मेट्रो... उन दिनों ( 'BMM' ग्रेजुएट लड़की ) - 3


रविवार था लिहाज़ा मेट्रो में भीड़ बहुत कम थी। आज बैठने की सीट मिल गई। मेट्रो निर्धारित समय पर थी। 'This train terminate at versova station.' मेट्रो में रोज़ की तरह अनाउंसमेंट हो रही थी। नए यात्रियों के लिए सुनने लायक और रोज़ सफ़र करने वालों के लिए नजरअंदाज करने लायक। मैंने भी हर बार की तरह नजरअंदाज कर दिया। मेट्रो में बैठें ज्यादा लोग फोन में व्यस्त हो गए। इसके अलावा जिनके साथ अपने दोस्त और रिश्तेदार थे वे बातों में व्यस्त हो गए। 

( किसी एक रविवार की तस्वीर )

मैं 'मरोल नाका' स्टेशन का इंतजार कर रहा था। और उससे भी ज्यादा काव्या का। 'मरोल नाका' स्टेशन का आना तो निश्चित है लेकिन काव्या आज भी मिलेगी या नहीं, इस बारे में कुछ कह नहीं सकते। अंतिम बार गुरुवार को मिली। "हम दोनों में एक चीज़ कॉमन है।" बस यह कहकर उसने उस दिन बाय कह दिया था। मैं उस दिन के बाद अभी तक उस 'कॉमन' चीज़ का अनुमान लगा रहा हूँ। काफ़ी सोचने के बाद मैंने कुछ चीजें एक तरफ़ की जो मुझे दोनों में 'कॉमन' लगी। शुक्रवार को वो नहीं मिली थी और शनिवार को मिलना नामुमकिन है क्योंकि उस दिन मेरा वीक ऑफ रहता है। अगर वो आज मिली और पूछेगी तो सभी सोची हुई 'कॉमन' चीजें बोल दूँगा। पर मिले तब न। 

जैसे जैसे मेट्रो वर्सोवा की ओर बढ़ रही थी लोग कम होते जा रहे थे। मैं हर बार तरह मेट्रो के अंतिम यानी चौथे डिब्बे में बैठा था। 'साकी नाका' स्टेशन आने पर मेरे दोनों तरफ़ बैठें दो - दो यात्री उठ गए। अब मेरे दोनों तरफ़ स्पेस था जो कि मैं चाहता था। मैं चाह रहा था कि काव्या आए तो उसे बैठने की जगह मिले। 'Next station marol Naka.' ' Doors will open on the left.' मेरे कानों में यह अनाउंसमेंट गूंजी। 'मरोल नाका' स्टेशन आया। मेट्रो धीरे हुई। रुकी। लेकिन दरवाज़े खुलने से पहले ही मैंने गिने चुने मुसाफिरों को देख लिया था। यह देख के थोड़ी सी निराशा हुई कि उन मुसाफिरों में काव्या नहीं थी। मैंने एक बहुत ही छोटी सी स्माइल होठों से छोड़ी और आज की इस मेट्रो को 'कॉमन' वाली मेट्रो की सूची से निकाल दिया। 

दरवाज़े मेरे सामने खुले। लोग बाहर निकले और कुछ अंदर आ गए। दो लोग मेरे बाएं तरफ़ आकर बैठ गए और एक आदमी मेरे दाएं तरफ। दाएं तरफ बैठे व्यक्ति की दाहिनी सीट अभी भी खाली थी। मेट्रो शुरू हुई। मैं इयरबड्स लगाए हुए था। प्लेलिस्ट में जाकर गाना बदला। अब कानों में अक्षय और दीपिका का 'तेरे नैना' गाना प्ले हो रहा था। फोन मेरे बाएं हाथ में था और मैं एक न्यूज स्क्रॉल कर रहा था। मेरा ध्यान फोन में था। दाएं कंधे पर किसी से धीरे से मारा और नाम पुकारा - "हाय प्रिंस।" आवाज़ सुनते ही मैं पहचान गया। काव्या आज व्हाइट हॉफ स्लीव और कार्गो पेंट पहनी थी। मैंने मेरे दाएं तरफ बैठे व्यक्ति को उसकी दाहिनी सीट पर बैठने का आग्रह किया। काव्या मेरे क़रीब बैठ गई। 

"गाना सुन रहे हो ?"

