही थी और उनकी बातें मुझे स्पष्ट रुप से सुनाई दे रही थीं। रह-रहकर पक्षियों की आवाज़ भी कानों में दस्तक दे रही थी। पेड़ों की छाव ज़मीन को ठंडा कर रही थी। पुणे में तेज़ धूप होने के बावजूद यहाँ इतना ठंडा वातावरण था। शायद यही कारण है कि पेड़ों का हमारे जीवन में होना कितना महत्त्वपूर्ण है।
मैं आगाखां पैलेस के परिसर में खड़ा था। स्तब्ध सा। पैलेस की खूबसूरती को बयां नहीं किया जा सकता। पैलेस की खूबसूरती को बयां करना सुरज को आइना दिखाने जैसा है।
पैलेस के अन्दर तक जाने वाली सभी सड़के साफ-सुथरी थी। कुछ पत्ते ज़रूर पेड़ों की डाल से टूटकर ज़मीन व सड़क पर पड़े थे। शायद यह पतझड़ की शुरुआत है। रात को रोशन करने के लिए सड़क किनारे स्ट्रीट लैंप लगें हुए हैं।
भारतीय पर्यटनों के लिए प्रवेश मूल्य है मात्र 5 रुपए और विदेशी पर्यटनों के लिए मूल्य है 100 रुपए। यह पैलेस सुबह नो बजे से साढ़े पांच बजे तक खुला रहता है।
आगाखां पैलेस भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। प्राचीन भारत से लेकर मध्यकाल तक, भारत में ऐसे कई महल, फोर्ट, भवन और पैलेस का निर्माण हुआ जो भारतीय इतिहास के लिए बेहद ही महत्वपूर्ण मानें जातें हैं। लाल किला, क़ुतुब मीनार, ताजमहल, शनिवार वाड़ा, मैसूर पैलेस, उम्मेद भवन पैलेस न जानें कितने और नाम। इन्हीं नामों में शामिल है महाराष्ट्र के पुणे शहर में स्थित आगाखां पैलेस।
भारत की स्वतंत्रता की दृष्टिकोण से आज भी इस पैलेस को महत्वपूर्ण माना जाता है। महात्मा गांधी, उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी, सरोजिनी नायडू और महादेव देसाई जैसे कई महान व्यक्तियों के सन्दर्भ में भी इस पैलेस को याद किया जाता है।
आज ये पैलेस पुणे में एक प्रमुख पर्यटक स्थल भी है। इस पैलेस का निर्माण सुल्तान मुहम्मद शाह आगाखां III द्वारा साल 1892 के आसपास किया गया था। यह लगभग 19 एकड़ से भी अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। इसी जगह पर महात्मा गांधी, उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी, सरोजिनी नायडू और महादेव देसाई को बंदी बना के रखा गया था। यही पर कस्तूरबा गांधी और महादेव देसाई की मृत्यु भी हुई थी। महादेव देसाई की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई थी। आज भी इस महल के गार्डन में महादेव देसाई की समाधि स्थल मौजूद है। यहीं से गांधी जी 'भारत छोड़ो आंदोलन' के संचालन की रणनीति बनाते थे। तक़रीबन दो साल तक कई स्वतंत्रता सैनानियों को यहां कैद करके रखा गया था।
पैलेस जितना बाहर से खुबसूरत है उतना ही अन्दर से भी खुबसूरत है। पैलेस की बनावट ( डिजाइन ) हमें अपनी ओर खींचती है। पैलेस के कुछ ही हिस्सों में घूमने की अनुमति है। घूमने, देखने और जानकारी हासिल करने के लिए यहां 'कस्तूरबा गांधी स्मृति भवन' है। इसके आलावा पैलेस में भव्य गांधी संग्रहालय भी है, जो लोगों के लिए बेहद ही खास है। इस संग्रहालय में महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी से संबधित उनकी निजी चीज़े मौजूद है जैसे - उनकी चप्पलें, चरखा, बर्तन, किताबें, कपड़े और चश्मा आदि। दीवारों पर चित्र बने हुए हैं जिनके साथ महत्त्वपूर्ण जानकारियां भी मौजूद है।
शाम का पहर लग चुका था। लोग परिसर की घास पर इत्मीनान से बैठे थे। कुछ बच्चें खेलने में मसरूफ़ थे। चिड़ियों का चहचहाना ज़ारी था। मैं परिसर में आया और विशाल पैलेस को अपने फ़ोन के कैमरे में कैद करने लगा एक याद के तौर पर।
मुझ पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था। और देते भी कैसे ? सभी लोग तो आगाखां पैलेस और वहां के वातावरण की खूबसूरती में लीन थे। लेकिन मैं उनपर ध्यान क्यों दे रहा हूं। मुझे भी उसी खुबसूरती का मज़ा लेना चाहिए जिसमें ये सभी लोग मसरूफ़ है। आगाखां पैलेस !
© रविंद्र मुंडेतिया
Wohe keh rhi ho palace par dyaan do aachi cheezo ki honi ka maza utao
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