मेट्रो... उन दिनों ( कहानी काव्या की ) - 4
बस अपना ही गम देखा है।
तूने कितना कम देखा है।
मुंबई, अगर इस शहर में जीना है, तो व्यक्ति को धक्के खाना और भीड़ में अपनी जगह बनाना सीख ही लेना चाहिए। यहाँ हर दिन न जाने कितने लोग आपसे टकराते हैं और साथ में सफ़र करते है। सड़कों पर, लोकल में, बस में और मेट्रो में, हर जगह लोग ही लोग है। सभी एक साथ सफ़र करते है लेकिन एक दूसरे से अंजान है। हर चेहरे के पीछे छुपी होती है एक अनकही कहानी। हर किसी के पास अपनी परेशानियाँ, अपनी जद्दोजहद और उम्मीदों से भरी एक दुनिया है। मैं भी इस अनंत भीड़ का एक हिस्सा हूँ और आप भी। हम सब एक ही शहर की लहर में बह रहे हैं, जहां रिश्ते कम, रफ्तार ज़्यादा है।
काव्या अंतिम बार रविवार को मिली थी जब मेरा एक एयरबड्स उसके पास ही रह गया। पिछले दो दिन से जब कभी एयरबड्स लगा रहा हूँ मुझे रविवार का वही दिन याद आ रहा है जब मैं हड़बड़ाहट में मेट्रो से निकला था और ये देख काव्या और कुछ लोग हँसने लगे थे। काव्या भी पिछले दो दिनों से उस एक एयरबड्स को बैग में लिए घूम रही है ताकि मैं मिलु और मुझे एयरबड्स लौटा दे। आज जैसे ही उसने मुझे देखा सबसे पहले एयरबड्स निकाला और मेरे कान में लगा दिया। लेकिन उसके ठीक बाद में उसने मेरे कानों से दोनों एयरबड्स निकलवा दिए। यह कहकर कि जब कोई तुमसे बात कर रहा होता है तब कानों में एयरबड्स मत डाला करो। इससे ये प्रतीत होता है कि तुम सामने वालों की बातों का आदर नहीं करते हो।
"लेकिन ऐसा कुछ नहीं है।" - मैंने कहा।
"I know Prince. तुम सुनते हो लोगों की बातें लेकिन सामने वाले को यह लग सकता है कि तुम उसकी बातों का आदर नहीं कर रहे हो।" - काव्या ने कहा।
"तुमने 12th लखनऊ से किया है ?" - पिछली बार उसने कहा था लेकिन मैने बात छेड़ने के लिए प्रश्न किया।
"हाँ।"
"फिर ग्रेजुएशन के लिए मुंबई का रुख कैसे किया ?"
"मीडिया में ग्रेजुएशन करना था इसीलिए मुंबई का रुख किया।"
"मीडिया से संबंधित अच्छी कॉलेजेस तो दिल्ली में भी है। वहाँ से भी कर सकती थी तुम। दिल्ली तो लखनऊ से नजदीक भी है।"
"हाँ नज़दीक तो है लेकिन फैमिली वालों ने मुझे दिल्ली नहीं भेजा।"
"क्यों ?"
"दिल्ली शहर उनको ठीक नहीं लगा। आज भी दिल्ली में दिन दहाड़े कुछ भी हो जाता है। और फिर दिल्ली शहर का इतिहास तो तुमको पता ही होगा। वहाँ आज भी लड़कियाँ रात को अकेली नहीं घूम सकती।"
"और फैमिली वाले मुंबई के लिए राज़ी हो गए ?"
"शुरू शुरू में नहीं लेकिन बाद में मान गए।"
"BMM लिया है मतलब 12th आर्ट्स से किया होगा ?"- मैंने अनुमान लगाया।
"नहीं।"
"तो फिर कौन से स्ट्रीम से ?"
"साइंस और मैथ्स से।"
"मारो ताली।"- मैंने अपना बाया हाथ उसकी ओर बढ़ाया और कहा।
"क्यों ?"- उसने ताली मारने के बाद कहा।
"क्योंकि एक ओर चीज़ हमारे बीच 'कॉमन' निकल गई।"
"मतलब तुमने भी साइंस, मैथ्स से 12th किया है ?"
