मेट्रो... उन दिनों ( सेकंड लास्ट मुलाकात ) - 8

 



मेट्रो में दो लोग लड़ रहे थे। भीड़ में मेट्रो में चढ़ते वक्त दोनों आपस में टकरा गए थे इसलिए लड़कर मुद्दा सुलझा रहे थे। उन दोनों की तू तू मैं मैं हल्की फुल्की गाली गलौज तक पहुंच ही रही थी कि एक का स्टेशन आ गया। वो उतर गया। दूसरा बचा हुआ आदमी अपनी कहानी बता रहा था लेकिन वो वाला हिस्सा हटा के जिसमें वो विलेन था। 

खैर ये तो मेट्रो में अक्सर होता रहता है। कभी कोई सीट के लिए लड़ जाता है, कभी कोई धक्का लगने पर लड़ जाता है, कभी कोई स्वस्थ व्यक्ति भी दिव्यांग सीट के लिए लड़ जाता है। ये सब रोज की कहानी है। लेकिन मंजे हुए लोग वे है जो दूसरों को भी जगह दे देते है और खुद इतनी भीड़ में भी खड़े हो जाते है वो भी बिना किसी से झगड़ा किए। 

मैं हर रोज की तरह मेट्रो में खड़ा था। एक हाथ मेट्रो का ग्रेब हैंडल पकड़ा हुआ था और दूसरा जेब में। कान में एयरबड्स लगे हुए थे। मेट्रो में लोग क्या बातें कर रहे थे ये मुझे नहीं पता और न सिर्फ मुझे बल्कि उन तमाम लोगों को नहीं पता जो मेरी ही तरह काम में एयरबड्स ठुसे हुए थे। 

काव्या ने आते ही मेरे कान से एयरबड्स निकाले और मेरे हाथ में थमा दिए।

"Very good morning."- मेरे गुड मॉर्निंग का उसने जवाब दिया। 

"परसो लेट तो नहीं हुआ न तुमको ?"- उसने बर्थडे वाली शाम का पूछा।

"नहीं, टाइम पे पहुँच गया था।"- मैंने कहा।

"मैं भी टाइम पे पहुँच गई थी।"- काव्या ने कहा। 

"प्रिंस।"

"ह्म्म।"

"मैं एक चीज़ को लेकर थोड़ी कन्फ्यूजन में हूँ।"- काव्या ने कहा।

"हाँ तो बताओ। मैं कन्फ्यूजन दूर कर देता हूँ।"

"पक्का ?"- काव्या ने आँखें बड़ी करते हुए कहा।

"हाँ जरूर।"

"एक्चुली मैंने कुछ दिनों पहले एक न्यूज चैनल में वीडियो एडिटर के लिए अप्लाई किया था।"

"हाँ उनका जवाब आया क्या ?"- मैंने पूछा।

"हाँ।"

"तुम्हारी करेंट सैलरी से ज्यादा दे रहे है ?"- मैंने पूछा।

"हाँ।"

"तो फिर तुमको जाना चाहिए।"

"हाँ मैं भी यही सोच रही हूँ। लेकिन..."

"लेकिन क्या ?"- मैंने कहा।

"फिर मुझे इस जॉब के लिए मुंबई छोड़ना पड़ेगा।"- काव्या हाथ में पहनी घड़ी के कांच पर उंगली घुमा रही थी और उसने धीरे से कहा।

"मतलब। मैं कुछ समझा नहीं।"

"मतलब इसके लिए मुझे दूसरे स्टेट में जाना पड़ेगा।"- काव्या ने कहा।

"कौनसे ?"

"लखनऊ।"- काव्या ने कहा और मेरी ओर देखने लगी।

काव्या की इस बात पर पहले तो मैं थोड़ा मुस्कुराया और बाद में कहा - तुमको नहीं लगता तुम थोड़ी पागल हो गई हो ?"

