मेट्रो...उन दिनों ( काव्या का स्पेशल दिन ) - 6

 


वर्तमान  ( वर्तमान की थोड़ी सी कहानी यहाँ से शुरू हुई थी। )


"कोई ऐसे ही इतनी अच्छी ड्रेस थोड़ी न पहनता है। कुछ स्पेशल है क्या आज ?"- उसने दुप्पटे के एक छोर को उठाया और अपने कंधे पर रख दिया। 

"तुमको ऐसा क्यों लग रहा है भला ?"- उसने कंधे उचकाते हुए कहा।

"तुमको देखकर लग रहा है।"

"कोई इंसान बिना किसी वजह के नई ड्रेस नहीं पहन सकता क्या ?"- यह कहते हुए उसने अपनी गर्दन हिलाई जिससे उसके कानों में झूल रहे झुमकों ने आवाज़ की। 

"पहन सकता है।"

"हाँ तो मैंने भी पहन लिया।" - काव्या ने कहा।

"ओके... मुझे ऐसा लगा कि कुछ ख़ास हो सकता है।"- उसने मेरी ओर तिरछी नज़र से देखा और मुस्कुराने लगी। 

'मरोल नाका' के बाद भीड़ तो कम हुई पर ज्यादा नहीं। अभी भी मेट्रो में लोग थे। काव्या और मेरे बीच में थोड़ी भी जगह नहीं बची थी। 

"तुमको पता है। ऐसे दुप्पटे राजस्थानी लड़कियाँ बहुत इस्तेमाल करती है।"- मैंने कहा।

"ह्म्म... अच्छा है ये कपड़ा।"- उसने दुप्पटे के कपड़े की क्वालिटी देखने के लिए दुप्पटा मेरे हाथ में दिया। 

"Yes, अच्छा क्वालिटी है।" - मैंने कहा। 

मुझे कपड़ों की क्वालिटी के बारे में रद्दी भर पता नहीं है। लेकिन मैंने उस दुप्पटे को अच्छी क्वालिटी वाली श्रेणी में डाल दिया था। 

"कुछ महीनों पहले लखनऊ गई थी तब खरीदा ये ड्रेस। अच्छी लग रही हूँ न ?" - काव्या ने पूछा।

"अभी थोड़ी देर पहले ही तो कहा था 'you looking pretty'."- मैंने कहा। 

"लेकिन इस बार मैंने आगे से पूछा, तो तुमको जवाब देना चाहिए।"

मैं कुछ समझा नहीं। ये बात वो गुस्से में बोल रही थी या प्यार से। "हाँ, अच्छी लग रही हो काव्या।" मैंने मुस्कुराते हुए इसके आगे ये भी जोड़ा - "किसी की नज़र ना लगे।"

"हाँ यार सही कहा। एक काम करती हूँ। थोड़ा सा काजल कान के पीछे लगा देती हूँ। मम्मी कहती है इससे नज़र नहीं लगती है।"- यह कहकर उसने अपने दाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली को दाएं आँख में लगे काजल के हिस्से पर रखा और फिर उसी उंगली को दाएं कान के ठीक पीछे रख दिया। इसके ठीक बाद उसने अपने बालों को काम के पीछे ढकेल दिया। काव्या के द्वारा की गई इस क्रिया को मैं एकतराज देखता रहा। उसने अपनी वही काजल वाली उंगली मेरी ओर बढ़ाई। 

"क्या ?" - मैंने उंगली देखते हुए कहा।

"तुम इतने ध्यान से देख रहे हो। मुझे लगा तुमको भी काजल लगवाना होगा। लगाऊं ?"- हम दोनों हँसने लगे। 

"तुमने सही कहा। आज स्पेशल दिन है।"- काव्या ने कहा। 

"देखा! मैंने कहा था न, कुछ न कुछ तो स्पेशल है आज।"- मैंने कहा।

"तुम पूछोगे नहीं क्या स्पेशल है ?"- काव्या ने मेरी ओर देखते हुए कहा। 

"मैं नहीं पूछूँगा तो तुम नहीं बताओगी ?"

