मेट्रो... उन दिनों ( 'ट्रेन - स्टेशन थ्योरी' ) - 9
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड देके छोड़ना अच्छा है।
वर्सोवा बीच बहुत शांत था। बहुत कम लोग थे आज तट पर। शाम का वक्त था। मेरे हाथ में बैग था। मैं ऑफिस से सीधा यहाँ आ गया था। आज लेट नहीं होना चाहता था क्योंकि ये मेरी काव्या के साथ अंतिम मुलाक़ात थी। पिछली बार उसके बर्थडे के दिन मैं लेट हो गया था। मैं कुछ देर इस विशाल से समुद्र को देखता रहा। ये एक अच्छी बात थी कि आज आसमान में बादल नहीं थे। तट से कुछ दूर स्थानीय बच्चें क्रिकेट खेल रहे थे। मैं जहाँ खड़ा था उसी जगह बैठ गया। मैंने अपना बैग साइड में रख दिया और काव्या का इंतज़ार करने लगा।
काव्या ने छः बजे का टाइम दिया था। मैं उससे पहले आ गया। लेकिन अब तो छः बज गए थे। वो अभी तक नहीं आई थी। मैं रह - रहकर पीछे देख लेता था इस उम्मीद में कि इस बार पीछे मुड़ने पर वो दिख जाए। मैं वक्त गुजारने के लिए तट की रेत को मुट्ठी में भरके उसे हवा में उड़ा रहा था। मुट्ठी से निकली रेत दक्षिण दिशा की ओर उड़ी जा रही थी। वजन में भारी कण उसी जगह गिर रहे थे। जो बारीक कण थे वो उड़ जा रहे थे। ये प्रक्रिया मैं कुछ मिनटों तक करता रहा। जब इससे थक गया तो रेत पर नाम लिखने लगा। कभी मेरा नाम लिखता, कभी मेरे दोस्तों का नाम लिखता, कभी कोई अचानक दिमाग में आई हुई आकृति बना रहा था। दूर एक नाव पड़ी थी। मैंने उस नाव को भी बनाने की कोशिश की। करीब पचास मीटर दूर एक आदमी चाय बेच रहा था। वो एक जगह खड़ा था और हाथ में जो पैसे थे उनको गिन रहा था। 'शायद उसने आज का काम कर लिया' मैं सोच रहा था। उसने बड़ी सी चाय की केतली उठाई और मेरी तरफ आने लगा।
मैं उसे लगातार देखे जा रहा था लिहाज़ा यही कारण था कि मेरे करीब आकर उसने अपनी चलने की गति कम कर दी। शायद उसे लगा हो कि मैं चाय पिऊंगा। आखिर में उसने आगे से पूछ ही लिया।
"चाय ?"
मैं सोचकर कुछ बोलने ही वाला था कि उसने फिर कहा - "बस एक ही कप बची है। दे दूँ ?"
"ठीक है दे दो।"- मैंने कहा।
मैं सोच रहा था कि काव्या आएगी तो उसके साथ पिऊंगा लेकिन 'शायद वो लेट हो जाएगी' यह सोचकर मैंने चाय के लिए हाँ कर दी।
"चाय पिलो। तुम थके हुए लग रहे हो।"- चायवाले के चेहरे पर मुस्कुराहट थी।
चायवाले को अपनी चाय बेचनी थी इसलिए उसने मुझे थका हुआ बोल दिया। खैर बेचने का भाव उसके चेहरे पर भी झलक रहा था।
"आज की ये अंतिम चाय है ?"- मैंने पूछा।
"अभी कहाँ ? अभी तो एक राउंड और घूमना है।"- चायवाले ने पूरे वर्सोवा तट पर नज़र मारते हुए कहा।
"मतलब एक बार फिर इस बड़ी सी केतली को भरकर लाओगे और बेचोगे ?"- मैंने कप अपने हाथों में थामते हुए कहा।
"हाँ।"- चायवाले ने कहा।
मैंने दस रुपए उसे थमा दिए। उसने मुझे दस रुपए में दस रुपए में मिलने वाली चाय से ज्यादा चाय दी क्योंकि उसे अपनी केतली पूरी खाली करनी थी। मुझे चाय से भरा हुआ कप मिल गया। मैंने पहला गुट लिया। चाय अच्छी थी। चायवाला चला गया। लगभग आधा कप खत्म हुआ तभी काव्या की पीछे से आवाज आई।
"थोड़ा सा लेट क्या हो गई, तुम तो अकेले - अकेले चाय पीने लगे।"- काव्या ने टी - शर्ट और ब्लैक पेंट पहना था।
"ओ... तुम आ गई। मैंने सोचा तुम लेट हो जाओगी इसलिए चाय ले लिया यार।"- मैंने इतने दिनों में पहली बार उसे यार कहा।
"वाह! आज तुमने मुझे 'यार' कहा।"- काव्या आई और पास में बैठ गई। आज दूरी बस कुछ सेंटीमीटर में थी।
"तुमने नोटिस किया। अमेजिंग।"- मैंने कहा।
"क्यों ? ऑब्जर्वेशन या नोटिस करना, ये सब पत्रकार और लेखक ही कर सकते है क्या ?"
