मेट्रो... उन दिनों ( जन्मदिन मुबारक हो काव्या ) - 7
शाम का समय
मैं ऑफिस में अपनी डेस्क के सामने बैठा स्टोरी लिख रहा था जिसे अर्जेंट ब्यूरो चीफ़ को भेजना था। विक्रम अपनी डेस्क पर बैठा अपनी प्रेमिका से बतिया रहा था। जब कभी उसके पास काम नहीं रहता वो अपनी प्रेमिका से बतियाने लगता है। वो कहता है मेरे लिए ये भी एक काम है। कुर्सी पर आराम से एक तरफ झुक के बैठ जाना, कोहनी को कुर्सी के हत्थे पर टिका देना और फिर चक्के वाली कुर्सी को धीरे धीरे पैरों से कभी दाएं तो कभी बाएं घुमाना, बस यही सब दो प्रेमियों की बातों को खास बना देता है। चक्के वाली कुर्सी जितनी ज्यादा और स्मूद घूमती, समझ लो विक्रम और उसकी प्रेमिका के बीच बातें उतनी ही रोमांटिक होती। मैं अक्सर उन दोनों के बीच होने वाली बातों पर मुस्कुरा देता हूँ और सोचता हूँ कि क्या प्यार में हर व्यक्ति एक बच्चा बन जाता है ? मुझे इसका जवाब "हाँ" ही लगता है क्योंकि मैंने प्रेम में डूबे हर व्यक्ति को कुछ ऐसा ही पाया है।
मैंने अपने कंप्यूटर की स्क्रीन पर टाइम देखा। साढ़े आठ बजने में अभी पांच मिनट बाकी थे। मैंने आराम की सांस की छोड़ी क्योंकि अब मेरे पास कोई पेंडिंग काम नहीं बचा था। लेकिन तभी ब्यूरो चीफ़ का कॉल आता है और वो एक स्टोरी फाइल करने के लिए बोल देता है। मेरे चेहरे पर वहीं रिएक्शन आया जो अक्सर उन कर्मचारियों के चेहरे पर आ जाता है जब उनका लॉगआउट का टाइम हो और काम मिल जाए। मैं जल्दी से स्टोरी पर लग गया। शुक्र है कि स्टोरी ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड नहीं थी। सरल होने की वजह से जल्दी से स्टोरी टाइप किया और लॉगआउट किया।
मैं जल्दी ऑफिस से निकला और 'डी.एन नगर' मेट्रो स्टेशन आ गया। आठ बजकर पैतालीस मिनट हो चुका था। मेट्रो के आने में अभी दो मिनिट बता रहा था। मैं पहले से लेट था। रिमझिम बारिश हो रही थी। उस दिन मुंबई में बारिश के साथ गरज का कहा गया था। सुबह भी बारिश हुई थी। लेकिन मैं नहीं चाहता कि अभी बारिश आए। दो मिनिट इंतजार करने के बाद वर्सोवा की मेट्रो आ गई। मेट्रो लगभग पूरी खाली थीं। मैं दरवाज़े के पास ही खड़ा हो गया क्योंकि आने वाला स्टेशन वर्सोवा ही है जो इस मेट्रो लाइन का अंतिम स्टेशन है।
आठ बजकर पचास मिनट पर मैं वर्सोवा मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर एक से बाहर निकला। रिमझिम बारिश फिर शुरू हो चुकी थी। मैं सेवन बंगलो बस स्टॉप पर खड़ा था जो 'डी.एन नगर' की ओर जाता है। लेकिन यहाँ काव्या नज़र नहीं आ रही थी। 'कही वो इंतज़ार करके चली तो नहीं गई। नहीं नहीं, मुझे इतना जल्दी निर्णय नहीं लेना चाहिए।' मैं मन ही मन सोचने लगा।
बारिश बिल्कुल थम सी गई थी लेकिन बादल गरज रहे थे। बारिश की वजह से मेरे चश्मे पर फॉग आ गई थी। मैं बस स्टॉप के नीचे गया और रुमाल निकाल के चश्मा साफ करने लगा। चश्मा अच्छे से साफ़ हुआ या नहीं ये देखने के लिए मैंने चश्मे को सामने वाले बस स्टॉप से आ रही लाइट के सामने रखा। चश्मा बिल्कुल साफ़ हो गया था। पानी की एक भी बूंद चश्मे पर नहीं थी। लेकिन ये क्या ? उस साफ़ सुथरे चश्मे में कोई और भी दिखा और वो थी काव्या।
