टिफिन


ऑफिस में हलचल शुरू हो गई थी। ये लंच का टाइम था। खाने की खुशबू आ रही थी। सारे लोग टिफिन लिए उस बड़े से केबिन की ओर बढ़ रहे थे जहाँ खाना खाया जाता है। मैं अपनी डेस्क पर बैठा काम में व्यस्त था। अभी वो लोग नहीं खा रहे थे जिनके साथ मैं अक्सर खाना खाया करता हूँ। 

कुछ देर बाद वो मेरे केबिन के डोर पर आकर खड़ी हो गई और बोली "ओय, खाना नहीं खाना क्या ?" उसने खाने का न्योता दिया जो अक्सर वो देती है। हम दोनों खाने से पहले एक-दूसरे को लंच का न्योता देते हैं। मैं अचानक अपने खोए हुए काम से बाहर निकलता हूँ और जवाब देता हूँ "हाँ खाते है न। बस दो मिनट रुक यार। काम खत्म करता हूँ और आता हूँ।" वो हल्की सी स्माइल करती है और अपने बैग में से टिफिन निकालने लगती है। 

मैं उससे पूछता हूँ "आज क्या लाई है खाने में ?" उसने कहा "करेला"

"अरे यार। करेला मुझे नहीं पसंद।"- मैंने मुँह सिकुड़ते हुए कहा।

"तुम क्या लाए हो ?"- उसने पूछा।

"लौकी की सब्जी।"- मैंने फिर मुँह सिकुड़ते हुए कहा क्योंकि मुझे लौकी भी नहीं पसंद। 

"आज करेला ही ट्राई करो। और वैसे भी नए मसाले की सब्जी हमेशा अच्छी ही लगती है।"- उसने मुस्कुराते हुए कहा। उसके मुस्कुराने पर गाल हल्के से फूल गए और आँखें छोटी हो गई। 

"हाँ यार, चल।"

हमारा ग्रुप जिसके साथ हम रोज बैठकर खाना खाते वो सभी आ चुके थे। वो मेरी पास वाली चेयर पर बैठी थी। मैंने अपना टिफिन खोला उसमें लौकी निकली और उसके टिफिन से करेला। लेकिन जब हम साथ होते हैं, तो टिफिन खोलने और खाना शुरू करने का अपना ही अलग आनंद होता है। खाने के बीच हमारी हँसी-मज़ाक, बातें, ऑफिस की गपशप, सब कुछ मन को तरोताजा कर देता है। 

उसने अपना टिफिन मेरी ओर बढ़ाया और कहा "ट्राई तो करो, क्या पता अच्छा लगे ?" यह कहते हुए उसने लौकी की सब्जी अपनी ओर खींच ली। अब मैं उसके घर का खाना खा रहा था और वो मेरे घर का। मैंने रोटी की एक कौर करेले के साथ खाई और कहा "ह्म्म्म, करेला इतना भी कड़वा नहीं है। अच्छा है।" सभी लोग मुस्कुराने लगें। 

हमें कभी ये बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि हम क्यों टिफिन का न्योता देते हैं या क्यों लेते हैं। बस ये बिन बोले चलने वाली आदत हमारे रोज़मर्रा की सबसे प्यारी आदत है जो दोस्ती को मजबूत बनाती है। 

जरूरी नहीं कि वो ही आगे से हमेशा लंच के बारे में पूछे। कभी कभी मैं भी उससे पूछ लेता हूँ। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि अचानक कोई अर्जेंट काम आ जाता है जिसके कारण ऐसा भी दिन आता है जब मैं उसके साथ लंच नहीं खा पाता, और कभी-कभी इसी वजह से वह भी मेरे साथ नहीं बैठ पाती। ऐसे में अगर लंच साथ न हो तो वो हल्का सा खालीपन महसूस होता है। पर हम समझते हैं कि काम प्राथमिक है। 

अगर कोई पूछे कि हमारी दोस्ती कैसी है, तो जवाब बस यही होगा "हमारी दोस्ती की पहचान एक साधारण टिफिन और उससे जुड़े छोटे-छोटे लम्हों में छुपी है।"

टिफिन सिर्फ खाना नहीं, बल्कि दोस्ती की वह कहानी है, जिसमें ना कोई मिसअंडरस्टैंडिंग होती है और ना ही कोई झिझक। लोग चाहे कुछ भी सोचे। वो उनकी सोच है। शायद उनके सोचने और समझने का दायरा इतना ही है कि वे इस दोस्ती को गलत आंक लेते होंगे। लंच के टाइम, टिफिन शेयर करना एक ऐसी आदत है जो दोस्ती को हर दिन ताज़ा रखती है। हम अक्सर ऐसे वक्त में सिर्फ खाना ही नहीं बल्कि रिश्तों की मिठास भी साझा करते है।


टिफिन - उस दोस्ताना रिश्ते का नाम होता है, जो सरल, सच्चा और दिल से निभाया जाता है।


रविंद्र मुंडेतिया 

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