"बता दूँगी, लेकिन क्या है कोई पूछता है तो बताने में  अच्छा लगता है।"- काव्या ने कहा।

"ओके काव्या जी... तो आज कौन सा स्पेशल दिन है ? कृपया करके हम जैसी नाचीज़ को बताइए।"- मैंने अभिनय के साथ कहा।

"हाँ ये हुई न कुछ बात! अब तुम इतना कह रहे हो तो बता ही देती हूँ। वैसे भी तुमसे क्या छुपाना।"

"तुम एक्टिंग क्लास क्यों नहीं ज्वाइन कर लेती। इतना अच्छा एक्टिंग कर लेती हो।"- मैंने उसके बार बार किए जाने वाले अभिनय को देखने के बाद कहा। 

"कोई भी प्रोड्यूसर मेरे पर पैसे नहीं लगाएगा।"

"हाँ, प्रोड्यूसर उन लोगों पर पैसे लगाते है जो एक्टिंग करते है। ओवर एक्टिंग करने वालों पर नहीं।"- ये कहकर मैंने काव्या की ओर देखा जो मुझे घूर रही थी लेकिन होठों पर नन्ही सी हँसी लिए। 

काव्या ने धीरे से मेरी पीठ में घुसा मारा लेकिन मैंने ऐसे एक्टिंग की जैसे मुझे बहुत जोर से लगा हो। मैं अपनी पीठ बेवजह ही सहलाने लगा।

"ज्यादा एक्टिंग करोगे तो सच में मारूंगी।"- काव्या ने कहा

"धमकी! वो भी मारवाड़ी आदमी को। मैं इन धमकियों से नहीं डरता।"

"अच्छा..."- काव्या ने उस उद्देश्य से गर्दन हिलाते हुए कहा जैसे वो अब कुछ करने वाली थी। 

"हाँ। मैं डरता नहीं किसी से।" 

"पैर मारुं जूतों पर ? हं मारुं ?"- काव्या किसी छोटे बच्चें से कम नहीं लग रही थी।

"ऐ... नहीं हाँ। जूते इंपॉर्टेंट है।"- यह कहते हुए मैंने अपने बाए पैर को दाएं पैर के दाएं रख दिया। 

"चलो ठीक, नहीं मारूंगी। डरपोक माणुस। - काव्या ने कहा।

"अब बताओ भी, क्या है स्पेशल ?"- मैंने दरवाज़े के ऊपर टिमटिमाती लाइन को देखते हुए कहा।

"मैं वही बताने वाली थी लेकिन तुमने ये एक्टिंग की बात छेड़ दी।"

"ओके सॉरी बाबा। अब बताओ।"- मैंने कहा।

"कुछ ख़ास नहीं। बस आज मेरा बर्थडे हैं।"- यह कहते हुए काव्या ने अपने कंधे उचकाए और हल्का सा मुस्कुराई।

"Wow... Happiest Birthday Kavya jiii. I wish कि आपकी सारी कामनाएं पूरी हो और ये आने वाला साल आपके लिए खुशियाँ लाए।" - मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

"Thank you very much Prince."- उसने कहा, लेकिन उसके कहने में और चेहरे पर कुछ निराशा मुझे दिखी। 

"क्या हुआ काव्या ?"- मैंने कहा। 

"कुछ नहीं प्रिंस। कल से सभी के मैसेजेस आ रहे है। लेकिन तुमने इतने प्यार से फेस तो फेस विश किया। सो अच्छा लगा।"- काव्या ने कहा

"You miss someone kavya ?"

"एक्चुअली, मैंने आज अपनी फ्रेंड के साथ बाहर डिनर करने का प्लान बनाया था।"

"ये तो अच्छी बात है। जाओ फिर शाम को। दिन की एंडिंग खूबसूरत करो।"- मैंने कहा 

"लेकिन वो यहाँ नहीं है। कल सुबह ही नागपुर चली गई। उसे कुछ अर्जेंट काम था।"

"आज शाम तक नहीं आ पाएगी ?" - मैंने कहा। 

"नहीं ना।"- काव्या ने कहा। 

दरवाज़े के ऊपर आने वाला स्टेशन दर्शाने वाली टिमटिमाती रेखा अब 'अंधेरी स्टेशन' पर टिमटिमा रही थी। 'अंधेरी स्टेशन' आने वाला है। अंधेरी उतरने वाले मुसाफ़िर दरवाज़े के क़रीब जाकर खड़े हो रहे थे। अंधेरी आने के बाद मुझे और काव्या को बैठने की सीट मिल गई। 

"तुम हमेशा अपने बर्थडे के दिन बाहर ही डिनर करती हो ?"- मैंने पूछा।

"जब से बैचलर ज्वाइन किया है तभी से। लखनऊ में थी तब तो घर में ही प्रोग्राम रखते थे। मिंस घर पे केक वगैरा लाते थे। मम्मी कुछ पकवान बना देती थी।"- काव्या के चेहरे पर निराशा भी थी और मुस्कान भी।

"मम्मी से बात हुआ आज ?"- मैंने कहा।

"हाँ। मम्मी और भाई दोनों से बात हुआ।"

"विश किया तुमको ?"

