'सितारे जमीन पर' हमें क्या सिखाती है ?

 

( फिल्म का पोस्टर ) 


शाम के क़रीब साढ़े नौ बजे हुए थे। मैं दादर के चित्रा सिनेमा से बाहर निकल रहा था। थिएटर में सिर्फ़ वयस्क और माता पिता ही नहीं थे बल्कि उनके साथ बच्चें भी थे। अधिकतर लोगों को फिल्म नॉर्मल लगी, लेकिन अच्छी वाली नॉर्मल। फिल्म में हास्य के, दुःख के, उत्सुकता के और भावुक कर देने वाले पल थे। आमिर खान की यह फिल्म सभी का मिश्रण थी।  

( चित्रा सिनेमा, दादर )


साल 2007 में आमिर खान की फिल्म 'तारे ज़मीन पर' आई थीं। छोटी उम्र और फिल्मों की ज्यादा समझ न होने के कारण 2007 में तो यह फिल्म मैं देख नहीं पाया लेकिन बाद में इस फिल्म को जरूर देखा। फिल्म 'तारे ज़मीन पर' बच्चों को देखने और समझने का नज़रिया बदलती है। यह फिल्म डिस्लेक्सिया से ग्रसित एक बच्चें की कहानी थी। 'डिस्लेक्सिया' एक विशिष्ट पढ़ने संबंधी विकार है जिसमें व्यक्ति शब्‍दों को सही ढंग से पढ़ने लिखने में परेशानी महसूस करता है। इस फिल्म में आमिर खान ने एक शिक्षक की भूमिका अदा कर समाज को एक सामाजिक संदेश दिया था। 

अब 18 साल बाद आमिर खान 'सितारे ज़मीन पर' लेकर आए है। इसे 'तारे ज़मीन पर' की सीक्वल के तौर पर प्रचारित किया गया है। हालांकि यह फिल्म न तो बच्चों की है और न ही बच्चों के लिए बनाई गई है। इस बार फिल्म में डाउन सिंड्रोम का मुद्दा है जिसमें व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक विकास देरी से होता है। फिल्म की एक खास बात ये भी है कि आर. एस प्रसन्ना ने अपनी इस फिल्म में न्यूरोडाइवर्जेंट बच्चों का किरदार निभाने के लिए डाउन सिंड्रोम और ऑटिज्म से पीड़ित कलाकारों को कास्ट किया है। इन एक्टर्स से एक्टिंग कराना आसान बात नहीं थी, लेकिन उन्होंने बड़ी सहजता से इन्हें बड़े पर्दे पर पेश किया है। 

( फिल्म का ट्रेलर )  


अंतिम बार किसी फिल्म को देखकर अगर भावुक हुआ था तो वो थी अक्षय कुमार की 'केसरी'। मेरी अभी तक की लाइफ में बहुत कम हुआ है जब मैंने किसी फिल्म को थिएटर में जाकर देखा हो। अंतिम बार 'गदर 2' को बड़ी स्क्रीन पर देखा था लेकिन फिल्म नॉर्मल लगी। 

काफ़ी दिनों से एक अच्छी फिल्म का इंतजार था। 'तारे ज़मीन पर' ने प्रभावित किया था लिहाज़ा यही कारण है कि मैंने 20 जून को 'सितारे ज़मीन पर' के लिए चित्रा सिनेमा में अपनी सीट बुक की थी।

( फिल्म का टिकट ) 


'सितारे जमीन पर' की कहानी

फिल्म 'सितारे जमीन पर' में गुलशन अरोड़ा (आमिर खान) नामक एक असिस्टेंट कोच की यात्रा दिखाई गई है। गुलशन अपने आगे दूसरों को कमतर समझता है और अपनी कम ऊंचाई के कारण उसे कांप्लेक्स है। वह लिफ्ट में जाने से भी डरता है क्योंकि बचपन में वह एक बार लिफ्ट में फंस गया था। गुलशन की जिंदगी में कई समस्याएं हैं। उसे नशे में धुत होकर पुलिस की गाड़ी को टक्कर मारने के कारण अदालत द्वारा सजा सुनाई जाती है। अदालत उसे तीन महीनों के भीतर बौद्धिक रूप से अक्षम बास्केटबॉल टीम को प्रशिक्षित करने की सजा देती है।

गुलशन शुरुआत में इन बच्चों का मजाक उड़ाता है, लेकिन धीरे-धीरे वह उनकी जिंदगी, सादगी और मासूमियत से वाकिफ होने लगता है। इस दौरान, उसकी अपनी जिंदगी में भी कई समस्याएं हैं। उसकी पत्नी सुनीता मां बनना चाहती है, लेकिन गुलशन इसके लिए तैयार नहीं है। हालांकि, सुनीता गुलशन की मदद के लिए उसके साथ आती है और साथ में वे टीम को फाइनल तक ले जाने के लिए तैयार करते हैं।

इस कहानी में गुलशन की यात्रा एक प्रेरणादायक उदाहरण है जो दर्शाता है कि कैसे एक व्यक्ति अपनी जिंदगी में सकारात्मक परिवर्तन लाकर दूसरों की जिंदगी में भी बदलाव ला सकता है।


फिल्म हमें क्या सिखाती है ?