"हाँ, तुम सुनना चाहती हो ?"

"दो।" - उसने इयरबड्स के लिए हाथ बढ़ाया। 

मैंने अपने दाएं कान से इयरबड्स निकाला और उसके हाथों में रख दिया। काव्या ने दाहिने कान में इयरबड्स लगा लिया। 

"Nice song."

"तुमने आज सेकंड लास्ट डिब्बे से मेट्रो पकड़ा ?"

"हाँ। क्यों पूछ रहे हो पर ?"

"बस ऐसे ही। हर बार इसी दरवाज़े से एंट्री मारती हो न इसीलिए पूछा।" - मैंने दरवाज़े की तरफ़ हाथ करके कहा। 

"आज स्टेयर चढ़ते ही मेट्रो आ गई थी सो वही से मेट्रो पकड़ ली।"

"अच्छा हुआ मेट्रो पकड़ ली वरना मैंने तो आज की इस मेट्रो को 'कॉमन' वाली मेट्रो की सूची से निकाल दिया था।"- मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

"कुछ ज्यादा ही जल्दी डिसीजन नहीं लेते हो तुम, मिस्टर प्रिंस। ये नहीं कि थोड़ी देर और वेट कर ले।"- काव्या के चेहरे पर गंभीर भाव भी थे और साथ ही हल्की मुस्कान। "अच्छा तुमने Assignment किया ?"

"Assignment ? कौन सा Assignment ?"

"अरे... कुछ सोचा 'कॉमन' चीज़ पर ? कही तुम भूल तो नहीं गए न ?" - उसने आँखों के साथ - साथ उंगली भी दिखाई। 

"अच्छा वो क्या। वो तो मुझे याद है।"

"तो फिर ऐसा क्यों कहा कि 'कौन सा Assignment ?'"

"तुमने Assignment कहा ना, सो मैं थोड़ा कंफ्यूज हो गया।"

"Okay. अब बताओ।"

"उम्म... हमारी हाइट।"- मेरी सोची हुई चीजों की टोकरी में से मैंने पहली कॉमन चीज़ निकाली। 

"प्रिंस, मुझे जोर से हँसी आ रही है, लेकिन मेट्रो में ज़ोर से हँस भी नहीं सकती।" - काव्या की इस बात पर मैंने तो सामान्य सी हँसी छोड़ी।

"और बताओ।"

"उम्म... किताबें पढ़ना ?"

"No."

"उम्म... बैग कलर ?"

"No."

"उम्म... जॉब टाइमिंग ?"

"No."

"उम्म... हम दोनों मीडिया में है ?"

"No."

"उम्म... एक ही रूट से सफर करते है ?"

"No."

"उम्म... हेयर कलर ?"- यह कहकर मैं हँसा।

"No."

"तो अब तुम ही बता दो।"

"बस, मान गए हार। थोड़ा और सोचो।"

"सोच तो लिया।"

"Okay. सो हम दोनों में जो इंट्रेस्टिंग 'कॉमन' थिंग है वो है... वो है... वो ये है कि हम दोनों 'BMM' से ग्रेजुएट है।"- यह कहते हुए वो बहुत खुश हुई। 

"ओह्ह्ह... ये तो सच में इंट्रेस्टिंग है।"

"हाँ ना। और तुम कुछ भी 'कॉमन' बता रहे थे।"

"कौन से कॉलेज से किया तुमने ग्रेजुएशन ?"

"झुनझुनवाला कॉलेज से।"

"घाटकोपर।"

"हाँ और तुमने गुरु नानक कॉलेज, जीटीबी से। राइट ?"

"हाँ, तुमको इतना सब पता है।"

"ह्म्म... मैंने तुम्हारा इंस्टाग्राम अकाउंट चेक किया इसीलिए पता है।"

"ओहो। तुमको पता तो है न किसी को स्टॉक करना क्राइम है ?"