काव्या उस सेवन बंगलो बस स्टॉप पर खड़ी थी जो वर्सोवा बीच की ओर जाता है। मैंने अपना चश्मा पहना और उसे कुछ देर देखता रहा। वो निरंतर 'वर्सोवा' मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 6 की ओर देख रही थी जहाँ से लोग आ जा रहे थे। उसने फोन निकाला और टाइम देखा। टाइम देखने के बाद फिर वो गेट नंबर 6 की ओर देखने लगी।
( उस दिन की बूंदा बांदी )
साढ़े आठ का टाइमिंग था लेकिन नौ बज चुके थे। काव्या अब अपने दोनों हाथों को एक दूसरे में फोल्ड कर बैठ गई मानो ऐसे जैसे उसने मान लिया हो कि अब मैं नहीं आऊंगा।
अब मैं उसको और इंतजार नहीं करवाना चाहता था। मैंने उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए। हालांकि उसने तो नहीं देखा लेकिन उसके क़रीब खड़े एक व्यक्ति ने मुझे देखा। वो व्यक्ति समझ गया। उसने काव्या को कहा और मेरी तरफ इशारा किया। काव्या के चेहरे पर अचानक से खुशी लौटी लेकिन अगले ही पल उसने गुस्से से मेरी ओर देखा। उसने मुझे मुक्का दिखाया। मैं रोड क्रॉस करके सामने वाले बस स्टॉप पे गया। काव्या दोनों हाथ बांधे मुझे घूर रही थी।
"चलो, चलते है।"- मैंने कहा। लेकिन काव्या अभी भी घूर रही थी।
"क्या हुआ काव्या ?"- कारण पता होते हुए भी मैंने अंजान बनने का नाटक किया।
"क्या हुआ ? ज्यादा नाटक करने की कोशिश मत करो, हं। साढ़े आठ का टाइम था प्रिंस और अभी टाइम देखो, नौ पांच हो रहा है।"- काव्या ने टाइम दिखाने के लिए अपने फोन को मेरी ओर बढ़ाया।
"Sorry Kavya. मैं तो टाइम पर फ्री हो गया था लेकिन एक अर्जेंट स्टोरी आ गई और फिर 'डी.एन नगर' मेट्रो स्टेशन पर मेट्रो का इंतजार किया सो टाइम लग गया।
"लेकिन शुक्रिया।"- मैंने कहा।
"अब ये क्यों ?" - काव्या ने कहा।
"तुमने इंतजार किया इसीलिए।"
"कसम से, अगर तुम थोड़ी देर में नहीं आते न, तो मैं चली जाती।"- काव्या ने उंगली दिखाते हुए कहा।
"लेकिन मैं तो आ गया न।"- मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
"चलो अभी, चलते है। - आखिरकार काव्या ने कहा।
"हाँ।"
हमने जैसे ही बस स्टॉप छोड़ा झोर से बारिश शुरू हो गई। हम भागते हुए फिर बस स्टॉप के नीचे आ गए। "Oo Shit."- काव्या ने चेहरे को सिकोड़ते हुए कहा।
"तुम छाता लाए हो ?"- काव्या ने मुझसे पूछा।
"हाँ, लेकिन छाता शायद खराब हो गया है।"- मैंने बैग में से छाता निकाला।
"तुम लाई हो छाता ?"
"हाँ। ये देखो।"
काव्या ने छतरी का बटन दबाया और छतरी खुल गई। वो बस स्टॉप के शेड से बाहर निकल गई क्योंकि उसके पास खुली हुई छतरी थी। "तुम्हारी छतरी जाम हो गई है क्या ?"
"हाँ शायद। बटन दबाने पर भी नहीं खुल रही है।"
"एक बार फिर से कोशिश करो। क्या पता खुल जाए।"- काव्या ने कहा।
मैंने दोनों हाथों के अंगूठे छतरी के बटन पर लगाकर झोर लगाया। ताकत लगाते हुए मैंने अपनी दोनों आँखें बंद कर ली। मैंने एक बार फिर कोशिश की लेकिन इस बार कुछ उल्टा हुआ। छतरी अचानक से आगे जा गिरी और सिर्फ छतरी का डंडा मेरे हाथों में रह गया था। काव्या जोर से हँसने लगी।
"अब ?"- काव्या ने अपनी हँसी रोकते हुए कहा।
"अब क्या ही कर सकता हूँ।"- मैंने डंडा दिखाते हुए कहा।
"कुछ मत करो। अब मेरी ही छतरी तुमको इस बारिश से बचा पाएगी।"- उसने छाता घुमाते हुए कहा जिससे मेरे चश्मे पर कुछ बूंदे फिर ठहर गई।
"छतरी एक और लोग दो। हम भीग गए तो ?"
