मेट्रो... उन दिनों ( हमारी 'कॉमन' मेट्रो ) - 2



शनिवार और रविवार के अलावा बाकी दिनों में मेट्रो में बहुत भीड़ होती है। मुंबई का मेट्रो लाइन वन यानी घाटकोपर से वर्सोवा लाइन किसी विरार फास्ट लोकल से कम नहीं। आगे पीछे से मजबूत धक्के लगते है। मेट्रो के ऑटोमैटिक दरवाज़े ऑटोमैटिक बंद भी नहीं हो पाते। भीड़ इतनी की टेक्नोलॉजी भी फैल हो जाती है। मैं कई दफ़ा मेट्रो की भीड़ में ऐसी जगह खड़ा हो गया जहां मुझे कुछ देर सांस लेने में भी समस्या हुई। इतनी भीड़ में मेट्रो की AC भी काम नहीं करती है। सभी के सिर से निकला पसीना गालों और गले तक आ जाता है। कभी पसीना गालों से होते हुए नीचे टपक जाता है तो कभी गले से नीचे उतर जाता है। छोटे कद वालों की अलग ही समस्या होती है। वे मेट्रो के ग्रेब हैंडल नहीं पकड़ पाते। पास खड़े लंबे कद के व्यक्ति की बगले सुंघनी पड़ती है। 

( घाटकोपर मेट्रो स्टेशन पर रोज का मेला )

ये सच है कि आप मुंबई में अगर नए है तो 'सफ़र कैसे करना है ?' ये आपको सीखना पड़ेगा। यहाँ सफ़र करने के कुछ रूल्स है। सबसे सामान्य रूल है 'बैग आगे लटका के सफ़र करना'। ये रूल सभी जगह लागू होता है फिर आप चाहे मेट्रो में सफ़र कर रहे हो या लोकल ट्रेन में या फिर बेस्ट की बसों में।

( सभी लोगों का एक ही साथी )

मैं आज के दिन की कुछ लेटेस्ट हैपनिंग पर नज़र डाल रहा था। कुछ ऐसी खबरें छांट रहा था जो आज के टॉप 20 में ले सकूं। मैं खबरें खोज के अपने फॉर्मेट में लिखने लगा। बहुत ज़्यादा टाइपिंग करने से मेरी टाइपिंग स्पीड अब बढ़ गई। अब तो मेरा स्मार्टफोन इतना स्मार्ट हो गया है कि वाक्य के अनुसार फोन शब्द भी सुझा देता है। 

मैं मेट्रो के उस दरवाज़े की ओर मुँह करके खड़ा था जो स्टेशन आने पर खुल रहा था। मेट्रो के अंदर रह रहकर अनाउंसमेंट के बीच में विज्ञापन भी आ रहे थे। कभी विज्ञापन तो कभी किसी बॉलीवुड के नए गाने का प्रमोशन। शहरों में रहने वाले लोग अक्सर विज्ञापनों के बीच ही दिन गुजारते है। देखा जाए तो नाइन टू फाइव जॉब करने वाला व्यक्ति भी एक विज्ञापन ही है। हम सभी अपने आप को बेच ही रहे है। हम सभी क्लाइंट के हाथों अच्छे दामों में बिक जाना चाहते है क्योंकि कंपनी और कंपनी का मालिक यही चाहता है। 

( साकी नाका मेट्रो स्टेशन से नज़ारा )

मैं अपने फोन में लगा था। न्यूज की अलग अलग वेबसाइट्स को स्क्रॉल कर रहा था। कोई अचानक आया और मुझे 'प्रिंस' नाम से संबोधित किया जो कि मेरा निक नेम है। मैंने अपना सिर उठाया और उसकी ओर देखा। अरे... ये तो काव्या है। मुझे कुछ सेकंड लगे उसे याद करने में। मैं उसे भूल चुका था। काव्या मुझे 4 दिन पहले 'मरोल नाका' स्टेशन पर मिली थी। मुझे अचानक ये भी याद आया कि मैने काव्या को अपना नाम नहीं बताया है लेकिन मुझे यक़ीन था कि उसको जब मेरा निक नेम पता चल गया है तो मेरा नाम भी पता चल गया होगा। 

