मेट्रो... उन दिनों ( काव्या का ईमेल ) - 10

 



लोग आते है और चले जाते है। कुछ ही दिनों का सही लेकिन कभी कभी एक इंसान आपको बहुत कुछ सिखा के चला जाता है। हम सभी का एक दूसरे से मिलना हमारे हाथ में नहीं होता है। 'हम मिलते है' बस यही सच्चाई है। किसी नए व्यक्ति से अचानक मुलाकात होना तो सामान्य सी बात है लेकिन उसकी और हमारी वाइब मैच होना कुछ अलग ही बात होती है।

ऑफिस के काम के चलते मैंने अपना ईमेल खोल रखा था। केबिन में कोई नहीं था। ऑफिस में कुछ ही लोग बचे थे बाकी घर चले गए थे। शाम हो चुकी थी। मेरी नज़र एक मेल पर पड़ी जिसमें शुरुआती नाम काव्या लिखा हुआ था। ये ईमेल कल आया था। मुझे याद आया कि काव्या ने ईमेल लिखने का कहा था। उसने कहा था कि वो लखनऊ जाने के बाद ईमेल करेगी और कल उसने ईमेल कर दिया। 

मैंने ईमेल खोला। व्हाट्सअप लैंग्वेज में एक लंबा सा ईमेल काव्या ने लिखा था साथ ही उसने लखनऊ की तमाम तस्वीरें भी भेजी थी। मैंने ईमेल पढ़ना शुरू किया -

Kaise ho Prince ? Umeed hai tumhari sehat acchi hogi aur tum aise hi muskura rahe honge jaise maine hamesha tumko dekha hai. Wo hasi aur tumhara mazakia andaaz abhi bhi yaad aata hai yaar. Na jaane kaise tum har baat ko achanak masti aur vyangya mein badal dete ho. Waise dekha jaye to ye aadat sabhi logon mein honi chahiye. Main bhi seekh rahi hoon is aadat ko. Yun to bahut si aadatein hai tumhari jo mujhe seekhni hai lekin shuruaat isi aadat se kar rahi hoon.

Mujhe nahi pata main is email mein kya likhungi. Ye pehli baar hai jab main kisi ke liye likh rahi hoon. Itni shiddat se to bas pariksha mein likha tha. Aaj likhne mein maza aa raha hai. Dimaag mein metro un dino ki jo bhi baatein yaad aa rahi hai bas likh rahi hoon. Metro se yaad aaya Prince. Main ab Lucknow ki metro mein safar karke office jaati hoon.

Yaha ka mausam saaf hai. Main bhi bilkul swasth hoon. Aaj main office nahi gayi. Jis din Lucknow pahunchi, agle din se hi office jaana shuru kar diya. Yaad hai tumne ek din kaha tha - "Jab kabhi bore ho jao to apna pasandida kaam karo." Maine aaj week off liya aur Lucknow ki galiyon mein ghoomne lagi. Lucknow ab aur bhi khoobsurat lagne laga hai Prince. Maine na jaane aaj kitni tasveerein click ki. Gallery bhar chuki hai. Is email mein photos bhi bhej rahi hoon. Lucknow ki har chhoti badi jagah ghumi aaj. Mumbai ki tulna mein ye shehar mujhe dheema laga. Lekin jeevan dheema hoke bhi shanti bhara ho sakta hai ye bhi samjha mujhe. Shayad Mumbai mein reh - rehkar yehi vichar ban gaya hai ki jeevan tezi se chalne wala hona chahiye jabki aisa kuch bhi nahi hai. Main koshish kar rahi hoon Lucknow ki hawa mein dhalne ki aur dekhna kuch hi dino mein ye karnaama ho jayega.

Mumbai mein tumse milkar accha laga Prince. Ek aisa ladka jo sunta hai aur bade hi dhyaan se sunta hai. Ek aisa ladka jo kitna bhi late kyu na ho lekin bus, train ya metro ke peeche nahi bhagta hai. Tumhari ye aadat dikhati hai ki tum bahut shaant ho. Jaha Mumbai aur chhote shahron mein log in sabhi ke peeche bhagne lagte hai, tum iske vipreet ho. Tumhara ye vipreet hona accha laga.