दर्शकों के लिए यह कह देना बहुत आसान है कि "फिल्म अच्छी नहीं है।", "फिल्म तो फालतू है।", "एक्टिंग अच्छी नहीं है।" लेकिन सच बात ये है कि फिल्म चाहे हिट हो या फ्लॉप हो कलाकार मेहनत उतनी ही करता है। हिट होने वाली फिल्म में भी कलाकार उतनी ही मेहनत करता है जितनी फ्लॉप होने वाली फिल्म में कोई कलाकार करता है। 

'तारे ज़मीन पर' हमें सिखाती है कि हर बच्चा खास होता है और उसे अपनी गति से सीखने का अधिकार है और 'सितारे ज़मीन पर' हमे सिखाती है कि - 

1) हर किसी का "नॉर्मल" अलग होता है। 

हमें दूसरों को उनके अंतरों के साथ स्वीकार करना चाहिए। हम अक्सर अपने सामने वाले से भी यही उम्मीद करते है कि जितना मैंने किया है उतना तू भी कर। या यूँ कह कह सकते है कि सामने वाले के पास जो कला है या जो क्षमता है उसको भी स्वीकार नहीं कर पाते है क्योंकि वो हमें अलग लगता है। 

2) विकलांग बच्चों के प्रति संवेदनशीलता।

हमें विकलांग बच्चों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए और उनकी प्रतिभा को पहचानना चाहिए। इससे उन्हें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने और समाज में सकारात्मक योगदान करने में मदद मिलेगी। हमें उनकी क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। वे भी हमारे इसी समाज का हिस्सा है जिसमें हम रह रहे है। 

3) सकारात्मक दृष्टिकोण।

इस फिल्म में आमिर खान को सकारात्मक दृष्टिकोण देने में अहम भूमिका निभाई है उनकी माँ, उनकी पत्नी और सर्वोदय केंद्र के संचालक करतार सिंह ने। आमिर यानी गुलशन शुरुआत में इन बच्चों का मजाक उड़ाता है, लेकिन बाद में वह उनकी जिंदगी, सादगी और मासूमियत से वाकिफ होने लगता है और एक बड़ा यही कारण है कि इसके बाद गुलशन अपनी लाइफ की इस घटना को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने लगता है। सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने के बाद इंसान को उन सभी चीजों में आनंद आने लगता है जिसको वो एक वक्त पर मना कर रहा होता है। लिहाज़ा हम सभी की जिंदगी में सकारात्मक दृष्टिकोण होना बेहद आवश्यक है। 

4) जीवन के सबक।

फिल्म में गुलशन को लगता है कि वो इन बच्चों को सिखा रहा है लेकिन वास्तव में गुलशन को एक वक्त पर पता चलता है कि ये बच्चें उसको ज़िंदगी का अहम सबक सिखा रहे है। सबक है - एक इंसान बनने का। हमें अक्सर बड़े ही नहीं बल्कि हमसे कम उम्र के लोग भी कभी कभार जिंदगी की महत्वपूर्ण बातें सिखा जाते है। फिल्म में, आमिर खान का किरदार भी बच्चों से सीखता है और खुद को बेहतर इंसान बनाता है। 

5) हमारा 'EGO' हमें लोगो से दूर करता है। 

हमारा 'EGO' अक्सर हमें किसी के सामने झुकने नहीं देता है। कही बार हमें अंदर से अहसास हो जाता है कि हम गलत है, हमारी ही गलती है फिर भी हम माफ़ी नहीं मांगते। इंसान के अंदर बैठा हुआ 'EGO' अक्सर उसे लोगों से दूर कर देता है। जिस प्रकार फिल्म में गुलशन अपनी पत्नी से दूर हो जाता है। 

6) माफ़ी मांगना और माफ़ करने का भाव।

कितना अच्छा शब्द है 'SORRY' और उससे भी अच्छा है कि आप किसी को माफ़ कर दो। हमें बचपन से सिखाया जाता है कि कुछ भी गलती हो तो माफ़ी मांग लो। कही बार माफ़ी मांगने और माफ़ करने के बीच हमारा 'EGO' आ जाता है जिसके कारण इंसान ना माफ़ी मांगता है और ना ही माफ़ करता है। फिल्म में एक वक्त आने पर गुलशन अपनी पत्नी से माफ़ी मांगता है और उसकी पत्नी सुनीता भी उसे माफ़ कर देती है जिसके कारण उनका रिश्ता फिर हरा - भरा हो जाता है। इंसान को अपनी भावनाओं को लेकर इतना कठोर नहीं होना चाहिए कि वो किसी को माफ़ ही न करे या माफ़ी ही न मांगे। माफ़ी मांगने से और माफ़ करने से दिल हल्का हो जाता है। 

फिल्म को लेकर सभी के अपने अपने रिव्यू होते है। कोई फिल्म को अच्छा बताता है तो कोई बुरा। लेकिन ये तो यूनिवर्स की एक सच्चाई है जो हमें स्वीकार करनी होगी। और सच्चाई ये है कि आपका काम सभी को पसंद नहीं आएगा। आप सभी के दिलों में राज़ नहीं कर सकते। और जो व्यक्ति इस बात को समझ लेगा वो कभी हार नहीं मानेगा। इंसान का काम है कार्य करना न कि फल के बारे में सोचना। आप अपने काम से खुश हो बस इतना ही काफ़ी है रात सुकून से गुजारने के लिए। मेरा यह विचार न सिर्फ़ फिल्में बनाने वालों के लिए है बल्कि दुनिया के उन तमाम क्रिएटिव लोगों के लिए है जो रोज़ नया करने की सोचते है।


© रविंद्र मुंडेतिया


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