"इतना तेज़ तो बारिश भी नहीं है प्रिंस।"- काव्या ने छतरी से हाथ बाहर निकालते हुए कहा।
"ठीक है फिर।"- मैंने कहा और छतरी के नीचे चला गया।
"यहाँ से कितना दूर है ?"- मैंने पूछा।
"तक़रीबन चार सौ मीटर।"
"बारिश ज्यादा न हो तो अच्छा है।"- मैंने कहा।
हम दोनों का एक एक कंधा बारिश से भीग रहा था। मेरा बायां कंधा और काव्या का दायां कंधा भीग रहा था। हम दोनों ने अपने बाए हाथ से छतरी का हैंडल पकड़ा हुआ था।
"छतरी कुछ ज्यादा ही छोटी नहीं है काव्या।"-
"अच्छा! ठीक है तो भीगो अब।"- यह कहते हुए काव्या ने मुझे छतरी से बाहर ढकेल दिया।
"ओए मैं तो मजाक कर रहा था।"- ये कहकर मैं फिर जल्दी से छतरी के नीचे आ गया।
"अभी और मजाक किया तो सच में छतरी से बाहर निकाल दूंगी।"
"ओहो... वार्निंग।"
"तुम भीग तो नहीं रहे हो न ?"- काव्या ने छतरी मेरी ओर झुकाई और गंभीरता से पूछा।
"हम दोनों बराबर ही भीग रहे है। छतरी बीच में रखो।"
"मैंने सोचा कही तुम भीग ना जाओ। भीग के बीमार पड़ गए तो कहोगे काव्या ने बर्थडे के दिन मुझे बीमार कर दिया।"
"कुछ भी।"- मैंने हँसते हुए कहा।
"ज्यादा दूर नही है, बस आ गया।"
हम दोनों तकरीबन दस मिनट चले। यूँ तो वर्सोवा मेट्रो से 'अर्बन तडका' जाने मे सिर्फ पाँच ही मिनट लगते है लेकिन बारिश होने के कारण हमको कुछ वक्त ज्यादा लगा। 'अर्बन तडका' नॉर्थ इंडियन रेस्तरां हैं। रेस्तरां अंदर से जगमगा रहा था। अंदर लोगों की चहल-पहल थी। लोग अपने परिवार के साथ खाने का आनंद ले रहे थे। मैं वहाँ बच्चों का हँसना सुन पा रहा था। दीवार पर लगी टीवी में फुटबॉल मैच टेलिकास्ट हो रहा था। उस दिन इंडिया का किसी के साथ क्रिकेट मैच नहीं था वरना टीवी पर वही चलता। लेकिन फुटबॉल मैच को भी बहुत से लोग देख रहे थे।
काव्या और मैं किसी एक टेबल पर जाके बैठे गए। "कैसा है रेस्तरां ?"- काव्या ने पूछा।
"अच्छा है। Your Choice Is Good. मानना पड़ेगा।"- यह कहते हुए मैंने नज़रे चारों ओर घुमाई।
वेटर हमारे सामने आकर खड़ा हो गया। एक गोरा चिटा लड़का। जिसकी उम्र होगी करीब करीब पच्चीस। वेटर ने हम दोनों की तरफ देखा और एक नकली मुस्कुराहट के साथ मुस्कुराया। वेटर ने मुझे मेनू थमा दिया। जिस प्यार और मुस्कुराहट के साथ उसने मुझे मेनू दिया, मैंने भी उसी प्यार और मुस्कुराहट के साथ ठीक वैसे ही वो मेनू काव्या की ओर बढ़ा दिया।
"Your day. So choose your favourite food."- मैंने काव्या से कहा।
काव्या मेनू पर नज़र मार रही थी। तब तक मैंने टेबल पर रखी पानी की गिलास उठाई और सुखा हुआ गला ठंडा कर लिया।
"डिनर से पहले हम टोमेटो सूप पिए ?"- काव्या ने ऐसे कहा जैसे टोमेटो सूप उसी ने आज खोज निकाला हो।
मुझे बस हाँ ही करना था जो मैंने बहुत अच्छे से किया। काव्या ने वेटर को वो सब बता दिया जो हम आने वाले कुछ मिनटों मे खाने वाले थे। वेटर ने ऑर्डर अपने दिमाग मे लिख लिया और वहाँ से चला गया। "तुमको घर जाने के लिए लेट तो नही होगा न ?"- काव्या ने पूछा।
"हम दो तीन घंटे तक खाना ही खाने वाले है क्या ?"- मैंने व्यंग्यात्मक भाव से कहा।
"हर बात पर व्यंग करना कोई तुमसे सीखे।"
"कैसा गया आज का दिन ?"- मैंने पूछा।
"बहुत अच्छा। और अभी डिनर कर लेंगे तो और भी अच्छा हो जायेगा।"
काव्या हमारे टेबल के क़रीब बैठी एक फैमिली को देखने लगी। फैमिली ज्यादा बड़ी नहीं थी। पति पत्नी और दो छोटे बच्चें। एक लड़का और लड़की। उस फैमिली में जैसे ही कोई मजाकिया क्रिया होती तो काव्या भी हँसती। काव्या अपना दाहिना हाथ गाल पर रखे उनकी तरफ़ देख रही थी और मैं कभी काव्या तो कभी उस फैमिली को जो काव्या की मुस्कुराहट की वजह बनके बैठी थी।
"You miss your family kavya."- मैंने पूछा नहीं, बस वो कहा जो मैंने महसूस किया।
"Yaa."- उसने कहा।
"तुम कभी अपनी फैमिली से दूर रहे हो प्रिंस ?"