"अभी एक मुक्का मारूंगी।"- काव्या ने मुक्का दिखाते हुए कहा।

"तुम बात ही ऐसी कर रही हो।"

"एक्चुअली, मुझे मुंबई छोड़ने का मन नहीं कर रहा है।"

"I Understand, But लखनऊ को कैसे मना कर सकती हो। खुद का शहर है। तुम्हारा घर है वहाँ पर।"

"मुंबई में मेरे दोस्त है इसीलिए।"- काव्या ने कहा और मैं उसे देखने लगा।

"दोस्त! Seriously !"- मैंने फिर चौंकते हुए कहा।

"हाँ, मतलब न सिर्फ दोस्त। ये शहर भी।

"अब तुम्हारे कितने दोस्त है ज़रा मुझे बताओ ?"

"है एक मेरी दोस्त।"

"सिर्फ एक दोस्त है। उसको कभी मिलने लखनऊ बुला लेना।"

"एक और है दोस्त।"- काव्या ने मेरी ओर देखते हुए कहा।

"हाँ तो उसको भी बुला लेना कभी लखनऊ।"

"तुम पूछोगे नहीं कौन है दूसरा दोस्त ?"- काव्या ने कहा।

"कौन है ?"- मैंने फटाक से पूछा।

उसने कुछ नहीं कहा। वो अपने शर्ट के तीसरे बटन को देखने लगी। 

"तुम हो यार।"- काव्या ने कुछ देर बाद कहा पर वो मेरी ओर नहीं देखी।

हम पिछले दो महीने से मेट्रो में मिल रहे थे। जिस दिन हमारा मिलना लिखा रहता था हम दोनों सेम मेट्रो पकड़ लेते थे। पिछले दो महीनों में हमने एक दूसरे को अच्छे से जाना। काव्या की फैमिली के बारे में मुझे सबकुछ पता चल गया था और मेरी फैमिली के बारे में काव्या को। हमने अपने काम को लेकर, जीवन को लेकर, एक दूसरे को खूब सजेशन दिए। कभी किसी दिन अगर मैं उदास रहता तो काव्या उस उदासी का रीजन जरूर पूछ लेती थी। मैं भी उसकी उदासी का कारण पूछ लिया करता था। 

"क्या सोच रहे हो प्रिंस ?"- काव्या ने कहा।

"कुछ नहीं।"- मैंने झूठ कहा।

"झूठ बोल रहे हो तुम।"- काव्या मुस्कुराई।

"तुमको कैसे पता ?"

"पता चल जाता है।"- काव्या ने कहा।

हम दोनों के बीच लगभग दो मिनिट तक बातचीत नहीं हुई। मैं ग्रेब हैंडल में हाथ डाले घुमा रहा था। काव्या दूसरी ओर देखे जा रही थी। 

"एक्चुअली मुझे पता ही नहीं चला कि हमने एक दूसरे के बारे में सबकुछ जान लिया है और यही कारण है कि हम दोस्त बन गए। ना तुमने कभी "दोस्ती करोगे ?" कहकर हाथ बढ़ाया और ना ही मैंने।"- मैंने कहा।

"ज़रूरी नहीं कि "दोस्ती करोगे ?" कहकर हाथ मिलाएंगे तभी दोस्त बनते है।"- काव्या ने धीरे से कहा। 

हम दोनों सीट पर बैठ गए थे। कुछ देर शांत बैठे रहे। सब कुछ गुज़र रहा था। मेट्रो सबको पीछे छोड़ रही थी। आँखों के सामने से दृश्य छूटते जा रहे थे। 

"आज कुछ हैपनिंग नहीं है ?"- काव्या ने समाचार के बारे में पूछा।

"है ना।"- मैं होठों पर तिरछी हँसी छोड़ते हुए कहा।

"क्या है ?"- काव्या ने पूछा।

"आज की सबसे बड़ी हेडलाइन। 'क्या काव्या लखनऊ जाएगी ?'"- मैंने कहा।

"तुम सच में न्यूज चैनल वाले ही हो। बैठे बैठे हेडलाइन बना लेते हो।"- काव्या ने हँसते हुए कहा।

"इतने महीने काम किया चैनल में। कम से कम कुछ तो फायदा होना चाहिए।"- मैंने कहा।

"लो, अंधेरी भी आ गया आज तो।"

"इतना जल्दी!"- मैंने कहा।

"हाँ, वो क्या है न आज हम शांत बैठे रहे।"

"ओ.... रियली।"

"हाँ, तुमको क्या लगा ?"

