भारत में आध्यात्मिक गुरुओं का बढ़ता प्रभाव
भारत प्राचीन काल से ही एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भूमि रहा है। यहाँ ऋषि-मुनियों, साधुओं और धर्मगुरुओं ने न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को आकार दिया है। इन संतों ने जीवन की कठिनाइयों से जूझते लोगों को आशा, मार्गदर्शन और आत्मबल प्रदान किया। आज भी करोड़ों लोग अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शकों को ईश्वर का रूप मानते हैं। यह भी सच है कि इन गुरुओं ने योग, ध्यान और आंतरिक शांति जैसे मार्गों को लोकप्रिय बनाकर विश्व पटल पर भारत की पहचान को और ऊँचा किया है। लेकिन समय के साथ इन संतों और प्रवचनकर्ताओं की छवि में बड़ा बदलाव आया है। अब ये केवल धार्मिक शिक्षक नहीं रह गए, बल्कि राजनीतिक प्रभावशाली, आर्थिक रूप से सशक्त और समाज पर गहरा मानसिक नियंत्रण रखने वाले व्यक्तित्व बन चुके हैं।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का हालिया बयान, जिसमें उन्होंने कहा कि 75 वर्ष की आयु के बाद नेताओं को सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लेना चाहिए। मोहन भागवत के इस बयान ने राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी। उनकी इस टिप्पणी को लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर इशारा माना जो अब 17 सितंबर 2025 में 75 वर्ष के हो गए। हालांकि बाद में भागवत ने इसे व्यक्तिगत टिप्पणी बताते हुए स्पष्ट किया कि उनका आशय किसी व्यक्ति विशेष से नहीं था। भागवत की 75वीं जयंती पर आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वर धाम सरकार) जैसे लोकप्रिय धर्मगुरु और अन्य आध्यात्मिक नेता शामिल हुए।
धीरेंद्र शास्त्री अपनी भविष्यवाणियों और कथाओं के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने दावा किया कि वे किसी का भी अतीत बता सकते हैं। भारत में एक वक्त ऐसा आया जब चारों ओर धीरेंद्र शास्त्री ही छाए हुए है। उन्होंने हिंदुओं को एकजुट करने के लिए कई यात्राएं निकाली और इन यात्राओं में जाने माने लोग शामिल हुए। इनके धाम में कई मशहूर हस्तियां दस्तक दे चुकी है। हालांकि जब नागपुर में अंधविश्वास-विरोधी कार्यकर्ता श्याम मानव ने इसको लेकर उन्हें चुनौती दी तब वे अचानक कार्यक्रम छोड़कर चले गए। लेकिन इसके बिना भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई और वे खुलेआम हिंदू राष्ट्र जैसे मुद्दों को उठाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी को भी उनके साथ कई बार देखा गया। इससे उनका राजनीतिक महत्व भी झलकता है।
इसी क्रम में बाबा रामदेव का नाम भी अहम है। इनको कैसे भूल सकते है। एक योगगुरु के रूप में शुरुआत करने वाले बाबा रामदेव आज एक विशाल व्यापारी बन चुके है। पतंजलि का कारोबार अरबों में पहुँच चुका है। भाजपा और आरएसएस से उनके करीबी रिश्ते किसी से छिपे नहीं हैं। आपको याद होगा कोविड महामारी के दौरान उन्होंने “कोरोनिल” नामक दवा लॉन्च की थी, जिसे वैज्ञानिक और चिकित्सकीय मान्यता नहीं थी जिसपर आगे चलकर विवाद हुआ और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने उन पर मुकदमा भी किया। आज भी बाबा रामदेव और उनकी कंपनी अक्सर विवादों में रहती है। आज बाबा रामदेव एक योगगुरु या धर्मगुरु होने के बजाय एक सफल व्यापारी है।
श्री श्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग ने आध्यात्मिक ब्रांडिंग को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया है। उनकी सुदर्शन क्रिया आज लाखों लोगों की दिनचर्या का हिस्सा है। लेकिन 2017 में यमुना किनारे आयोजित उनके भव्य कार्यक्रम ने पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुँचाया। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने उन पर जुर्माना लगाया, जिसे देने से उन्होंने इनकार कर दिया। यही विरोधाभास इन गुरुओं की दुनिया को घेरता है। प्रवचन साधना और त्याग के होते हैं लेकिन व्यवहार में राजनीति, दौलत और प्रचार की होड़ दिखती है।