"अच्छा। तो ले चलो पुलिस स्टेशन।"

"वैसे तुमने मुझे नुकसान नहीं पहुंचाया है इसीलिए छोड़ रहा हूँ।"

उसने मेरी इस बात पर मुँह बिगाड़ते हुए कुछ तो कहा जिसके लिए लेखनी में कोई शब्द नहीं है। इस बात पर हम दोनों बस हँसें। 

"तुम अभी मास्टर्स कर रहे हो क्या ?"- काव्या ने पूछा।

"हाँ।"

"सब्जेक्ट ?"

"Communication in journalism. तुमने कब ग्रेजुएशन कंप्लीट किया ?"

"2025."

"तुमको तो डिग्री भी नहीं मिला होगा ?"

"हाँ ना। मैं उस पल का इंतजार कर रही हूँ जब मैं काला कोट पहनूंगी और डिग्री लूंगी।"

"आने वाले शनिवार को मेरे कॉलेज में डिग्री डिस्ट्रीब्यूशन है।"

"Wow... उस पल को एंजॉय करना। वहाँ पर भी सीरियस मत रहना।"- उसने कहा और मैं हँसा।

"तुम कब से जॉब कर रही हो ?"

"जब मेरा सेकंड ईयर शुरू हुआ तभी से।"

"मतलब जॉब एक्सपीरियंस तुम्हारे पास ज्यादा है।"

"हाँ, लेकिन मैंने ग्रेजुएशन लाइफ एंजॉय नहीं की। जॉब लगने के बाद कॉलेज जाना कम हो गया जिसके कारण दोस्त भी नहीं बने।"

"You know kavya. कुछ ना कुछ तो छूट ही जाता है। कॉलेज लाइफ में अगर जॉब को चुनते है तो कॉलेज का एंजॉयमेंट और नए दोस्त फिर नहीं बन पाते हैं।"

"Right."

'आज़ाद नगर' स्टेशन आने वाला था। काव्या शान्त हो चुकी थी। एयरबड्स में 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' फिल्म का गाना 'बावरा मन' बज रहा था। 

"क्या सोच रही हो ?"

"सोच रही हूँ जिंदगी कितनी जल्दी निकल जाती है। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैने कल ही बैचलर्स के लिए एडमिशन लिया हो और आज कंप्लीट कर लिया हो।"

"Yaa, किसी ने सच ही कहा है। life is too short. Enjoy it."

"तुम्हारे तो ग्रेजुएशन के अच्छे दोस्त होंगे ?"

"हाँ, कह सकती हो। बहुत लोगों से आज भी बात होती रहती है।"

"मेरी तो एक बेस्ट फ्रेंड है। वो भी अब दिल्ली चली गई है।"

"बातें होती है उससे ?"

"हाँ कभी - कभी हो जाती है।"

"क्यों गई वो वहाँ ?"

"उसको वही से मास्टर्स करना था इसीलिए। हम दोनों साथ में लखनऊ से मुंबई आए थे स्टडी के लिए।"

"ओह... इसका मतलब तुमने 12th लखनऊ से किया था ?"

"हाँ।"

काव्या ने जैसे ही हाँ बोला उसी वक्त मेट्रो का दरवाज़ा खुला। मैं यह सोच के बैठा था कि 'आज़ाद नगर' स्टेशन आया होगा लेकिन 'आज़ाद नगर' निकल चुका था। बातों ही बातों में मुझे पता ही नहीं चला। 'डी . एन नगर' स्टेशन आ चुका था। काव्या ने अचानक कहा - "अरे ये तुम्हारा स्टेशन है। भागो।" मैं उठा और जल्दी बाहर निकल गया। काव्या हँसने लगी और बाकी के लोग भी। लेकिन इस हड़बड़ाहट में, मैं अपना एक एयरबड्स लेना भूल गया। एस्केलेटर से उतरते हुए मुझे अपना एयरबड्स याद आया।

( 'डी. एन नगर' स्टेशन पर किताबों का भंडार )


© रविंद्र मुंडेतिया

( 'मेट्रो... उन दिनों' की कहानी अभी जारी है...


चैप्टर 4 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - काव्या की यादें और उसकी छोटी सी कहानी

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