चाय के साथ मस्का पाव क्यों ?

 


दिन भर ऑफिस में कंप्यूटर के सामने नजरे गढ़ाने के बाद जब लॉग आउट का वक्त होता तब मन में एक खुशी जरूर रहती है। ऑफिस का दिन खत्म होते ही घड़ी में बजते है 6. कंप्यूटर बंद, बैग कंधे पर, और दिल में एक ही ख्याल - चाय और वो! मैं मेरी सह कर्मचारी के साथ जो सह कर्मचारी कम और मेरी दोस्त ज्यादा है, उसके साथ चाय की टपरी पर आ जाता हूँ। चाय की टपरी पर गप्पे लड़ाना और सुख दुःख साझा करने का निर्णय हम दोनों का रहता है। हम दोनों का इस तरह मिलना शाम का हिस्सा बन चुका है। दो कप चाय, एक प्लेट मस्का पाव - बस इतना ही, लेकिन इसमें छुपा है सारा जादू।

ये सिर्फ खाना-पीना नहीं, ये है वो वक्त जब दुनिया रुक सी जाती है। ऑफिस की टेंशन, डेडलाइन्स का प्रेशर, बॉस की डाँट - सब यहाँ भुला दिया जाता है। मैं हमेशा दो कप चाय के साथ एक मस्का पाव ऑर्डर कर देता हूँ। क्यों ? क्योंकि सिर्फ दो कप चाय से बातें जल्दी खत्म हो जाती है। सिर्फ दो कप चाय से निहारने का वक्त नहीं मिलता है। सिर्फ दो कप चाय से फ्लर्ट आधा अधूरा रह जाता है और इन्हीं सभी को एक मुकाम तक पहुंचाने के लिए जरूरत पड़ती है एक मस्का पाव की। मस्का पाव का वो नमकीन मस्का, गर्म पाव की खुशबू, और बीच में हमारी हँसी-मज़ाक - ये सब टाइम को धीरे कर देता है। कभी कभी वो कहती है "जितना मस्का इस पाव में नहीं लगा है न, उससे कही ज्यादा तुम मार देते हो।" एक टुकड़ा उसके हाथ में, दूसरा मेरे, और फिर शुरू होती है हमारी दुनिया।

हमारी बातें, ऑफिस गॉसिप से शुरू होती हैं। वो बड़े उत्साह के साथ कहती है - "पता है आज उसने क्या कहा ?" और मैं उसको ध्यान से सुनने लगता हूँ। ये मालूम होते हुए भी कि इस बात में कुछ महत्वपूर्ण नहीं होगा फिर भी सुनता हूँ। कभी कभी किसी को महज़ सुन लेने से ही आनंद आ जाता है। ऑफिस की गॉसिप के बाद फिर बातें बदलती हैं पर्सनल चीज़ों में। मैं थोड़ा फ्लर्ट करता हूँ, वो शरमा जाती है, लेकिन उसकी आँखों में भी वो चमक दिखती है। इतनी बार बताने के बाद भी मैं उसके फोन का पासवर्ड भूल जाता हूँ। वो कहती है -"कितनी बार बताया है, फिर भी भूल जाते हो।" कभी वो मेरी तारीफ़ करती है, कभी मैं उसकी। चाय का पहला घूँट गर्म होने पर थोड़ा झुलसाता है, लेकिन मस्का पाव का पहला टुकड़ा सब भुला देता है। 

वो चाय ठंडी करके पीती है और मैं तब तक मस्का पाव को चाय के साथ खाते रहता हूँ। इस दौरान वो मुझसे बचकर कई दफा नज़रे ऊपर उठाती है लेकिन चोरी से उठी इन नजरों को मैं हमेशा पकड़ लेता हूँ। और जब मैं इन नजरों को पकड़ता हूँ, तब हमारे बीच कोई बात नहीं होती है, बस मुस्कुरा दिया जाता है और हम दोनों दूसरी बात का सहारा ले लेते है। दोनों बातें करके खुश हो जाते है जैसे ज़िंदगी ने इस शाम को एक छोटे से गिफ्ट की तरह दिया हो। 

ये मोमेंट्स छोटे होते हैं, लेकिन असर बड़ा होता है। ऑफिस लाइफ में, जहाँ हर रोज़ एक रेस लगती है, वहाँ ये चाय-पाव ब्रेक, जीवन को फिर जीना सिखाती है। दोस्ती का असली रंग यहीं दिखता है - बिना किसी शर्त के, बिना किसी एजेंडा के। और हाँ, वो फ्लर्ट ? वो तो सिर्फ मसाला है, असली स्वाद तो दोस्ती का है। 

सोचो ज़रा: रोज़ाना एक ही रूटीन, फिर भी हर बार नया लगता है। ये सिर्फ मेरा और उसका वक्त नहीं है, ये है वो छोटी खुशियाँ जो हम सब भूल जाते हैं बिज़ी लाइफ में। 

ज़िंदगी के बड़े सपने पूरे करने से पहले, इन छोटे पलों को जी लो। चाय ठंडी हो जाएगी, मस्का पाव खत्म हो जाएगा, लेकिन ये यादें हमेशा गर्म रहेंगी।


© रविंद्र मुंडेतिया

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