लालबागचा राजा - आस्था के सागर में VIP की लहर

 



गणेशोत्सव, यह त्योहार भारतीय संस्कृति में मात्र एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एक लोक-सांस्कृतिक आयोजन है जिसमें श्रद्धा, सामुदायिक जुड़ाव और आनंद का संयोग नज़र आता है। गणेशोत्सव मात्र महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि देश की हर गालियों में ये उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्र की गलियों से निकलकर यह त्योहार पूरे देश में एक साझा भावनात्मक धारा बन जाता है।

यूँ तो देश के कई हिस्सों में इस दौरान गणेश जी की पूजा की जाती है लेकिन जो मज़ा गणेशोत्सव का महाराष्ट्र में आता है वो कही नहीं आता है और वैसे भी हर राज्य के अपने अपने त्यौहार और धार्मिक उत्सव होते है जो उस राज्य की पहचान भी बन जाती है। जैसे पश्चिम बंगाल का दुर्गा पूजा, उत्तर प्रदेश के वाराणसी की देव दीपावली, गुजरात की नवरात्रि, पंजाब की बैसाखी और राजस्थान का पुष्कर ऊंट मेला। 

लालबागचा राजा, मुंबई का सबसे प्रसिद्ध गणेश पंडाल, लगभग सौ वर्षों से भक्तों का आस्था का केंद्र रहा है। यहां लाखों श्रद्धालु हर वर्ष ‘चरण दर्शन’ की लालसा लेकर आते हैं। यह पंडाल केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि शहर की पहचान और जन-संस्कृति की अभिव्यक्ति बन चुका है।

मैं पहली बार लालबाग के दर्शन करने जा रहा था। मुझे उम्मीद थी दर्शन अच्छे से हो जाएंगे। लालबाग का मुख्य द्वार आने से पहले ही भीड़ शुरू हो गई थी। मैं देख रहा था उन तमाम लोगों को जो अपने दोस्तों, परिवार, बच्चों और प्रेमी के साथ लालबाग की ओर बढ़ रहे थे। 

( मुख्य द्वार ) 

लालबाग का मुख्य द्वार मानो किसी भव्य महल का मुख्य द्वार हो। दो शानदार बालकनियां, सबसे ऊपर हाथी का मुख। वहाँ पहुंचने पर भीड़ बहुत बढ़ गई थी। पुलिस बल तैनात थी। चारों ओर से सीटियों से आवाज़ कानों में आ रही थी। हर तरफ धक्का मुक्की हो रही थी। लालबाग के प्रबंधक हाथ पकड़ के एक श्रृंखला बनाए मुख्य द्वार को घेरे हुए थे। वे किसी को अंदर नहीं जाने दे रहे थे। लेकिन भीड़ पीछे से धक्का दे रही थी। पीछे पुलिस VIP लोगों की गाड़ी निकालने के लिए लोगों को हटा रही थी। मेरे चारों और सभी लोगों में तनाव था। भक्तों को दर्शन करने का तनाव, प्रबंधकों को लोगों को रोकने का तनाव और पुलिस को सही सलामत VIP लोगों को उस भीड़ से बाहर निकालने का तनाव। 

मैं जैसे तैसे करके अंदर गया। दूर सकरी गली में बप्पा विराजमान थे। लोग जैसे ही गली में घुसे सभी के फोन निकल गए। कोई स्नैपचैट से वीडियो बना रहा है, कोई इंस्टाग्राम पर लाइव है, कोई वीडियो कॉल पर घरवालों को बप्पा के दर्शन करवा रहा था। कुछ ही लोग थे जो बिना मोबाइल फोन निकाले बप्पा को देखने की कोशिश कर रहे थे। बाकी सभी लोग लालबागचा राजा के लाइव दर्शन नहीं कर रहे थे। शायद जमाना बदल गया है। अब फोन में वीडियो या फोटो मिल जाए बस यही दर्शन मात्र हो जाता है। सकरी गली होने की वजह से वहाँ पर सांस लेना कुछ लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। लालबाग के प्रबंधक वहाँ जगह जगह खड़े थे लेकिन लाइन कुछ देर रुकने के बाद भीड़ बेकाबू हुए जा रही थी। सीटियां मारी जा रही थी लेकिन इसका कुछ असर लोगों पर नहीं दिख रहा था। एक दफा तो ऐसा हुआ  जब भीड़ बेकाबू हो आगे बढ़ गई और प्रबंधक देखते ही रह गए। 