Aur kya likhun Prince ? Soch rahi hoon. Waise to bahut kuch hai likhne ko magar main likhne mein kamzor hoon. Versova ki shaam ka to kya hi kehna ? Wo shaam bhala kaise bhooli ja sakti hai. Us shaam ki tasveerein mere dimaag mein chhap gayi hai. Wo neela aur narangi aasmaan, aasmaan mein udte parinde, tat par logon ki chahal - pahal, ghoda gaadi ka daudna, chai aur chane bechne wale log, wo lehron ka aana aur fir chale jaana, Versova se Madh Island ka dikhna aur in sabhi ke beech tumhari dosti par baatein jo ek sukoon de rahi thi. Us din hum door ho rahe the fir bhi tumhari baaton mein kitni sakaratmakta thi. Usi sakaratmakta ke kaaran main abhi bhi khush hoon. Us din tumne kavita sunai, ek sher sunaya aur ek chhoti si theory jisne hamari mulaqat ka khoobsurat ant kiya. Waise kal maine bhi ek kavita padhi thi. Kavita kuch aisi thi -

Wo ek dost jo bewajah hi ban gaya..!!

School ya college ki buniyaad par nahi,
zindagi aur usooolon ki buniyaad par ban gaya..!

Wo dosti jiski shuruaat to dheemi thi,
par safar haseen sa ban gaya..!

Wo dost jo zindagi ke sabse naye padaav par mila,
jisse rishta purana sa ban gaya..!

Wo ek dost jo bewajah ban gaya.

Pata nahi ye kavita kisne likhi hai lekin mujhe ye acchi lagi isliye likh ke bhej diya. Tumko ye kavita kaisi lagi zarur batana.

Iske alawa Mumbai ka mausam kaisa hai ? Metro mein in dino kya chal raha hai ? Tum abhi bhi metro mein earbuds pehne rehte ho ya nahi ? Tumhari job aur college life kaisi chal rahi hai ? Main bhi kitni pagal hun. Ek saath kitne sawal pooch rahi hoon.

Maine upar kitna kuch likh diya hai Prince. Khair ye to mujhe jo yaad aaya hai likh diya. Iske alawa bhi bahut kuch hai. Umeed hai is email ko tum jaldi hi padhoge aur mujhe reply doge. Waise metro ki mulaqat par tum blog likhne wale the, kya hua uska ? Jab kabhi waqt mile likhte rehna. Mujhe poora yakeen hai, tum metro ki mulaqat ko bade hi acche se likhoge.

Umeed hai email tumko prapt ho gaya hoga aur tum aankhen gadhakar padh rahe honge aur shayad ye email padhkar tum muskura bhi rahe honge. Tum aur tumhara parivaar kaisa hai ? Zarur batana. Pata nahi fir email likh paungi ya nahi lekin is email ke jawab ka intezaar zarur rahega. Ab likhna band kar rahi hoon. Raat ho chuki hai. Bistar intezaar kar raha hai. Bye Prince.

Tumhari metro wali dost
Kavya ( Ek kavita )
Lucknow se













ईमेल पढ़कर मैंने एक गहरी साँस ली। पढ़ने के बाद चेहरा खिल गया। घड़ी देखा तो सात बज रहे थे। काव्या ने जो लखनऊ की फ़ोटोज भेजी थी मैं उन्हें देखने लगा। उसकी फोटोग्राफी में लखनऊ झलक रहा था। लखनऊ की बालकनियां, दरवाज़े, मेट्रो, हुसैनाबाद हेरिटेज वॉक, सड़क किनारे भेल और सब्जी बेचते हुए लोग, एक थका हारा मजदूर आदि फोटोज में दिख रहे थे। 

मैं काव्या के ईमेल का जवाब लिखने लगा। आज न घर जाने की जल्दी थी और न कॉलेज का कोई असाइनमेंट था। मैं आराम से लिखने लगा। मन भी मानो कह रहा हो - 'अभी लिख।' 

मैंने लिखा - 

तुम्हारा ईमेल प्राप्त हुआ काव्या। ये पढ़कर अच्छा लगा कि तुम अपने शहर में यानी नवाबों के शहर लखनऊ में खुश हो। व्हाट्सअप और इंस्टाग्राम की चैटिंग की दुनिया में तुमने मुझे इतना अच्छा ईमेल किया, मुझे बहुत खुशी हुई। पूरा पढ़ने के बाद चेहरे पर मुस्कान आई। पढ़कर ऐसा लगा नहीं कि तुमने पहली बार लिखा है। ऐसा लगा जैसे तुम अक्सर लिखती रहती हो। शायद तुमने ये दिल से लिखा है इसलिए इतना अच्छा लिख पाई हो। 