"Yes, offcourse."- अब की बार उसने हाथ आगे बढ़ाया और मैंने ताली मारी।
"वैसे एक और चीज़ हमारे बीच 'कॉमन' हो सकती है ?"- काव्या ने कुछ सोचते हुए कहा।
"कौन सी ?"
"तुमको फोटोज़ क्लिक करने का शौक है ?"
"Yes, I mean मैं कही पे भी जाता हूँ तो वहाँ की फोटो क्लिक कर लेता हूँ।"
"Same here."
"तुमने अपना स्ट्रीम चेंज क्यों कर लिया ?" - काव्या ने पूछा।
"मुझे केमिस्ट्री सब्जेक्ट बिल्कुल समझ नहीं आता था और उस स्ट्रीम में आगे कुछ करने का खास मन नहीं था।"
"अच्छा हुआ जो चेंज कर लिया। BMM में आकर तुम लेखक बन गए।"
"तुमने क्यों ये स्ट्रीम छोड़ा ?"
"लगभग वही कारण है।"
"वैसे तुम्हारी फैमिली लखनऊ में करती क्या है ?"
"लखनऊ में हमारी मिठाई की दुकान है।"
"ओह्ह्ह... तभी तुम इतनी स्वीट हो।"- मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
"कुछ ज्यादा नहीं बोलने लगे हो तुम।"- यह कहते हुए काव्या ने मेरे पोलिस किए हुए जूतों पर अपना जूता रख दिया।
"अब मैं भी रखूं अपना जूता ?"
"ऐ... नहीं हाँ। व्हाइट जूते है, खराब हो जाएंगे।"
"अच्छा... खुद के शूज का इतना ख्याल और हमारे शूज पर सीधा वार।"
"राइमिंग अच्छा करते हो।"
"मिठाई की दुकान पापा चलाते होंगे ?"
"चलाते थे।"
"मतलब ?"
उसने मेरी ओर देखा और कहा - "मिठाई की दुकान अब बड़े भैया चलाते है। And my father has passed away."
"Ooo... Sorry."
"It's Okay Prince."
हमारा हँसी मजाक वाला वार्तालाप अचानक रुक गया। उसके साथ ही मेट्रो भी रुक गई। मैंने मेट्रो के दरवाज़े के ऊपर लगी टिमटिमाती लाइन को देखा। 'पश्चिम द्रुतगति मार्ग' स्टेशन आ चुका था। काव्या के सामने वाली एक सीट खाली हुई। काव्या ने मुझसे बैठने को कहा। मैंने मना कर दिया। तभी एक बुजुर्ग महिला आई और बैठ गई। मेट्रो फिर शुरू हो गई। इसी के साथ काव्या ने फिर वार्तालाप शुरू किया।
"इतने शांत क्यों हो गए हो ?"
"कुछ नहीं, बस ऐसे ही।"
"पापा की डेथ एक्सीडेंट से हुई थी। मैं सेकंड ईयर में जॉब पर लगी ही थी। अचानक एक दिन मम्मी का फोन आता है। खबर सुनते ही मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है। मैं उसी वक्त ऑफिस से निकली और फ्लाइट से लखनऊ पहुंच गई। मैं घर जाके बहुत रोई। मैं और मेरा बड़ा भाई हम दोनों तक़रीबन पापा को याद कर कर के आधे घंटे तक रोते रहे। मैं अपने भाई की बाहों में सिर रख के रो रही थी और वो मेरे सिर पर अपना चेहरा छुपा के रो रहे थे। मैं तो कई बार रोई हूँ लेकिन भाई को रोते हुए पहली बार देखा था। मम्मी और मेरी तबियत कुछ दिनों तक खराब रही। मैंने इतनी टेंशन ली कि मेरा शरीर कमजोर हो गया था।"
काव्या बहुत धीरे धीरे बोल रही थी और साथ ही चेहरे पर मायूसी छा गई थी। उसने फिर बोलना शुरू किया।