"कुछ नहीं।"- मैंने कहा।

"क्या सोच रहे थे बताओ।"- वो मुस्कुराई और साथ में उंगली भी दिखाई।

"उंगली दिखा के मुझे डरा रही हो ?"

"हाँ।"

"उंगली से डर नहीं लगता काव्या। डर लगता है तुम्हारी इन नशीली आँखों से।"- मैंने किसी मूवी का कोई घिसा पीटा सा डायलॉग बोला। 

"ओहो.... तो तुमको मेरी आँखें नशीली लगती है, रवि बाबू ?"- काव्या में भी एक्टिंग का कीड़ा था। उसने भी अपनी एक्टिंग दिखाई। 

"रवि बाबू!" - मैंने मुँह थोड़ा बिगाड़ते हुए कहा।

"हाँ! अच्छा है ना नाम।"- काव्या उत्साहित होकर बोली।

"तुमको अच्छा लगा ?"- मैंने पूछा।

"हाँ।"- काव्या ने कहा।

"फिर तो ठीक है।"- मैंने कहा।

"ओहो... मुझे नाम अच्छा लगा तो तुमने भी एक्सेप्ट कर लिया। वाह।"- उसने कहा और मैं मुस्कुराया।

मैं उसकी आँखों में देखने लगा। 'आज़ाद नगर' स्टेशन आने वाला था। मेट्रो धीरे हो चुकी थी। 

"देख तो तुम ऐसे रहे हो जैसे इन नशीली आँखों में बस गोता लगाने वाले हो।"- काव्या ने चुटकी बजाई और कहा।

"काश मैं तैरना जानता काव्या।"- मैंने कहा। 

"क्यों ?"- उसने गंभीरता से पूछा जबकि में हास्य के मूड में ही था।

"फिर तुम्हारी आँखों में गोते अच्छे से लगा पाता न।"- मैंने कहा। 

"ओह... फ्लर्ट कर रहे हो।"- काव्या ने कहा।

"जिसकी इतनी अच्छी फ्रेंड हो। फिर फ्लर्ट करना तो बनता ही है।"

"फ्लटू कई के।"

"फ्लटू ही सही।"- मैंने कहा।

"आने वाला है तुम्हारा स्टेशन।"- काव्या ने टिमटिमाती लाइट को देखते हुए कहा।

हम दोनों दरवाज़े के क़रीब खड़े हो गए। मेरे मन में सवाल चल रहा था कि क्या काव्या से पूछना चाहिए कि तुम लखनऊ जा रही हो या नहीं ? वो आगे से तो लखनऊ जाने के बारे में कुछ नहीं बोल रही थी। जैसे ही मैंने उससे पूछने के लिए उसका नाम पुकारा, ठीक उसी वक्त उसने भी मेरा नाम पुकारा। दोनों ने एक साथ एक दूसरे का नाम लिया। 

"हाँ बोलो।"- मैंने कहा।

"तुम बोलो।"- काव्या ने कहा।

"लेडीज फर्स्ट।"- मैंने भारतीय पुरुषों का सबसे मजबूत डायलॉग बोल दिया जिसे कोई औरत या लड़की टाल नहीं सकती।

"ओफो... पता नहीं ये कौन था जो लेडीज फर्स्ट बोल के चला गया।"- काव्या ने कहा और मैं हँसने लगा। 

"बोलो अब। स्टेशन आने वाला है।"

"प्रिंस, आखिरी बार मिलोगे ? वर्सोवा बीच।"- काव्या ने कहा।

मुझे सबसे भारी लगा 'आखिरी' शब्द। इसका मतलब काव्या लखनऊ जाएगी जो कि उसके लिए सच में ठीक डिसीजन है। मैंने आज जल्दी हाँ बोल दिया।


© रविंद्र मुंडेतिया


( 'मेट्रो... उन दिनों' की कहानी अभी जारी है...


चैप्टर 9 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - क्या होती है ट्रैन स्टेशन थ्योरी ? 


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