"नहीं तो।"
"चाय कैसी है ?"- काव्या ने कहा।
"बहुत अच्छी है। वो अभी फिर आयेगा तो लेते है चाय।"- मैंने कहा।
"तुम्हारे कप में बची है अभी आधी चाय।"- काव्या ने कप पर नज़र टिकाते हुए कहा।
"You want to try ?"- मैंने कप उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा।
"Yes."
"लेकिन काव्या मैंने आज ब्रश नहीं किया है।"- मैंने व्यंग्य किया।
काव्या मुझे गर्दन टेढ़ी कर देखने लगी। मैं हँसने लगा। काव्या ने मेरे हाथ से कप ले लिया। उसने चाय की पहली घुट ली।
"कैसी लगी चाय ?"- मैंने पूछा।
"अच्छी है। इतनी अच्छी है कि बिना ब्रश किए हुए लड़के की झूठी चाय होकर भी अच्छी लग रही है।"
"अच्छी तो लगेगी ही। क्योंकि मेरा थोड़ा सा प्रेम जो इसमें मिला है।"- मैंने कहा।
"तुम्हारा कौन सा प्रेम ?"
"दोस्ती का प्रेम। You agree or not ?"- मैंने उसकी ओर देखते हुए कहा।
"Agree हूँ, तभी तो चाय पी रही हूँ।"- उसने चाय का आखिरी घुट लिया और कहा।
चाय पीने के बाद काव्या ने कप को फोल्ड किया और बैग में जहाँ बोतल रखते है वहाँ कप को डाल दिया।
"पता है लास्ट बार कब आई यहाँ ?"- काव्या ने कहा।
"कब ?"- मैंने कहा।
"जब पापा मुंबई आए थे। उस दिन पापा के साथ पूरा वर्सोवा बीच घुमा था।"- काव्य ने कहा।
काव्या कहकर वर्सोवा बीच को देखने लगी। शायद वो अपने पापा के साथ वर्सोवा पर बिताए पल को याद कर रही थी। उसके दिमाग में एक छवि बन रही होगी, जब वो पापा के साथ इस तट पर चल रही होगी।
"लखनऊ कब जा रही हो ?"- मैंने पूछा जिसके बाद शायद वो अपने पापा के ख्याल से बाहर निकली।
"कल शाम की फ्लाइट है।"
"कितने बजे की है फ्लाइट ?"
"तुम एयरपोर्ट छोड़ने आ रहे हो ?"- काव्या ने मुस्कुराते हुए कहा।
"बस ऐसे ही पूछ रहा हूँ। कम से कम पता तो रहना ही चाहिए।"
"शाम 5 बजे।"
"ओके, हैप्पी जर्नी।"- मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
"थैंक्यू। वैसे तुमने मुझे लखनऊ जाने का सही कहा था। मेरे लिए लखनऊ ही सही है। अगर वहाँ, यहाँ से अच्छा पैकेज मिल रहा है तो इससे बेस्ट और क्या ही हो सकता है।"
"फाइनली!"- मैंने एक गहरी सांस छोड़ी और हँसने लगा।
"पर लखनऊ में कुछ दिनों तक अजीब लगेगा। I know कि वो मेरा बर्थ प्लेस है लेकिन...।"- काव्या बोलते हुए रुक गई।
"लेकिन क्या ?"
"लेकिन मुंबई की आदत नहीं जाएगी जल्दी। यहाँ की हवा, यहाँ के लोग, यहाँ की बारिश, यहाँ का समंदर, यहाँ के त्यौहार, रात में जगमगाती मुंबई, मेट्रो की अनाउंसमेंट, मेट्रो के लोग, और...।"- काव्या ने डूबते हुए सूरत को निहारा।
"और क्या ?"
"और तुम।"
काव्या ने मेट्रो की मुलाकातों को याद करते हुए किसी छोटे बच्चें की तरह कहा - "मेट्रो की यादें अच्छी है न ?"