"पापा परिवार की बैकबोन थे। उन्होंने मुझे बहुत प्रेरित किया था। जब यहाँ कॉलेज में एडमिशन का प्रोसेस चल रहा था तब पापा मेरे साथ ही थे। वो 4 दिन यही रुके थे। मेरे लिए अच्छा PG ढूंढ़ा जो कॉलेज के नज़दीक हो। उन 4 दिनों में पापा और मैंने शॉपिंग की। हम बीच पर भी गए। पापा उन चार दिनों में मेरी ही उम्र के एक लड़के बन गए थे। एक्सीडेंट से एक दिन पहले उन्होंने मुझे वीडियो कॉल किया। वे खुश थे कि मैं यहाँ मुंबई में ठीक कमा रही हूँ। उन्होंने वीडियो कॉल पर वादा किया था कि इस बार मम्मी और बड़े भाई के साथ वे जल्द ही मुंबई आएंगे। लेकिन पापा वादा पूरा नहीं कर पाए। सबकुछ कितना जल्दी हुआ और इतने महीने भी बीत गए।"
काव्या की आँखें गीली हो चुकी थी। वो अपने टॉप का तीसरा बटन देखने लगी। सिर बिल्कुल नीचे। मुझे नहीं समझ रहा था कि मैं क्या बोलू ? 'आज़ाद नगर' स्टेशन पर मेट्रो रुकी।
"Sorry काव्या। मैंने बेवजह तुमको मायूस कर दिया।"- आखिर में मैंने कुछ तो कहा।
"It's Okay Prince. मेरा भी बताने का मन किया सो बता दिया।" - उसने मुस्कुराते हुए बोला।
"By the way, तुम बहुत Strong लड़की हो।"
"वो तो मैं हूँ।" - काव्या ने इतराते हुए कहा और साथ में कुछ अभिनय किया।
उसके इस अंदाज को देखकर मैं भी हँसा। हम दोनों टिमटिमाती हुई लाइन को देखने लगे। 'डी. एन नगर' पर ग्रीन लाइट टिमटिमा रही थी।
"तुम्हारी मंजिल आने वाली है।"- काव्या ने कहा।
"हाँ, हर रोज़ की तरह।"
"पता है जिस दिन तुम मेट्रो में मिलते हो उस दिन मेरा थोड़ा सा नुकसान हो जाता है।"
"कैसा नुकसान ?"
"जिस दिन तुम मिलते हो उस दिन मेट्रो में क़िताब नहीं पढ़ पाती हूँ।"
"तुम रोज़ लाती हो किताब ?"
"हाँ, हमेशा बैग में रहती है। जिस दिन तुम मिलते हो, बस बातों में ही सफ़र पूरा हो जाता है। मैंने अभी तक 'इकिगाई' पूरी नहीं पढ़ी है।"
"लेकिन जिस दिन किताब नहीं पढ़ती हो उस दिन मेरे जैसे युवा लेखक से बात करने का मौका भी तो मिलता है।"- मैंने व्यंग्यात्मक तरीके से अपनी तारीफ़ की।
काव्या मेरी तरफ देखी और धीरे से हँसी। हम दोनों दरवाज़े के क़रीब खड़े थे। 'डी. एन नगर' बस आने वाला था।
'Next station marol Naka.' Doors will open on the left.'- मेट्रो में अनाउंसमेंट हुई।
मेट्रो से बाहर निकलने के बाद मैंने सोचा कि ये तो बस काव्या की जिंदगी का एक छोटा सा किस्सा है। काव्या जैसे ही कितने लोग और होंगे। सबके पास अपना दुःख - दर्द है लेकिन फिर भी रोज़ अपनी जिंदगी जी रहे है। हम अक्सर सोच लेते है कि लाइफ में सबसे ज्यादा समस्याएं मेरे ही पास है या सबसे ज्यादा दुःखी मैं ही हूँ लेकिन असल में यहाँ करोड़ों लोग है जो मेरे से भी ज्यादा तनाव में जी रहे है। ये सोचते हुए मुझे अचानक दो पंक्तियां याद आ गई - बस अपना ही गम देखा है। तूने कितना कम देखा है।
© रविंद्र मुंडेतिया
( 'मेट्रो... उन दिनों' की कहानी अभी जारी है...
चैप्टर 5 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - काव्या का एकतरफा प्यार


क्रिएटिविटी के आटे में गूंद कर लिखी हुई कहानी है ये !
ReplyDeleteकहानी में अभी मज़ा और भी है। आपने चैप्टर पढ़ा, उसके लिए शुक्रिया।
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