मुझे भीड़ आमतौर पर पसंद नहीं। मैं भीड़ वाली जगहों से बचना चाहता हूँ। क्योंकि बेकाबू हुई भीड़ अपने पैरों तले किसी को भी रौंद देती है। हमारे पास ऐसे कही सारे केस है जहाँ भीड़ बेकाबू हुई और हादसे हो गए। इस भीड़ का पुलिस भी कुछ नहीं कर पाती है। मैंने भीड़ में कुछ महीने के बच्चों को भी देखा जो अपने माता पिता की गोद में सो रहे थे। उन बच्चों के चेहरों पर गर्मी थी। धक्का मुक्की के बीच एक पिता अपनी बच्चीं को गोदी में उठाए हुए था। वो अपनी बच्चीं को बचाने में लगा हुआ था। 

 ( Photo - Mid Day ) 

लालबाग में भीड़ क्यों हो जाती है ?

'लालबाग में भीड़ क्यों हो जाती है ?' यह सवाल अक्सर हमारे दिमाग में आ जाता है। काफ़ी संख्या में भक्तों का आ जाना इसका कारण नहीं है। इसका मुख्य कारण अक्सर जो सामने आता है वो है VIP लोगों का आना और सामान्य श्रद्धालुओं को घंटों तक रोके रखना। इसके अलावा यातायात प्रबंधन की कमी है ( लाखों लोग आते हैं, पर पंडाल के आसपास की सड़कों पर ट्रैफिक डायवर्जन सही तरीके से लागू नहीं होता। ) नियंत्रण की तैयारी का अभाव ( आयोजक समिति और पुलिस दोनों को पता है कि यहाँ लाखों भक्त आएंगे, फिर भी पर्याप्त बैरिकेडिंग, मेडिकल सुविधा, एग्ज़िट पॉइंट और इमरजेंसी व्यवस्था समय पर नहीं की जाती। कई बार लोग घंटों उमस और गर्मी में बिना पानी व शेड के खड़े रहते हैं। ) सुरक्षा इंतज़ाम की खामियां ( इतनी बड़ी भीड़ के बावजूद CCTV, भीड़-नियंत्रण ड्रोन या डिजिटल मॉनिटरिंग का उपयोग सीमित रहता है। सुरक्षा बल अक्सर “प्रतिक्रियात्मक” रहते हैं, जबकि योजना पहले से बननी चाहिए। ) 

VIP संस्कृति और भेदभाव - एक प्यारा त्योहार या विभाजनकारी अनुभव ?

यह कहना झूठ नहीं होगा कि लालबाग में VIP लोगों के साथ अलग बर्ताव होता है और सामान्य लोगों के साथ अलग बर्ताव होता है। आम भक्त घंटों लाइन में खड़े रहते हैं, वहीं VIP और सेलिब्रिटी को सीधा प्रवेश दिया जाता है। इससे आम जनता नाराज़ होती है और भीड़ में धक्का-मुक्की व अव्यवस्था बढ़ती है। जब कभी महाराष्ट्र में गणेशोत्सव का समय होता है लालबाग से ऐसे वीडियो और तस्वीरें सामने आती है जहाँ VIP कल्चर सामान्य लोगों की आस्था को कुचलता नज़र आता है। एक तरफ़ भक्तों को अच्छे से बप्पा के चरण स्पर्श करने का भी मौका नहीं मिलता है तो दूसरी तरफ़ अच्छे से आरती और मन्नते मांगी जाती है। अच्छे से फोटोग्राफी का सेशन चलता है। शायद VIP लोग दान अच्छा करते होंगे लिहाजा उन्हें वहाँ मन्नते मांगने के लिए भरपूर वक्त दिया जाता है। न सिर्फ लालबाग में बल्कि देश के हर हिस्से में ये कल्चर देखा जाता है। जब मेरी बारी आई माथा टेकने की, मैं माथा टेक ही नहीं पाया। बप्पा की मूर्ति को तो दूर से ही देख लिया था। मुझे वहाँ से जल्दी हटा दिया गया और ये सब सेकंड के भी छोटे से हिस्से में हुआ। ये अनुभव मुझे विभाजनकारी ही लगता है। आम लोगों की वहाँ कुछ इज्ज़त नहीं होती है। 