"हाँ। विश भी किया और बोले कि तुम्हारी याद आ रही है।" 

"तुमको लखनऊ जाना चाहिए।"- मैंने सुझाव दिया।

"हाँ, जाना तो है ही।"

'आज़ाद नगर' आ चुका था। हम दोनों दरवाज़े के क़रीब खड़े हो गए। दरवाज़े की खिड़कियों से हम बाहर का नज़ारा देख रहे थे। जिस प्रकार मेट्रो के अंदर से बाहर का शहर शांत दिख रहा था। ठीक वैसे ही काव्या भी बाहर से शांत दिख रही थी। लेकिन ये शहर शांत नहीं है। शहर रफ्तार में है। शहर सक्रिय है। इस शहर के अंदर हलचल है। शहर हमसे कुछ कहना चाहता है। ठीक वैसे ही, काव्या भी बाहर से शांत है, लेकिन अंदर से नहीं। मन के भीतर वो हलचल में है। उसका मन सक्रिय है और निरंतर सोच रहा है। उसका मन कुछ कहना चाहता है।

( चार लोग )


"प्रिंस।"- काव्या ने कहा।

"हाँ।"

"If you don't mind. क्या तुम चल सकते हो डिनर पर ?"- काव्या ने कहा लेकिन उसकी नज़र अभी भी शहर हो देख रही थी।

"मैं!"- मैंने चौंकते हुए कहा।

"यहाँ तुम्हारे अलावा और भी कोई खड़ा है क्या ?"- काव्या ने हल्का सा तंज कसते हुए कहा। 

"नहीं, But मुझे ऑफिस से लेट भी हो सकता है और कुछ अर्जेंट आने वाले काम का भरोसा नहीं।"

"ओके... यार। मैं वैसे भी तुमको फोर्स नहीं कर सकती। घर पे ही डिनर कर लूंगी।"- काव्या ने कहते हुए गर्दन हिलाई। 

'डी.एन नगर' आने ही वाला था। 'This train terminate at versova station' मेट्रो में अनाउंसमेंट हो रही थी। 

"तुमने सही कहा था प्रिंस।"- काव्या ने कहा।

"क्या ?"

"यही कि बिना दोस्त और अपनो के कुछ मजा नहीं, फिर चाहे वो कितना ही इंपॉर्टेंट दिन क्यों न हो। आज तुम्हारी कही गई बात अच्छे से रिलेट हो पा रही है।" - काव्या ने वही कहा जो मैंने कुछ दिनों पहले उसे कहा था। 

चंद सेकंड रह गए थे 'डी.एन नगर' आने में। मैं एक गहरी सोच में डूब गया। 'काव्या ने जो डिनर का न्योता दिया, जाऊं या नहीं' मैं ये सोच ही रहा था कि काव्या ने कहा - "तुम सच में नहीं आ सकते क्या ?"

"आ तो सकता हूँ। पर..."

"पर क्या ? देखो... मैं तुम्हारे साथ कोई दुष्कर्म नहीं करूंगी। तुम्हे हाथ भी नहीं लगाऊंगी। बस।"

"ऐसा कुछ नहीं है।"- मेरे चेहरे पर हँसी थी।

"तो कैसा है ?"- काव्या ने अपने दोनों हाथ कमर पर रखते हुए नाटकीय भाव में कहा। 

आखिर में मैंने "हाँ" कह ही दिया। "ह्म्म... ये हुई न कुछ बात। मारो अब ताली।"- काव्या ने कहकर हाथ आगे बढ़ाया। "मिलना कहा है ? और कितने बजे ?"- मैंने पूछा। 

"साढ़े आठ बजे। वर्सोवा मेट्रो के नीचे जो बस स्टॉप है वहाँ पर। ठीक।"

"ओके।"

"आना जरूर। ऐसा ना हो जाए कि मैं तुम्हारा इंतजार करते ही रह जाऊं।" - काव्या ने कहा।

"I hope कि आज काम ज्यादा ना हो। अगर थोड़ा लेट हो जाऊं तो इंतजार करना, ठीक है।"- मैंने कहा और मेट्रो से बाहर निकल गया।

काव्या ने दरवाज़ा बंद होने के बाद अपने दाएं हाथ से थंब दिखाया और मैंने उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कुराहट देखी।


© रविंद्र मुंडेतिया


( 'मेट्रो... उन दिनों' की कहानी अभी जारी है...


चैप्टर 7 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - काव्या और मैं एक छतरी में


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