मैं और मेरा परिवार बिल्कुल ठीक है। मुंबई का मौसम कभी धुप तो कभी बारिश जैसा है। यहाँ सबकुछ ठीक चल रहा है। जिंदगी जैसी चलती है वैसे चल रही है। कभी धुप तो कभी छाव। तुम्हारा पूरा ईमेल पढ़ने के बाद रहा नहीं गया इसलिए लिखने बैठ गया हूँ। 

तुम बहुत अच्छी फोटोग्राफी करती हो यार। मैं इन फोटोज को रेटिंग दुंगा 5 में से 4.5. मुझे जब कभी वक्त मिलता है मैं लिखता हूँ। ठीक वैसे ही तुमको भी जब कभी वक्त मिले फोटोग्राफी किया करो। तुम्हारी इन फोटोज के माध्यम से मैं लखनऊ जैसे शहर को जी पा रहा हूँ। बिल्कुल तुम्हारी तरह खूबसूरत है तुम्हारा ये शहर। लखनऊ की शाम और वर्सोवा पर बिताई गई तुम्हारे साथ की वो शाम मुझे समान लगी। मुझे लगता है दुनिया का हर शहर शाम होते ही और भी ज्यादा खूबसूरत हो जाता है। 

तुम्हारी भेजी हुई कविता पढ़ी। ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने हमारे लिए ही ये कविता लिखी है। लिखा हुआ सटीक और सच लग रहा है। ये पंक्तियां - 'वो एक दोस्त जो बेवजह ही बन गया..!! 
स्कूल या कॉलेज की बुनियाद पर नहीं, 
ज़िन्दगी और उसूलों की बुनियाद पर बन गया..!

ये पंक्तियां मेरे हृदय तक पहुंची। सच कहा तुमने, वर्सोवा के तट पर बिताई गई शाम के बारे में कुछ भी लिखो सब कम पड़ जाएगा। एक ऐसी शाम जहाँ दो दोस्त अलग हुए और भविष्य में मिलेंगे या नहीं इसका भी कुछ कह नहीं सकते। लेकिन हमने वो पल जिया। 

मेट्रो लाइफ भी चल रही है। किसी ने सच ही कहा है - किसी के जाने से दुनिया में कोई परिवर्तन नहीं होता है। आपका पसंदीदा व्यक्ति दूर चला जाएगा फिर भी ये दुनिया वैसे ही चलेगी जैसे रोज चल रही है। लेकिन हाँ उस इंसान के चेहरे पर कुछ दिनों तक मायूसी जरूर छा जाती है। कुछ दिनों तक मुझे मेट्रो में अच्छा ही नहीं लग रहा था। पहले जब 'मरोल नाका' स्टेशन आता था तब मेरी आँखें तुमको ढूंढती थी। ये मेरी आदत सी हो गई थी। लेकिन अब, अब वैसा कुछ नहीं है। अब आँखें नहीं ढूंढती है तुमको। दिल, दिमाग और आँखें सभी को अब जाके अहसास हुआ है कि अब तुम इस मेट्रो में नहीं दिखोगी। लेकिन दिल खुश हो जाता है जब ये पता चलता है कि तुम किसी और शहर की मेट्रो में सफ़र कर रही हो और खुश हो। एयरबड्स फिर से लगाना शुरू कर चुका हूँ। लेकिन जब कभी कोई मुझसे बात करने लगता है तब मैं एयरबड्स कानों से निकाल देता हूँ। तुमने ही कहा था 'एयरबड्स निकालके लोगों की बातें सुना करो।' मैं तुम्हारी उसी बात का पालन कर रहा हूँ। 

जॉब और कॉलेज लाइफ के बीच में, मैं फसा हुआ हूँ। कभी कभी एक ही दिन में कॉलेज भी जाना होता है और ऑफिस भी। कॉलेज में असाइनमेंट सबमिट करो और ऑफिस में स्टोरी लिख के दो। कभी कभी ऐसा लगता है जैसे कॉरपोरेट लाइफ ने क्रिएटिविटी खाली हो। कभी लगता है जैसे कॉलेज और जॉब दोनों ने मेरा एक एक हाथ पकड़ लिया हो और अपनी अपनी दिशा में खींच रही हो और बीच में फसा हुआ मैं। पर यही तो ज़िंदगी है। इसी भट्टी में तो हम सभी को तपना है। आज इसमें तपेंगे तो कल मज़बूत आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ पाएंगे। ये तनाव हमारे लिए सही है। 

