हम दोनों एक बिस्तर पर थे
आज मन बहुत बैचेन था। काम में मन ही नहीं लग रहा था। कंप्यूटर की स्क्रीन तो एक्टिव थी लेकिन मेरे हाथ ना ही कीबोर्ड पर एक्टिव थे और ना ही माउस पर। रह रहकर उसका ख्याल मन में आ रहा था। सोच रहा था क्या वो ठीक होगी ? या वो क्या कर रही होगी ? सुबह जब कॉल पे बात हुई थी तब उसकी आवाज़ से लग रहा था कि उसकी तबियत ठीक नहीं है। आवाज़ से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे शरीर में बिल्कुल भी जान नहीं है।
मुझसे रहा नहीं गया और मैने उसको कॉल लगा दिया। उसकी आवाज़ अभी भी वैसी ही थी जैसे सुबह थी।
"तबियत ठीक नहीं है तुम्हारी यार।"- मैंने कहा।
कहने के बाद मुझे लगा कि ये बात मैंने क्यों बोली क्योंकि आवाज़ सुनके तो पता चल ही गया था।
"हाँ यारा।"- उसने थकान भरी आवाज़ में कहा।
कुछ सेकंड हमारे बीच खामोशी रही। वो खांस रही थी। उसने पूछा - "तुम क्या कर रहे हो ?" मैंने कहा - कुछ भी नहीं।"
"आज तुम्हारे ऑफिस में काम नहीं है क्या ?"
"है, मगर करने का मन नहीं है यार।"
"क्यों ?"
"क्योंकि मेरी दोस्त बीमार है।"
"मेरी इतनी फिक्र ? इतनी चिंता मत करो। ठीक हूँ मैं।"
"ऐसा हो ही नहीं सकता क्योंकि अगर तुम ठीक होती तो अभी तक न जाने कितनी बातों को लेकर मुझे डांट दिया होता।"
"ऐसा कुछ नहीं है प्रिंस।"
"मैं आऊ क्या ?"
"तुम्हारी मर्जी यार।"- उसकी आवाज़ से लगा जैसे वो मुझे हाँ बोल रही हो।
मैंने उसे बाय बोलकर कॉल कट कर दी। मैंने दफ्तर से हॉफ डे ले लिया और निकल गया। करीब 4 बजे मैं उसके घर पहुंच गया। मैंने उसको कॉल किया। वो ये सुनकर खुश हो गई कि मैं बाहर खड़ा हूँ लेकिन खराब तबियत थोड़ी उसपर हावी थी। उसने डोर ओपन किया और मुझसे गले मिल गई। उसने कहा - "थैंक यू"
मैंने उसके लिए फूलों का गुलदस्ता खरीदा था जिसे अभी तक पीछे छुपा के रखा था। वो गुलदस्ता मैंने उसको दे दिया। वो खुश हो गई। उसका चेहरा फूलों की तरह थोड़ा सा खिल गया।
"सो रही थी तुम ?"
"नींद ही नहीं आ रही थी प्रिंस। इसमें तो कितनी सारी फूलों की वैरायटी है। तुमने ये स्पेशल मेरे लिए बनवाया ?"
"कोई और तो लड़की है नहीं मेरी लाइफ में, तो तुम्हारे लिए ही बनाऊंगा न यार।"
"हाउ क्यूट, लव यू प्रिंस।" - यह कहते हुए उसने मुझे कस के गले लगा लिया।
"कुछ खाया तुमने ?"- उसका शरीर थोड़ा सा गर्म था।
"कुछ खास नहीं।"
"क्यों ?
