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"तुम पीते हो सिगरेट ?"

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किसी इन्सान की आंखों में सपनों का होना ही ये तय करता हैं कि वो इन्सान जिंदा है या मुर्दा। बिना सपनो के जीने वाला इन्सान मुर्दे के बराबर होता है।      ये मेरी शिफा के साथ दूसरी मुलाकात थी। इससे पहले हम दोनों सीएसटी में स्थित 'क़िताब खाना' गए थे। हालाकि वो कभी कभार कॉलेज के कैम्पस में नज़र आ जाती है। एक ऐसी दोस्त जो खास लगती है अपनी बातों से, अपनी मुस्कुराहट से, अपने अंदाज से। हमने दादर, शिवाजी पार्क के यहां कुछ देर वक्त गुजारने की सोची। शिफा जॉब पे थी। उसने आखिरकार आज वक्त निकाल ही लिया। हम दोनों जीटीबी स्टेशन के नजदीक मिलें। उसने गहरे आसमानी रंग की टी-शर्ट और जींस पेंट पहन रखी थी। हमेशा की तरह ये ड्रेस भी उसके ऊपर जच रही थी। शिफा हेलमेट, मास्क और चस्मा लगाए अपनी एक्टिवा पर बैठी, मेरा इंतजार कर रही थी, हालाकि इसके पहले मैं उसका इंतजार कर रहा था। पांच बजकर दस मिनिट पर हम लोग जीटीबी से निकले। शिफा बड़े अच्छे से एक्टिवा चलाती है। शिफा उन लडकियों में से नहीं हैं जो ब्रेक मारने से पहले अपने पैरों को जमीन पे रगड़ने लगती है।  ( शिवसेना भवन )    ...