मैं उस वक्त कुछ भी मन्नत नहीं मांग पाया। फिर मन में ख्याल आया कि किसी छोटे से पंडाल में जाकर ही मन्नत मांग लूंगा। जरूरी नहीं लालबाग में ही मन्नत मांगी जाएँ। मैं वहाँ से निकल गया। पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। भविष्य में यहाँ आऊंगा या नहीं इसका मुझे नहीं पता क्योंकि जहाँ बहुत ज्यादा भीड़ है वहाँ भक्ति या मन्नते मांगना मेरे लिए संभव नहीं और ये मेरे विचार है। 

इसके साथ ही भारत के लोगों को ये भी समझने की जरूरत है कि जो जगह आस्था का प्रतीक है वहाँ लाखों श्रद्धालु आते है ऐसे में जितना हो सके शांत रहा जाए न कि गुस्से में आकर पुलिस के बैरीकेट हटाए या दीवार कूदकर स्थित खराब करे। जिम्मेदारी आम लोगों की भी बनती है। भीड़ में बच्चें भी होते है, बुज़ुर्ग भी होते है और साथ ही दिव्यांग भी। ऐसे माहौल में एक व्यक्ति अपनों से बिछड़ सकता है, जान जा सकती है। 

हालही में लालबाग में VIP कल्चर को लेकर  वकील आशीष राय और पंकज मिश्रा ने मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज करवाई कि VIP दर्शन के लिए अलग से पूर्ण व्यवस्था बनाई गई, जिससे महिलाओं, बुजुर्गों, बच्चों और दिव्यांग भक्तों का अधिकार भंग हुआ। मानवाधिकार आयोग ने संबंधित अधिकारियों - मुख्य सचिव, BMC आयुक्त, पुलिस आयुक्त और मंडल प्रबंधन को नोटिस जारी किया है और छह सप्ताह में जवाब माँगा है। अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी, और आयोग ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्थलों में समान और सम्मानपूर्ण व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन ऐसी सुनवाई का क्या सच में एक अच्छा निष्कर्ष निकला है ? अक्सर ऐसी खबरें सिर्फ अखबारों तक ही सीमित रह जाती है। 

 निष्कर्ष

आस्था में समानता, व्यवस्था में संवेदना

मेरे इस आर्टिकल का अंतिम संदेश यही है कि गणेशोत्सव एक ऐसा त्योहार है जो आस्था, एकता और समानता का प्रतीक है लेकिन केवल तब, जब यह सुनिश्चित हो कि VIP-प्रवेश व्यवस्था भी भक्तों की गरिमा एवं भावनात्मक सम्मान को चोट न पहुँचाए। सभी भक्तों को समान अवसर और सम्मान प्रदान करे। भीड़ नियंत्रण में सुधार हो, जिससे सुरक्षा, सुविधा और मर्यादा बनी रहे। धार्मिक स्थल पर विभेद भाव नहीं, बल्कि एकता और श्रद्धा हो। 


( यह आर्टिकल किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं लिखा गया। मैं लालबाग गया और मुझे  जो आम लोगों के लिए लगा वो मैंने लिखा। ) 


© रविंद्र मुंडेतिया



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