"हाय... काव्या!"- मैंने हाथ आगे बढ़ाया। 

"हेल्लो... मि. रविंद्र मुंडेरीया!"- उसने हेलो को लंबा खींचा लेकिन बाकी लोगों की तरह उसने भी मेरे उपनाम का उच्चारण गलत किया। 

काव्या का हाथ मुलायम था। गेहुंए रंग के उसके हाथों में एक काला धागा बंधा था। उसने आज स्लीवलेस कुर्ती और प्लाजो पहना था। बालों में क्लिप। 

"It is not 'Munderiya'. It is 'Mundetiya'. There is 'Ti' not 'Ri'."

"Ooo... Means Mun_ De_ti_ya. Right ?" - उसने मेरे सरनेम के चार टुकड़े किए और मुझसे कन्फर्म किया। 

"Yes, अक्सर लोग मेरे सरनेम का उच्चारण पहली बार में गलत ही करते है।"

"तुम्हारा नाम और निक नेम अच्छा है। तुम्हारा नाम प्रिंस क्यों नहीं है ?"

"एक्चुअली जब मेरा नामकरण हो रहा था, उस वक्त वहाँ कोई मॉडर्न व्यक्ति नहीं था जो प्रिंस नाम पंडित को सजेस्ट करें।" - मैं हँस दिया साथ में काव्या भी। 

"वैसे तुम हो बड़े छुपेरुस्तम!"- काव्या ने अपनी गर्दन हिलाई और आँखों को थोड़ा बंद करते हुए कहा।

"कैसे ?"

"क्या कैसे, संडे को जब हम मिले तो लिटरेचर पर कितनी बातें की लेकिन तुमने ये नहीं बताया कि मैंने दो किताबें प्रकाशित की है।"

मुझे याद है मैं काव्या से मिला था लेकिन कौन से वार को मिला ये तो मैं भूल चुका था। मेरे दोस्त सही कहते है। वे कहते है रविंद्र जब से तु जॉब पर लगा है एंजॉयमेंट करना भूल गया है, पूरा का पूरा कॉरपोरेट मजदूर बन गया है तु। तेरी जिंदगी रोबोट जैसी बन गई है। सुबह उठो, काम पर जाओ, शाम को ऑफिस से लौटो और सो जाओ, बस इसी में सीमित रह गई है तेरी लाइफ। क्या ये सच है ? मैंने संडे के दिन काव्या से मेट्रो में कुछ देर बातें की। लेकिन शायद दूसरे ही दिन भूल गया और अपनी जॉब लाइफ में व्यस्त हो गया। काव्या ने मुझे मेरे ख्यालों से बाहर निकालने के लिए चुटकी बजाई। 

"ओए हेलो... कहाँ खो गए लेखक साहब।"

"कुछ नहीं।"

"मुझे लगा तुम अपनी तीसरी किताब के बारे में सोच रहें हो।"

"ऐसा कुछ नहीं।"

"और अगर ऐसा है भी तो ये अच्छी बात है।"

"संडे के बाद तुम मेट्रो में दिखी नहीं ?"

"प्रिंस, ये सवाल मैं तुमसे पूछने वाली थी।"

"इसका मतलब इन तीन दिनों में हमने वो मेट्रो छोड़ दी जो हमारे लिए 'कॉमन मेट्रो' थी। Right ?"

"Correct."

"तुमको पता है। मैं तुम्हारा सरनेम इसलिए थोड़ा भूल गई क्योंकि तीन दिनों का गैप आ गया।" - काव्या बोलते हुए थोड़ा हँसी। 

"अच्छा हुआ गैप लंबा नहीं था वरना..."

"वरना क्या ?"