"Yaa Offcourse. No doubt yaar."
"मैं तुम्हारे करीब बैठकर क़िताब पढ़ रही थी। तुम्हारी नज़र क़िताब पर पड़ी। तुमने बात शुरू की और देखो आज हम यहाँ बैठे है।"- काव्या ने बाहें फैलाते हुए कहा।
"प्रिंस। तुमको लिखने का शौक है न ?"
"ये कोई पूछने की बात है।"
"Oo sorry sorry. मैं तो भूल ही गई। मैं तो एक लेखक के सामने बैठी हूँ।"
"कितना एक्टिंग करती हो यार तुम।"
"आज आज और देख लो मेरी एक्टिंग। बाद का भरोसा नहीं।"- काव्या ने अपने कंधे से मेरे कंधे पर टल्ला मार दिया जिससे मैं एक तरफ़ झुक गया।
"क्यों न तुम, मेरी और तुम्हारी मेट्रो की मुलाकातों को लिखो ?"- उसके चेहरे पर खुशी थी और आँखें बड़ी करके उसने कहा।
"आइडिया अच्छा है। वैसे भी मैंने पिछले कुछ महीनों से ब्लॉग नहीं लिखा है।"
"I think, तुमको जरूर लिखना चाहिए।"- उसने कहा लेकिन मैं समंदर को देख रहा था।
"लिखोगे न ?"- उसने कहा
"हाँ, जरूर।"
"जब कभी वक्त मिलेगा लिखते रहना। पर मेरा नाम बदल देना।"
"हाँ। तुम्हारा जो नाम है उसी का कोई समानार्थी नाम ले लूंगा।"
"हाँ ये भी ठीक है।"
"वैसे तुमको तुम्हारे नाम का मतलब पता है ?"- मैंने पूछा।
"काव्या का अर्थ क्या हो सकता है ?"
"Kavya means Poetry."- मैंने कहा।
"Ooo really, मुझे मेरे नाम का अर्थ आज पता चला।"
"कभी कोई कविता पढ़ी या सुनी है ?"- मैंने पूछा।
"बहुत कम। शौक नहीं है। तुम तो पढ़ते रहते होंगे कविता ?"
"हाँ।"
"तो फिर सुनाओ कोई कविता। इतने दिनों में तुमने कभी कोई कविता नहीं सुनाई।"
"मुझे अशोक वाजपाई की एक कविता याद है। और शायद वो इस पल के लिए सबसे अच्छी कविता है।"
"तो फिर सुनाओ।"- काव्या ने कहा।
"कविता का नाम है 'तुम चले जाओगे।'
"तुम चले जाओगे
पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सोंधी-सी गंध
भोर के उजास में
थोड़ा-सा चंद्रमा
खंडहर हो रहे मंदिर में
अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार।
तुम चले जाओगे
पर थोड़ी-सी हँसी
आँखों की थोड़ी-सी चमक
हाथ की बनी थोड़ी-सी कॉफी
यहीं रह जाएँगे
प्रेम के इस सुनसान में।
तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति,
छंद की तरह गूँजता
तुम्हारे पास होने का अहसास।
तुम चले जाओगे
और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे।"
"बहुत सुंदर कविता है यार। इंसान जाता है लेकिन वो अपना कुछ न कुछ छोड़ के चला जाता है। और उन सभी चीजों में सबसे बड़ी कोई चीज़ है तो वो है यादें। ढेर सारी यादें और बातें। क्यों सही कहा न ?"- काव्या ने कविता सुनने के बाद कहा।
"Right yaar."
"चलो थोड़ा बीच पर घूमते है। तुमको जल्दी घर तो नहीं जाना है न ?"- काव्या ने मुझे उठाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया।
"नहीं तो और वैसे भी आज की ये शाम तुम्हारे नाम है।"- मैंने कहा।
"Oooho....."
"वो देखो, आसमान और बादल। कितना खूबसूरत नज़ारा है।"- काव्या ने आसमान को निहारते हुए कहा।
"फोटो ले लेता हूँ। ब्लॉग लिखूंगा तो काम आएगी।"
"और मेरी फोटो कौन लेगा ?"- उसने प्यारी सी शिकायत मुझसे की।
"और कौन लेगा ? मैं ही लूंगा न।"- ये कहते हुए मैंने उसकी एक कैंडिड फोटो ले ली।
हम दोनों चलने लगे। तट पर घोड़ा गाड़ी दौड़ रही थी। ठंडी हवा चल रही थी। मैं अपने दोनों हाथ पेंट की जेब में डालकर चल रहा था। बैग दाएं कंधे पर झूल रहा था। काव्या को अपने पैर गीले करने थे सो वो पानी की तरफ़ चली गई। मैं दूर ही खड़ा था क्योंकि मैंने जूते पहने थे। उसने मुझे बुलाया लेकिन मैंने मना कर दिया।
"अरे आ जाओ। जूते उतारकर हाथ में रख लो।"
"जरूरी है क्या ?"
