हम सबको रेशम का कीड़ा क्यों बनना चाहिए ?
मैं अक्सर सोचता हूँ, क्या हमारे जीवन का मतलब सच में मंज़िल तक पहुँचना है या फिर ये सफ़र ही असल जीवन है ? जब कभी शहतूत की डाल पर रेंगते किसी रेशम के कीड़े को देखता हूँ, तो उसकी तन्मयता में दुनिया का सबसे बड़ा राज़ छिपा लगता है। वह चुपचाप बस चलता जाता, एक-एक पल को जीता, कड़कड़ाहट की दुनिया से अलग खुद की दुनिया में खोया हुआ। कोई लालच नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, बस निरंतर कर्म।
हम सभी ये चाहते हैं कि हमारे प्रयासों का फल स्वयं देखें, उसे चखें, महसूस करें। पर रेशम का कीड़ा तो बिना शिकायत, बिना उम्मीद के काम करता है। उसने मान लिया है कि उसकी मेहनत का सबसे खूबसूरत पर्दा उसके जाने के बाद ही तैयार होता है। कभी-कभी सोचता हूँ, अगर इंसान भी अपने कर्मों का परिणाम देखने के मोह से ऊपर उठ जाए, तो शायद उसकी जिंदगी ज्यादा सच्ची और सुंदर बन सकती है।
एक दूसरे मोड़ पर तितली उड़ती दिखाई देती है। उसकी चमक, उसके रंग सबको आकर्षित कर लेते हैं। वह अपने रंगों से इस दुनिया को खुशियों की सौगात देती है। अपने नाम में बस मुस्कानों का मायाजाल छुपा लेती है। इंसान भी तो ऐसे ही हो सकता है, अपने व्यवहार, अपने शब्द, अपनी शैली से दूसरों की जिंदगी में रंग घोल सकता है। खुद की यात्रा को इतना सुंदर, इतना भावपूर्ण बना सकता है कि लोग उसे देखकर मुस्कुरा उठें।
मधुमक्खी की ओर देखूं तो उसके जीवन की मिठास का असली राज़ उसके निस्वार्थ कर्म में छुपा हुआ दिखता है। वह दिन-रात फूलों पर मेहनत करती है, लेकिन उसका शहद लोगों को मिलता है। खुद जीते-जी दूसरों के लिए मिठास उगाना कितनी बड़ी बात है! इंसान अगर मधुमक्खी की तरह सोचने लगे, तो उसका छोटा-सा काम भी समाज के लिए अमृत हो जाएगा।
हमारे मन में यह सवाल बार-बार आता है कि अगर हमारी मेहनत का परिणाम हमें न मिले तो क्या फायदा ? हम फल देखने के लिए छटपटाते हैं, हर फसल का स्वाद खुद चखना चाहते हैं। लेकिन जीवन की गहराई रेशम के कीड़े में है। अपनी अंतिम सांस में भी वह दूसरों के काम आ जाता है। उसकी सबसे महान उपलब्धि यही है कि उसके जाने के बाद भी उसकी मेहनत लोगों को ढकती है।
सफर का असली आनंद वही जान सकता है, जो नतीजे की चिंता छोड़कर हर पल को जीता है। मंज़िल तो बस एक फरेब है, सफर की ईंटों से ही असली महल बनता है। जिसने सफर को अपनी मंज़िल मान लिया, उसके लिए हार-जीत, लाभ-हानी सब एक नए मायने में बदल जाता है। उसका कर्म खुद में स्थायी बन जाता है, जैसे रेशम का कीड़ा जाते-जाते वह चमक छोड़ जाता है।
कई लोग सोचते हैं, बिना रिज़ल्ट देखे काम क्यों करें ? लेकिन अगर निस्वार्थता को स्वीकार कर लें, कर्मप्रिय हो जाएं, तो बहुत लोगों की जिंदगी रेशम से ढक जाएगी। ऐसा जीवन दूसरों के लिए भी फलदायी बनता है।
यही इस जीवन का दर्शन है। कीड़े की तरह तपस्या करो, मधुमक्खी की तरह दूसरों के लिए मिठास बनो, तितली की तरह खुद में रंगीन बन जाओ। जो खुशियां, मिठास और सपनों का रेशम दूसरों के लिए छोड़ जाए, वही सच में सफल है।
© रविंद्र मुंडेतिया

Very thoughtful
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