"मन नहीं है"
"तुम्हारी यार यही प्रॉब्लम है। कुछ खाती ही नहीं हो। हर बार बच्चों की तरह खिलाना पड़ता है।"
"लगता है तुम यहाँ मुझे यही सब सुनाने आए हो।"- उसने गुलदस्ता बिस्तर पर रखते हुए और मुस्कुराते हुए कहा।
"तुम्हारा शरीर गर्म है। खांसी भी हो रही है।"
"इतनी क्यों चिंता करते हो ? ठीक हो जाएगा। आओ यहाँ।" - यह कहते हुए उसने मुझे बिस्तर पर बिठा दिया और खुद भी बैठ गई। उसने ब्लैक टीशर्ट और प्लाजो पहना था। उसने टीवी में गाने लगा दिए और कहा - "तुमको पसंद है न गाने सुनना।"
वो मेरे करीब बैठी और गोद में सिर रखके लेट गई। लेटने के बाद वो कुछ नहीं बोली, आँखें बंद करके सो गई। मैं उसका सिर सहलाता रहा। बालों में हाथ घुमाता रहा। उसके केश को कान के पीछे ढकेलता रहा। कभी उसके गले पर हाथ रखा तो कभी उसकी पीठ सहलाता रहा। मानो कोई नन्हा सा बच्चा मेरी गोद में सो रहा हो। उसे गहरी नींद आ गई थी। मैं उसकी उंगलियों पर अपना हाथ फेरता रहा। मैंने पाया उसके हाथ मेरे हाथ की तुलना में बहुत मुलायम है। वो जब कभी अपने हाथ मेरे गालों पर रखती मुझे वो रुई जैसे लगते। उसके हाथ को अपनी हथेली पर रखकर मैं अंगूठे से उसकी हथेली पर फेरने लगा और दूसरा हाथ बालों पर घुमाते रहा।
करीब एक घंटा उसने नींद ली। मैंने उसकी सांसों को महसूस किया। मैंने उसका सिर धीरे से तकिए पर रखने की सोची क्योंकि मेरे घुटने दर्द करने लगे थे। जैसे ही मैंने अपने पैर हिलाए उसकी आँखें खुल गई। लेकिन वो अभी भी गहरी नींद में थी। उसने पूछा - "कितने बजे बच्चू ?" उसके शरीर पर नींद हावी थीं। मैंने उसे टाइम बताया लेकिन मुझे नहीं लगता उसने इतना गौर किया होगा। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपने गाल के नीचे रख दिया। उसने धीरे से कहा - "कुछ देर तुम भी सो जाओ न प्रिंस। प्लीज़।"
मैं धीरे से उसके पास लेट गया, लेकिन मुझे नींद का नशा मात्र भर भी नहीं था। हम दोनों एक ही तकिए पर सिर रखे लेटे थे, फर्क बस ये था कि वो गहरी नींद में भी और मैं जागा हुआ। दोनों का चेहरा एक दूसरे के सामने। हम दोनों के पैर मस्ती कर रहे थे। वो नींद में भी थी और मुस्कुरा भी रही थी। टीवी में जुबीन गर्ग का गाना काफ़ूर बज रहा था। गाने के बोल कुछ ऐसे थे -
"देखू मैं जहा भी वहा तेरा नाम रे
जाऊ मैं जहा भी ले तू मुझे थाम रे
ओ लगे तू जैसे जाड़े की बहे धुप रे
जाचे तू भी ना जतन मुझे खूब रे"
मैं भी उसके होने में काफ़ूर हो गया था। मैंने उसके बाएं गाल के तिल पर अपने होठ रख दिए और बाद में सिर को चूम लिया। मेरे होठों को भी उसके शरीर का हल्का तप महसूस हुआ। मैंने धीरे से उसके पेट पे हाथ रख के पूछा - "ओय, पीरियड्स के दिन है क्या ?"