"हाँ जरूरी है। अब आ जाओ।"
मैंने जूते उतारकर हाथ में रख लिये। मैंने पानी में पैर रखे ही थे कि काव्या ने मेरे ऊपर पानी उछाल दिया।
"यार मेरा चश्मा गीला हो जाएगा।"- मैंने अपने चश्मे के आगे हाथ लाते हुए कहा।
"वो तुम्हारी प्रॉब्लम है प्रिंस। मुझे तो पानी दिख रहा है और तुम।"- काव्या ने कहकर फिर पानी उछाल दिया।
"अरे..... अब देखो तुम"- मैंने कहा और उसपर पानी उछालने लगा।
जब वो अच्छी खासी गीली हो गई तब मैं रुका। वो अब पानी से बाहर आ गई थी। उसके बाल गिले हो चुके थे और मेरे भी।
"तुमने मुझे कुछ ज्यादा गीला कर दिया।"- काव्या ने अपने तन को देखते हुए कहा।
"शुरू किसने किया ?"- मैंने हँसते हुए कहा।
"लेकिन मैंने तुमको इतना गीला नहीं किया।"
"वो मेरी प्रॉब्लम नहीं है।"- मैंने कहा और उसने मुझे तिरछी नज़र से देखा।
"थोड़ा सा चलते है यार, अभी सुख जाएंगे कपड़े। चलो। तुम्हारा बैग मुझे दे दो।"- मैंने कहा।
"रहने दो यार।"
"अरे दे दो यार, जल्दी सुख जाओगी।"
"ओहो... कितने अच्छे दोस्त हो तुम।"- काव्या ने थोड़ा अभिनय का तड़का दिया।
"लास्ट मीटिंग है काव्या। उसके बाद तुम कहाँ और मैं कहाँ ? किसे पता ?"
"हम लाइफ में व्यस्थ हो जाएंगे।"- काव्या ने कहा।
"हाँ और शायद एक वक्त के बाद एक दूसरे को भूल भी जाएंगे।"- मैंने कहा।
"तुमने कितनी आसानी से बोल दिया। खैर ये सच भी तो है। लेकिन मुझे ताज्जुब हुआ कि इतनी अच्छी शाम और एक उभरती हुई दोस्ती के बावजूद तुमने एक - दूसरे को भूलने वाली बात कही।"
"ये सच है इसीलिए कहा मैंने। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि ये दोस्ती अच्छी नहीं है या ये दोस्ती चल नहीं सकती, लेकिन ये सच है कि हम एक दूसरे को भूल जाएंगे। मेरा अनुभव है अभी तक, जो लोग दूर चले जाते है वो अक्सर हमारी लाइफ के महत्वपूर्ण इंसानों की लिस्ट से बाहर हो ही जाते है। अब इसमें ना हमारी गलती होती है और ना ही सामने वाले की।
"हाँ ये सच है क्योंकि फिर हमारा उनसे डेली बेसिस पे काम नहीं रहता है। दूर होने के कारण वो अपनी लाइफ में बिजी होता है और हम अपनी लाइफ में।"- काव्या ने कहा।
काव्या ने आगे कहा - "लेकिन, मुझे तुम्हारी दोस्ती अच्छी लगी। हाँ ये सच है कि एक वक्त के बाद भूल जाएंगे लेकिन एक खूबसूरत मोड पर आकर हम दूर हो रहे है। पता नहीं क्यों ? पर अच्छा लग रहा है। ये जानते हुए भी कि आज अंतिम शाम है तुम्हारे साथ। शायद हमारी वाइब मैच कर गई।"
"Exactly यार। तभी तो। दोस्ती में कुछ मैच हो या ना हो लेकिन वाइब जरूर मैच होनी चाहिए। और तुमने कहा न खूबसूरत मोड इससे मुझे एक बहुत अच्छा शेर याद आ गया है। अगर आपकी इजाज़त है तो सुनाऊं ?"