इसी कड़ी में, आसाराम बापू पर बलात्कार और हत्या के गंभीर आरोप लगे और उन्हें सजा भी हुई। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम ने न केवल यौन शोषण किया बल्कि पत्रकार की हत्या भी करवाई। सत्य साईं बाबा के आश्रम में रहस्यमयी हालातों में हत्या हुई। शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती पर भी अपने ही आश्रम में हत्या का आरोप लगा। इसके बावजूद इन्हें समय-समय पर राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा। कभी मोदी आश्रम में जाते दिखे, कभी वाजपेयी मंच साझा करते नजर आए, तो कभी चुनावों में इनका खुला समर्थन मिलता रहा।
इन तमाम धर्मगुरुओं का एक समान गुण यह है कि ये पारंपरिक पुरोहित वर्ग से नहीं आते। इन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। इन सभी ने करिश्माई भाषणों, चमत्कारों और भविष्यवाणी के दावों से जनता को आकर्षित किया। समाज का वह वर्ग, जो असुरक्षा, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता से घिरा है, इन गुरुओं को अपना मार्गदर्शक मान लेता है।
यह भी देखा गया है कि ये संत सीधे तौर पर भाजपा या आरएसएस से जुड़े नहीं होते, लेकिन इनकी विचारधारा जैसे हिंदू राष्ट्रवाद और मुस्लिम धर्म का विरोध करना, संघ की लाइन से मेल खाती है। इस तरह ये संगठनात्मक सदस्यता के बिना ही विचारधारा का विस्तार करते हैं। भारत में अब यह प्रवृत्ति कहीं अधिक गहरी और राजनीतिक रूप से खतरनाक है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जहाँ समाज को विवेक और वैज्ञानिक सोच की ओर बढ़ना चाहिए, वहीं अंधभक्ति और चमत्कारों की संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है। भारत में न जाने कितने तर्कशील लोगों की हत्या कर दी गई। यह हत्या साबित करती है कि आज के भारत में तर्क की आवाज उठाना कितना खतरनाक हो चुका है।
इसलिए ज़रूरी है कि इस प्रवृत्ति का गहन अध्ययन हो। धर्मगुरुओं के आर्थिक स्रोतों, राजनीतिक गठजोड़ और सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन हो। वरना यह खतरा है कि भारत का लोकतंत्र धर्म, बाज़ार और राजनीति के इस त्रिकोण में कहीं खो न जाए। आज समय की मांग है कि देश में विवेक, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूती मिले। हमें ऐसे समाज की ओर बढ़ना चाहिए जहाँ प्रश्न पूछना पाप न हो बल्कि प्रगति का आधार माना जाए। जहाँ धर्म और आध्यात्म जीवन को सहारा दें, लेकिन राजनीति और कारोबार के औजार न बनें। हमें याद रखना होगा कि भारत की असली पहचान संतुलन, सहिष्णुता और तर्कशीलता में रही है। यही कारण है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सबसे बड़ा हथियार बताया, पेरियार ई.वी. रामास्वामी ने अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन चलाया, और हाल के दौर में नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और गौरी लंकेश जैसे लोग तर्क और न्याय की आवाज बनकर खड़े हुए, भले ही इसकी कीमत उन्हें जान देकर चुकानी पड़ी हो।
भारत का भविष्य उन्हीं हाथों में सुरक्षित है जो समाज को अंधभक्ति की बजाय तर्क, शिक्षा और समानता की दिशा में ले जाते हैं। हमें तय करना है कि आने वाली पीढ़ी चमत्कारों और अंधविश्वासों के भरोसे जिएगी या विवेक, मेहनत और ज्ञान के सहारे एक मजबूत लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करेगी। यही हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा अवसर है।
© रविंद्र मुंडेतिया
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