Posts

Showing posts from June, 2025

मेट्रो... उन दिनों ( हमारी 'कॉमन' मेट्रो ) - 2

Image
शनिवार और रविवार के अलावा बाकी दिनों में मेट्रो में बहुत भीड़ होती है। मुंबई का मेट्रो लाइन वन यानी घाटकोपर से वर्सोवा लाइन किसी विरार फास्ट लोकल से कम नहीं। आगे पीछे से मजबूत धक्के लगते है। मेट्रो के ऑटोमैटिक दरवाज़े ऑटोमैटिक बंद भी नहीं हो पाते। भीड़ इतनी की टेक्नोलॉजी भी फैल हो जाती है। मैं कई दफ़ा मेट्रो की भीड़ में ऐसी जगह खड़ा हो गया जहां मुझे कुछ देर सांस लेने में भी समस्या हुई। इतनी भीड़ में मेट्रो की AC भी काम नहीं करती है। सभी के सिर से निकला पसीना गालों और गले तक आ जाता है। कभी पसीना गालों से होते हुए नीचे टपक जाता है तो कभी गले से नीचे उतर जाता है। छोटे कद वालों की अलग ही समस्या होती है। वे मेट्रो के ग्रेब हैंडल नहीं पकड़ पाते। पास खड़े लंबे कद के व्यक्ति की बगले सुंघनी पड़ती है।  ( घाटकोपर मेट्रो स्टेशन पर रोज का मेला ) ये सच है कि आप मुंबई में अगर नए है तो 'सफ़र कैसे करना है ?' ये आपको सीखना पड़ेगा। यहाँ सफ़र करने के कुछ रूल्स है। सबसे सामान्य रूल है 'बैग आगे लटका के सफ़र करना'। ये रूल सभी जगह लागू होता है फिर आप चाहे मेट्रो में सफ़र कर रहे हो या लोकल ट्रेन मे...

मेट्रो... उन दिनों ( 'इकिगाई' वाली लड़की ) - 1

Image
( Image : magicbricks ) वर्तमान   मैं 'घाटकोपर मेट्रो स्टेशन' से 'डी.एन नगर' जा रहा था। हर रोज़ की तरह आज भी मेट्रो खचाखच भरा था। मैं खुश था कि मुझे कम से कम अपने दोनों पैरों पर खड़े रहने की जगह तो मिल गई। 'मरोल नाका' मेट्रो स्टेशन पर भीड़ कम हुई। मैं जिस तरफ़ मेट्रो का दरवाज़ा खुल रहा था उसकी तरफ़ पीठ किए और बैग को आगे लटकाए खड़ा था। मेट्रो की बड़ी सी खिड़की से उन सभी इमारतों को देख रहा था जिनको में रोज़ देखता हूँ और साथ ही कान में इयरफोन डाले गाने सुन रहा था। तभी पीछे से कंधे पर किसी ने हाथ रखा। मैंने पीछे देखा और मुस्कुरा दिया।  ( मेट्रो के मुसाफ़िर ) वो आज सफेद कुर्ती और जींस पेंट पहनी थी। कुर्ती के ऊपर लाल रंग का बंधनी दुपट्टा था जिसमें सफेद रंग के धब्बे थे। बालों में उसने आज क्लिप नहीं लगाया था। आंखों में हल्का काजल था और हाथ में बैग। वो मेरे करीब आई और मेट्रो में लगे ग्रेब हैंडल को पकड़ लिया। "How are you prince ?" - उसने कहा।  "Fine yaar" - मैंने कहा। "So, आज कौन सी ब्रेकिंग न्यूज है ?" - वो मुस्कुराई तो उसके सभी सफेद दांत द...

'सितारे जमीन पर' हमें क्या सिखाती है ?

Image
  ( फिल्म का पोस्टर )  शाम के क़रीब साढ़े नौ बजे हुए थे। मैं दादर के चित्रा सिनेमा से बाहर निकल रहा था। थिएटर में सिर्फ़ वयस्क और माता पिता ही नहीं थे बल्कि उनके साथ बच्चें भी थे। अधिकतर लोगों को फिल्म नॉर्मल लगी, लेकिन अच्छी वाली नॉर्मल। फिल्म में हास्य के, दुःख के, उत्सुकता के और भावुक कर देने वाले पल थे। आमिर खान की यह फिल्म सभी का मिश्रण थी।   ( चित्रा सिनेमा, दादर ) साल 2007 में आमिर खान की फिल्म 'तारे ज़मीन पर' आई थीं। छोटी उम्र और फिल्मों की ज्यादा समझ न होने के कारण 2007 में तो यह फिल्म मैं देख नहीं पाया लेकिन बाद में इस फिल्म को जरूर देखा। फिल्म 'तारे ज़मीन पर' बच्चों को देखने और समझने का नज़रिया बदलती है। यह फिल्म डिस्लेक्सिया से ग्रसित एक बच्चें की कहानी थी। 'डिस्लेक्सिया' एक विशिष्ट पढ़ने संबंधी विकार है जिसमें व्यक्ति शब्‍दों को सही ढंग से पढ़ने लिखने में परेशानी महसूस करता है। इस फिल्म में आमिर खान ने एक शिक्षक की भूमिका अदा कर समाज को एक सामाजिक संदेश दिया था।  अब 18 साल बाद आमिर खान 'सितारे ज़मीन पर' लेकर आए है। इसे 'तारे ज़मीन पर...

सवाल भी मैं और जवाब भी मैं

Image
नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर  घर का रस्ता भूल गया क्या है तेरा ? क्या है मेरा ? अपना पराया भूल गया।  ( बस में बहुत भीड़ हो चुकी थी। मैं खिड़की के पास वाली सीट पर बैठा था। मेरी नज़र अचानक उसपर पड़ी जिसे मैं पिछले कुछ दिनों से देख रहा था। पांच फुट का आदमी लंबा सा ट्रेंच कोर्ट पहना। वो मेरी ओर पीठ किए खड़ा था। वो पिछले कुछ दिनों से रोज यही खड़ा रहता है। मूर्ति सा। ना हिलता है और न ही कही जाता है। मैंने अपने क़रीब बैठे आदमी से उसके बारे में पूछा। उसका जवाब सुन मेरे होश उड़ गए। उसका जवाब था कि मुझे तो वहां कोई आदमी नहीं दिखाई दे रहा है। मैंने आगे की सीट पर बैठे एक व्यक्ति से यही सवाल फिर पूछा, तो उसने भी कुछ ऐसा ही जवाब मुझे फिर दिया। बड़ी अजीब बात है। ये लोग इसे देख क्यों नहीं पा रहे ?    कॉलेज से निकलते वक्त फिर वही आदमी मुझे दिखाई दिया। इस बार भी वो मेरी ओर पीठ किए खड़ा था। मूर्ति सा। दोनों हाथ पीछे किए खड़ा था। वो मेरी ओर मुँह करके क्यों नहीं खड़ा होता। मैंने अपने दोस्त से उसके बारे में पूछा। दोस्त ने कहा वहां कोई ऐसा व्यक्ति नहीं खड़ा है। दोस्त ने मुझे चश्मा बदलने की सलाह...