मैं बोलने वाला था कि वरना तुम मुझे भी भूल जाती लेकिन मैं रुक गया। यहाँ ऐसा कुछ बोलना सेंस नहीं बनता। मैंने कहा - 

"वरना तुम मेरा पूरा सरनेम भूल जाती।"- मैंने थोड़ा मुस्कुरा दिया।

"कह सकते हो।"

"वैसे तुम राजस्थानी हो ?"

"हाँ। तुमको कैसे पता ?"

"थोड़ा इन्वेस्टिगेशन तो हम भी कर लेते है लेखक साहब!"- उसने इतराते हुए कहा।

"शायद आप भूल गए हो कि आपकी ही एक किताब के पीछे आपने अपना परिचय दिया हुआ है।"- इस वाक्य को बोलते हुए उसने कुछ अभिनय भी किया। 

"अच्छा... याद आया।" 

आज तो बातों ही बातों में 'अंधेरी स्टेशन' भी निकल गया। 'आज़ाद नगर' आने वाला था। 

"By the Way, तुम्हारा बर्थ प्लेस कहा है ?"

"अगर मैं ना बताओ तो ?"- काव्या ने आँखों को मटकाते हुए कहा।

"तुम ही बता सकती हो। और अगर तुम्हारी भी जानकारी गूगल पर है तो मुझे बताओ, हम सर्च कर लेंगे।"

"No, I am not on Google."

"तो फिर बताओ।"

"I am from Lucknow."

"नवाबों के शहर से हो। लेकिन तुम लगती नहीं हो।"

"तुम भी राजस्थानी लगते नहीं हो।"

"अच्छा... लेकिन मैं तो वही से हूँ।"

"हाँ तो हम भी लखनऊ से है।"

"UP से मेरे कुछ दोस्त है।"

"आधी से ज्यादा मुंबई UP वालों से भरी है।"

"Yaa, Correct. क्योंकि मुंबई रोज़गार देती है।" 

"काम देती है लेकिन ज़िंदगी सस्ती कर देती है।"- काव्या ने कहा। 

मैं अब आगे क्या बोलू ? इसमें कोई शक नहीं है कि मुंबई ज़िंदगी सस्ती कर देती है। स्टेशनों पर दिखाई देने वाली भीड़ यही दर्शाती है।

"ओके, मेरा स्टेशन आने वाला हैं काव्या।"

"तुमको पता है प्रिंस, हम दोनों में एक चीज़ 'कॉमन' है ?"

"कौनसी ?"

"मैं क्यों बताऊँ ? तुमने भी तो अपना नाम मुझे नहीं बताया था।"

'डी.एन नगर' स्टेशन आ चुका था। मेट्रो धीरे हो गई थी। बस दरवाज़े खुलने वाले थे। 

"लेकिन मैंने नाम जानने का रास्ता बताया था।" - मैंने कहा।

मेट्रो के दरवाज़े खुल गए थे। लोग बाहर निकल रहे थे। दरवाज़े खुलने पर बाहर की दुनिया का शोर मेट्रो के अंदर आया। मैं वो 'कॉमन' चीज़ जानने के लिए और थोड़ी जिद्द करने वाला था लेकिन स्टेशन आ चुका था। 

"Bye Prince. Think about what could be 'common'. This is your assignment."- काव्या ने एक मीठी सी हँसी होठों पर लाते हुए कहा। बोलते वक्त बालों की एक लट काव्या के चेहरे पर आ गई। उसने बालों की लट को कान के पीछे रख दिया। मेरे चेहरे पर हँसी भी थी और एक गहरी सोच कि क्या हो सकती है वो 'कॉमन' चीज़। मैं बस "बाय" कहकर, मेट्रो का दरवाज़ा बंद होने के 2 सेकंड पहले मेट्रो से निकल गया। 

'क्या हो सकती है 'कॉमन' चीज़।' - दिमाग़ ने दोहराया जब में एस्केलेटर से नीचे उतर रहा था।


© रविंद्र मुंडेतिया


( 'मेट्रो... उन दिनों' की कहानी अभी जारी है...


चैप्टर 3 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - 12th के बाद दोनों का एक ही इंट्रेस्ट

Comments

  1. बहुत अच्छा लिखा है।

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