"नहीं। But I can related your situation. और मुझे लगता है वो बच्चें ज्यादा स्ट्रांग होते है जो अपनी फैमिली से दूर रहकर पढ़ाई या जॉब करते है। ये सच में मुश्किल होता है। अगर तुम फैमिली के साथ रहते हो तो काफी सारी बातें उसी वक्त साझा की जा सकती है। उदास हो तो घर का कोई न कोई सदस्य तुम्हारा फिर हौसला बढ़ा देता है। इवेन मेरे तो पापा मम्मी जब कुछ दिनों या महीनों के लिए चले जाते है तब घर सुना सुना हो जाता है और चार दीवारों के अंदर अकेला सा रह जाता हूँ।"- मैं कहता रहा और काव्या सुनती रही।
"मम्मी को बताया मैंने डिनर के बारे में।"
"क्या कहा फिर मम्मी ने ?"- मैंने पूछा।
"पूछ रही थी किसके साथ जा रही हो ?"
"क्या कहा फिर तुमने ?"
"तुम्हारे बारे में बताया।"
"क्या !"- मैंने आश्चर्यचकित होते हुए कहा।
"हाँ। मम्मी को मुझ पर भरोसा है। उनको भरोसा है कि मेरी बेटी ऐसे किसी को भी डिनर पर इनवाइट नहीं करेगी।"
( उस दिन का स्वादिष्ट भोजन )
मैं होठों पर एक छोटी सी मुस्कुराहट आई और मैं हल्की सी आँखें बंद कर मुस्कुराने लगा। टोमेटो सूप आ गया। हम तक़रीबन तीस या पैंतीस मिनट तक डिनर करते रहे। काव्या धीरे धीरे खा रही थी क्योंकि बीच बीच में वो बोल भी रही थी। दस बजे हमारा डिनर सम्पन्न हुआ। काव्या ने बिल पे किया। हम दोनों जगह छोड़ने ही वाले थे। लेकिन मुझे कुछ याद आया। मैंने काव्या को रुकाया और काउंटर की ओर बढ़ने लगा। वेटर जो मेरे करीब खड़ा था उसने मुझे कहा - "सर ऑर्डर कर दीजिए, मैं लेकर आ जाऊँगा।"
"भाई साहब आपने मुझे सर कहकर संबोधित किया, ये भी काफ़ी है।"- मैंने कहा जिसपर वेटर और काव्या की हँसी छूट गई।
"Okay Sir."- ये कहकर वो निकल गया।
मैं काउंटर पर गया। काव्या मुझे देख रही थी। आते वक्त मेरे हाथ में पेस्ट्री था। काव्या इशारे से कह रही थी इसका क्या जरूरत थी। मैंने पेस्ट्री उसकी ओर बढ़ाई, लेकिन बाद मैं याद आया मुझे उसको पेस्ट्री का पहला निवाला खिलाना चाहिए। मैंने चम्मच से पेस्ट्री का छोटा सा टुकड़ा काव्या की ओर बढ़ाया जिसे उसने स्वीकार किया।
"Once again, Happiest birthday dear Kavya."
"तुमको भी Once again thank you. And thank you कि तुम मेरे साथ डिनर पर आए प्रिंस।"
"It's my pleasure Kavya. चलो अभी चलते है। टाइम हो गया है। टाइम पर घर पहुंच जाना अच्छा है।"
बाहर बारिश थम चुकी थी। सड़क बारिश की वजह से और गाड़ियों की लाइट्स से चमक रहा था। मेट्रो में हर रोज मैं उसको बाय बोलता हूँ लेकिन आज उसने बाय कहा।
© रविंद्र मुंडेतिया
( 'मेट्रो... उन दिनों' की कहानी अभी जारी है...
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