मर्द को भी दर्द होता है।

 


हमारे घरों में एक चेहरा हमेशा स्थिर दिखता है जो कभी थकता नहीं, कभी टूटता नहीं। वो चेहरा आपके पिता का हो सकता है, आपके पति का हो सकता है, आपके भाई का हो सकता है या बेटे का हो सकता है। लेकिन क्या कभी हमने रुककर सोचा कि उनकी मुस्कान के पीछे कितनी थकान छिपी होती है ?

हमारे समाज ने पुरुषों के लिए एक अदृश्य ढांचा बना दिया है जिसमें कठोरता, जिम्मेदारी और सहनशीलता शामिल है। उन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है कि “लड़के रोते नहीं”, “मर्द को दर्द नहीं होता।” नतीजा यह होता है कि जब वे सच में परेशान या किसी मुसीबत में होते है, तो भी चुप रहते हैं। वे अपनी भावनाओं की दीवार के पीछे छिप जाते हैं, ताकि कोई उन्हें कमजोर न कह दे।

लेकिन क्या ताकत सिर्फ शरीर की होती है ? या दर्द छिपा लेना ही साहस है ? शायद नहीं। असली ताकत तो तब दिखती है जब कोई इंसान अपने डर, अपनी कमजोरी और अपने आँसुओं को स्वीकार करता है।

हर घर में एक ऐसा पुरुष ज़रूर होता है, जो बिना कुछ कहे हर ज़िम्मेदारी निभाता है। सुबह से देर रात तक काम करने वाला पिता, जो अपनी थकान छिपाकर बच्चों को मुस्कान देता है। वह पति, जो चुपचाप घर के खर्चों की चिंता करता है, लेकिन कभी जताता नहीं कि उसे भी परेशानी है। वह बेटा, जो परिवार की उम्मीदों का भार अपने कंधों पर ढोता है, लेकिन अपनी इच्छाओं का बोझ किसी से नहीं बाँटता।

पुरुष भी इंसान ही होता हैं। उन्हें भी प्यार चाहिए, सराहना चाहिए, और यह एहसास चाहिए कि वे भी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन अक्सर उन्हें यह सब मिलता नहीं, क्योंकि समाज यह मान बैठा है कि "पुरुषों को कुछ नहीं होता"। यह सबसे बड़ा भ्रम है, जो ना केवल पुरुषों को तोड़ता है बल्कि इंसानियत की भावना को भी कमज़ोर करता है।

आजकल मानसिक स्वास्थ्य की बात तो होती है, पर क्या हम अपने पिता, भाई या पति से कभी खुले दिल से पूछ पाते हैं कि वे सच में कैसे हैं ? जब कोई पुरुष थोड़ा चिड़चिड़ा हो जाता है, तो हम कहते हैं “तू तो हमेशा गुस्से में ही रहता है।” लेकिन शायद उस गुस्से के पीछे एक ऐसी थकान छिपी है, जिसे कभी किसी ने समझने की कोशिश नहीं की।

समाज उन्हें “कमाने वाला” और “सुरक्षा देने वाला” मानता है, पर क्या कभी किसी ने उन्हें यह बताया कि वे जैसे हैं, वैसे ही प्यारे हैं। उन्हें भी सुकून चाहिए, अपनापन चाहिए। 

मेरे एक दोस्त ने कभी बताया था कि वह रोज़ दफ्तर से लौटकर घर के कामों में पत्नी की मदद करता है, बच्चों का ख्याल रखता है, मगर कोई उसकी सराहना नहीं करता। उसकी पत्नी जिसका वो बेहद ख्याल रखता है, कहती है, "यह तो तुम्हारा कर्तव्य है।" वह मुस्कुराता है, लेकिन भीतर कहीं कुछ टूटता है क्योंकि किसी ने यह नहीं कहा कि “तुम अच्छा कर रहे हो।” किसी ने नहीं कहा कि “तुम भी थक जाते हो।”

और यही तो सबसे बड़ी कमी है हमारे समाज की। कई बार हम पुरुषों को ‘इंसान’ की तरह नहीं देखते। वे भी टूटते हैं, रोते हैं, डरते हैं, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिलता। वे बस मजबूत बने रहने का अभिनय करते रहते हैं, क्योंकि उन्हें बचपन से यही सिखाया गया है।

अब वक्त है इस सोच को बदलने का। पुरुषों के लिए भी संवाद ज़रूरी है। ऐसा घर, ऐसी समाज-व्यवस्था बनानी होगी जहाँ वो अपनी भावनाएँ बिना डर के व्यक्त कर सकें। जब एक पिता कहे कि “आज बहुत थक गया हूँ”, तो उसे ये महसूस कराया जाए कि यह कहना कमजोरी नहीं है। 

आज अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के अवसर पर हमारे घरों में मौजूद उन खामोश नायकों को पहचानें। उस पिता को धन्यवाद कहें जिसने हर मुश्किल में हमें संभाला। उस पति को सराहें जो हर दिन मुस्कान के पीछे अपनी चिंता छिपाता है। उस भाई को गले लगाएँ जो हर बार हमारे लिए लड़ता है, लेकिन कभी अपने लिए नहीं।

अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस किसी उत्सव से ज़्यादा, एक स्मरण है। एक याद दिलाने वाला पल कि हमारे आसपास जो पुरुष हैं, वे भी हमारी तरह संवेदनशील और टूटने वाले हैं। उन्हें भी प्यार चाहिए। उन्हें भी यह महसूस होना चाहिए कि वे अकेले नहीं हैं। क्योंकि जब हम किसी पुरुष को यह एहसास दिलाते हैं कि वह मूल्यवान है, तब हम न केवल उसके जीवन में रोशनी लाते हैं, बल्कि पूरे समाज को और अधिक मानवीय बना देते हैं।


© रविंद्र मुंडेतिया


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