"इजाज़त है सुनाओ।"
मैंने कहा - "वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड देके छोड़ना अच्छा है।"
ये शेर सुनने के बाद काव्या का चेहरा खिल उठा था। शाम इतनी गहरी हो चुकी थी कि बीच पर लगी लाइट्स चालू हो गई थी। हम दोनों वर्सोवा बीच का पूरा चक्कर काट के फिर लौट रहे थे।
"तुमको 'ट्रेन स्टेशन' थ्योरी पता है ?"- मैंने पूछा।
"नहीं तो। और वैसे भी ये सब थ्योरी मुझे कभी नहीं समझी।"
"लेकिन 'ट्रेन स्टेशन' वाली थ्योरी शायद बहुत जल्दी समझ जाओ।"- मैंने कहा।
"अच्छा। ऐसी कौन सी थ्योरी है भला ?"- काव्या ने कहा।
"सो कहते हैं कि हमारी ज़िंदगी एक 'ट्रेन - स्टेशन' की तरह होती है। लोग आते है और जाते हैं। कुछ पलभर के लिए, तो कुछ लंबे समय तक हमारे साथ सफ़र करते हैं। कुछ लोग बिना अलविदा कहे ही आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन ख़ास बात ये है कि हर व्यक्ति हमें कुछ न कुछ सीख जरूर देकर जाता है। असली समझ यही है कि कब किस का हाथ थामे रखना है और कब किसी को अगली ट्रेन के लिए जाने देना है, क्योंकि हर इंसान अपनी-अपनी मंज़िल लेकर आता है और शायद यही ज़िंदगी का असली सच है।"
काव्या ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके चेहरे पर स्माइल थी। हमारे कदम पीछे छूटते जा रहे थे।
"सच में, जिंदगी में बस एक यही थ्योरी बड़े कम समय में याद भी हो गई और समझ भी गई।"- काव्या ने कहा।
"मैं भी इस थ्योरी को आज अच्छे से रिलेट कर पा रहा हूँ काव्या।"
"देखते ही देखते वर्सोवा बीच भी खत्म हो गया। अब तो मेट्रो की ओर चलना ही पड़ेगा यार।"- काव्या ने कहा।
"हाँ।"- मैंने आखिरी बार हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया।
"अभी 'मरोल नाका' तक साथ में हूँ मैं। अपना हाथ अपने पास रखो। 'मरोल नाका' में हाथ मिलाएंगे।"- काव्या ने कहा।
"ओके, जैसा आप कहे।"
"वैसे हम एक - दूसरे को पहला और आखिरी बार वाला हग कर सकते है ?"- काव्या की टोन में प्रश्न और बताने वाला भाव दोनों थे इसीलिए मैं समझा नहीं।
"पूछ रही हो या बता रही हो ?"
"कितने भोले हो यार तुम! अच्छा आओ गले मिलते है।"- काव्या ने कहकर अपने दोनों हाथ फैला दिए।
हम दोनों ने एक दूसरे को गले लगा लिया। पल भर का वो गले मिलना एक अहसास था अच्छी दोस्ती का। कल फिर कभी मिलेंगे या नहीं ये हम दोनों को पता नहीं था।
"All the best Prince for your life. जिंदगी में खूब अच्छा करो और लोगों का दिल जीतते रहो।"- काव्या ने कहा लेकिन हम अभी भी गले मिले हुए थे।
"थैंक्यू काव्या। और तुमको भी बेस्ट ऑफ लक।"- मैंने कहा।
"सो चले अभी!"- काव्या के चेहरे पर ताज़ी मुस्कुराहट दिखी।
"चलो चलते है!"- मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और वर्सोवा बीच से निकल गए।
"लखनऊ जाने के बाद मैं तुमको ईमेल करूंगी और वहाँ के कुछ फ़ोटोज भी भेजूंगी।"
"तुम्हारे ईमेल का इंतज़ार रहेगा।"- मैंने कहा।
हम वर्सोवा से निकल गए और 'वर्सोवा' मेट्रो स्टेशन पर आ गए। मेट्रो में बहुत कम लोग थे। जैसे जैसे स्टेशन निकल रहे थे 'मरोल नाका' स्टेशन नज़दीक आ रहा था और फिर एक वक्त आया जब 'मरोल नाका' स्टेशन आ ही गया। हम दोनों दरवाज़े के क़रीब ही खड़े थे। दरवाजा खुला और मैंने काव्या को आखिरी वाला बाय बोल दिया। दोनों के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई। मेट्रो के दरवाज़े बंद हुए और मेट्रो स्टेशन से निकल गई। मैं अब जाकर किसी खाली सीट पर बैठ गया।
© रविंद्र मुंडेतिया
( 'मेट्रो... उन दिनों' की कहानी अभी जारी है...
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