मेट्रो की मुलाकातों पर एक चैप्टर लिख चुका हूँ। उस चैप्टर का नाम 'मेट्रो... उन दिनों ( इकिगाई वाली लड़की )' रखा है। आगे के सभी चैप्टर जैसे वक्त मिलेगा लिखते रहूंगा। 'मेट्रो... उन दिनों' को लिखते हुए काफ़ी अच्छा लगा। लिखते वक्त तुम्हारे और मेरे कई सारे संवादों को मैंने मन में फिर दोहराया और मुझे उन संवादों से काफी कुछ सीखने को मिला। उम्मीद है कि तुमको 'मेट्रो... उन दिनों' के सारे चैप्टर पसंद आएंगे। अंतिम चैप्टर 10वा रखूंगा जहां मैं ईमेल का जिक्र भी करूंगा। बिना ईमेल के 'मेट्रो... उन दिनों' अधूरा है। इसी ईमेल के साथ मैं 'मेट्रो... उन दिनों' की सीरीज का अंत करूंगा। 

मैंने तुम्हारे सभी सवालों के जवाब लिख दिए है। तुमसे मिलकर अच्छा लगा काव्या। कुछ ही महीने सही लेकिन एक सच्चा, अच्छा और चेहरे पर नकाब न लगाने वाला दोस्त मुझे मिला। यहाँ अब ईमेल को समाप्त कर रहा हूँ। ढेर सारा प्यार मेरी तरफ़ से। जहाँ भी जाओ अपने काम और विचारों से पहचाने जाओ। 

तुम्हारा मेट्रो वाला दोस्त,
रविंद्र मुंडेतिया
मुंबई से,
With love, peace or hope 
Bye kavya 
Take care 

मैंने भारी मन से ईमेल को समाप्त किया जो कही न कही मुझे करना ही था। पूरा ईमेल एक बार फिर पढ़के मैंने काव्या को भेज दिया। 

मेट्रो... इन दिनों 

ऑफिस से निकलकर 'डी . एन नगर' आ गया और घाटकोपर मेट्रो का इंतज़ार करने लगा। आप लोग सोच रहे होंगे कि 'मेट्रो... इन दिनों' में 'मेट्रो... उन दिनों' की तुलना में कुछ अलग होगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है। 'मेट्रो... इन दिनों' 'मेट्रो... उन दिनों' की तुलना में बिल्कुल समान है। वही मेट्रो की अनाउंसमेंट, लोगों की चहल पहल, किसी नए कपल का मेट्रो में सेल्फी लेना, बच्चों की हँसी, वरिष्ठ नागरिक को देखते ही सीट से उठ जाना, दरवाज़ा बंद होने से पहले अंदर घुसने की होड़, भीड़ में अपनी जगह बनाने की लड़ाई ये तमाम दृश्य 'मेट्रो... इन दिनों' और 'मेट्रो... उन दिनों' को समान बनाए हुए है। 

अगर बात है काव्या की तो उसकी जो कमी है वो धीरे धीरे भर जाएगी। याद है न ट्रेन स्टेशन थ्योरी ? 


समाप्त 


© रविंद्र मुंडेतिया







पहले के नो चैप्टर नीचे दी गई लिंक पर क्लिक करें और पढ़ें।


चैप्टर 1 - काव्या और मेरी पहली मुलाक़ात 

चैप्टर 2 - 'कॉमन' मेट्रो में एक और बात 'कॉमन' 

चैप्टर 3 - 12th के बाद दोनों का एक ही इंट्रेस्ट

चैप्टर 4 - काव्या की यादें और उसकी छोटी सी कहानी

चैप्टर 5 - काव्या का एकतरफा प्यार

चैप्टर 6 - क्यों है ये दिन काव्या के लिए स्पेशल ?

चैप्टर 7 - काव्या और मैं एक छतरी में

चैप्टर 8 - सेकंड लास्ट मुलाकात

चैप्टर 9 - क्या होती है ट्रैन स्टेशन थ्योरी ? 

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