उसने आँखें खोल के कहा - "हाँ प्रिंस।"
"मुझे लगा ही था, तभी थोड़ी थकी हुई सी लग रही हो तुम। चाय बनाऊं ?" मैंने बालों में हाथ घुमाया।
"रहने दो प्रिंस। बस यही लेटे रहो यार।"
"इतनी देर लेट गया बेब। चाय बना देता हूँ। कुछ खा लेना चाय के साथ ताकि पेट में कुछ जाए।"
मैं उठ गया और गैस पर चाय चढ़ा दी। वो आकर किचेन स्लैब पर बैठ गई। वैसे तो हाइट में वो मुझसे छोटी है लेकिन अब वो मुझसे थोड़ी लंबी लग रही थी। "नीचे बैठ जा यार। यहाँ ऊपर क्यों बैठ रही है।"- मैंने कहा।
"हर चीज़ में टोकते हो तुम। मेरा घर है। मेरी मर्जी।"
"हाँ, बात तो ये भी सही है।"
उसने मुझे अपनी ओर खींच लिया और दोनों पैरों से मुझे कस के पकड़ लिया। मैने भी उसके कमर पर हाथ रख दिए। उसने अपना सिर आगे किया और कहा - "एक किस्सी दे दो प्रिंस" मानो किसी बच्चें ने जिद्दी भरे लहज़े में कहा हो लेकिन प्यार से।
"एक क्यों ? तीन ले लो।"- मैने दोनों गालों पर भी अपने होठ रख दिए। टीवी में अब कुमार सानू का 'गाना तुम मिले दिल खिले' बज रहा था।
हम दोनों एक दूसरे की आँखों में खोए रहे और जो चीज़ हमे वर्तमान की दुनिया में ले आई वो है चाय। चाय उफनकर गैस पर गिर गई। और मैं अचानक उसे छोड़ गैस बंद कर दिया। वो हँसने लगी।
"तुम्हारा ध्यान कहाँ था प्रिंस ?"- उसने रोमांटिक लहजे में तंज कसते हुए कहा।
"तेरी वजह से ही हुआ है ये। चल अभी चाय के साथ ब्रेड खा ले ?"
मैंने चाय और ब्रेड नीचे फर्श पे रख दी। पर वो अभी भी किचेन स्लैब पर बैठी थी। मैंने उसकी ओर देखा और उसने अपने दोनों हाथ फैला दिए। मैं पास गया और उसे गोद में उठा के नीचे बिठा दिया।
"लो, खाओ ये।" - मैंने ब्रेड का एक छोटा सा टुकड़ा चाय में डुबोकर उसकी ओर बढ़ा दिया। बदले में उसने भी मुझे एक ब्रेड का टुकड़ा चाय में डुबोकर खिला दिया।
खिड़की से शाम की सुनहरी धूप फर्श पे फैल रही थी। धूप में उड़ते बारीक कण मुझे दिखाई दे रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे बारीक कण उस रोशनी को पाकर खुशी से फूले ना समा रहे हो। कण अपनी हिस्से की धूप में मानो नाच रहे हो। वो कण दुनिया भर की धूप को छोड़, मात्र घर में पड़ने वाली इस धूप से खुश थे। वैसे दुनिया की बात करना ही क्यों ? जो अपने पास आ जाए और वक्त वक्त पर, जरूरत पड़ने पर जो याद कर ले, बस वही अपना होता है। दुनिया भर की धूप को छोड़ दो। उससे हमे क्या लेना देना ? लेकिन जो धूप रोज़ वक्त आने पर आपको याद करे, आपको ऊर्जा दे, बस उसी से प्यार कर लो। अंत में मैंने जाना ये भाव उस लड़की के है जो मेरे सामने बैठके मेरे हाथों से चाय और ब्रेड खा रही है। उसने मुझे अपनी जिंदगी की धूप समझा और फिलहाल वो बीमार होके भी मेरी मौजूदगी में खुश है। यही होता है जब सच्चा और आपके लिए वक्त निकालने वाला व्यक्ति आपके पास हो।
धूप अब धीरे - धीरे आगे बढ़ रही है और सामने वाली दीवार पर पड़के गायब हो जाएगी लेकिन कल फिर किसी बहाने आएगी और कण उसी लय में फिर नाचने लगेगें।
© रविंद्र मुंडेतिया




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