मेट्रो... उन दिनों ( हमारी 'कॉमन' मेट्रो ) - 2
मैं मेट्रो के उस दरवाज़े की ओर मुँह करके खड़ा था जो स्टेशन आने पर खुल रहा था। मेट्रो के अंदर रह रहकर अनाउंसमेंट के बीच में विज्ञापन भी आ रहे थे। कभी विज्ञापन तो कभी किसी बॉलीवुड के नए गाने का प्रमोशन। शहरों में रहने वाले लोग अक्सर विज्ञापनों के बीच ही दिन गुजारते है। देखा जाए तो नाइन टू फाइव जॉब करने वाला व्यक्ति भी एक विज्ञापन ही है। हम सभी अपने आप को बेच ही रहे है। हम सभी क्लाइंट के हाथों अच्छे दामों में बिक जाना चाहते है क्योंकि कंपनी और कंपनी का मालिक यही चाहता है।
"हाय... काव्या!"- मैंने हाथ आगे बढ़ाया।
"हेल्लो... मि. रविंद्र मुंडेरीया!"- उसने हेलो को लंबा खींचा लेकिन बाकी लोगों की तरह उसने भी मेरे उपनाम का उच्चारण गलत किया।
काव्या का हाथ मुलायम था। गेहुंए रंग के उसके हाथों में एक काला धागा बंधा था। उसने आज स्लीवलेस कुर्ती और प्लाजो पहना था। बालों में क्लिप।
"It is not 'Munderiya'. It is 'Mundetiya'. There is 'Ti' not 'Ri'."
"Ooo... Means Mun_ De_ti_ya. Right ?" - उसने मेरे सरनेम के चार टुकड़े किए और मुझसे कन्फर्म किया।
"Yes, अक्सर लोग मेरे सरनेम का उच्चारण पहली बार में गलत ही करते है।"
"तुम्हारा नाम और निक नेम अच्छा है। तुम्हारा नाम प्रिंस क्यों नहीं है ?"
"एक्चुअली जब मेरा नामकरण हो रहा था, उस वक्त वहाँ कोई मॉडर्न व्यक्ति नहीं था जो प्रिंस नाम पंडित को सजेस्ट करें।" - मैं हँस दिया साथ में काव्या भी।
"वैसे तुम हो बड़े छुपेरुस्तम!"- काव्या ने अपनी गर्दन हिलाई और आँखों को थोड़ा बंद करते हुए कहा।
"कैसे ?"
"क्या कैसे, संडे को जब हम मिले तो लिटरेचर पर कितनी बातें की लेकिन तुमने ये नहीं बताया कि मैंने दो किताबें प्रकाशित की है।"
मुझे याद है मैं काव्या से मिला था लेकिन कौन से वार को मिला ये तो मैं भूल चुका था। मेरे दोस्त सही कहते है। वे कहते है रविंद्र जब से तु जॉब पर लगा है एंजॉयमेंट करना भूल गया है, पूरा का पूरा कॉरपोरेट मजदूर बन गया है तु। तेरी जिंदगी रोबोट जैसी बन गई है। सुबह उठो, काम पर जाओ, शाम को ऑफिस से लौटो और सो जाओ, बस इसी में सीमित रह गई है तेरी लाइफ। क्या ये सच है ? मैंने संडे के दिन काव्या से मेट्रो में कुछ देर बातें की। लेकिन शायद दूसरे ही दिन भूल गया और अपनी जॉब लाइफ में व्यस्त हो गया। काव्या ने मुझे मेरे ख्यालों से बाहर निकालने के लिए चुटकी बजाई।
"ओए हेलो... कहाँ खो गए लेखक साहब।"
"कुछ नहीं।"
"मुझे लगा तुम अपनी तीसरी किताब के बारे में सोच रहें हो।"
"ऐसा कुछ नहीं।"
"और अगर ऐसा है भी तो ये अच्छी बात है।"
"संडे के बाद तुम मेट्रो में दिखी नहीं ?"
"प्रिंस, ये सवाल मैं तुमसे पूछने वाली थी।"
"इसका मतलब इन तीन दिनों में हमने वो मेट्रो छोड़ दी जो हमारे लिए 'कॉमन मेट्रो' थी। Right ?"
"Correct."
"तुमको पता है। मैं तुम्हारा सरनेम इसलिए थोड़ा भूल गई क्योंकि तीन दिनों का गैप आ गया।" - काव्या बोलते हुए थोड़ा हँसी।
"अच्छा हुआ गैप लंबा नहीं था वरना..."
"वरना क्या ?"
मैं बोलने वाला था कि वरना तुम मुझे भी भूल जाती लेकिन मैं रुक गया। यहाँ ऐसा कुछ बोलना सेंस नहीं बनता। मैंने कहा -
"वरना तुम मेरा पूरा सरनेम भूल जाती।"- मैंने थोड़ा मुस्कुरा दिया।
"कह सकते हो।"
"वैसे तुम राजस्थानी हो ?"
"हाँ। तुमको कैसे पता ?"
"थोड़ा इन्वेस्टिगेशन तो हम भी कर लेते है लेखक साहब!"- उसने इतराते हुए कहा।
"शायद आप भूल गए हो कि आपकी ही एक किताब के पीछे आपने अपना परिचय दिया हुआ है।"- इस वाक्य को बोलते हुए उसने कुछ अभिनय भी किया।
"अच्छा... याद आया।"
आज तो बातों ही बातों में 'अंधेरी स्टेशन' भी निकल गया। 'आज़ाद नगर' आने वाला था।
"By the Way, तुम्हारा बर्थ प्लेस कहा है ?"
"अगर मैं ना बताओ तो ?"- काव्या ने आँखों को मटकाते हुए कहा।
"तुम ही बता सकती हो। और अगर तुम्हारी भी जानकारी गूगल पर है तो मुझे बताओ, हम सर्च कर लेंगे।"
"No, I am not on Google."
"तो फिर बताओ।"
"I am from Lucknow."
"नवाबों के शहर से हो। लेकिन तुम लगती नहीं हो।"
"तुम भी राजस्थानी लगते नहीं हो।"
"अच्छा... लेकिन मैं तो वही से हूँ।"
"हाँ तो हम भी लखनऊ से है।"
"UP से मेरे कुछ दोस्त है।"
"आधी से ज्यादा मुंबई UP वालों से भरी है।"
"Yaa, Correct. क्योंकि मुंबई रोज़गार देती है।"
"काम देती है लेकिन ज़िंदगी सस्ती कर देती है।"- काव्या ने कहा।
मैं अब आगे क्या बोलू ? इसमें कोई शक नहीं है कि मुंबई ज़िंदगी सस्ती कर देती है। स्टेशनों पर दिखाई देने वाली भीड़ यही दर्शाती है।
"ओके, मेरा स्टेशन आने वाला हैं काव्या।"
"तुमको पता है प्रिंस, हम दोनों में एक चीज़ 'कॉमन' है ?"
"कौनसी ?"
"मैं क्यों बताऊँ ? तुमने भी तो अपना नाम मुझे नहीं बताया था।"
'डी.एन नगर' स्टेशन आ चुका था। मेट्रो धीरे हो गई थी। बस दरवाज़े खुलने वाले थे।
"लेकिन मैंने नाम जानने का रास्ता बताया था।" - मैंने कहा।
मेट्रो के दरवाज़े खुल गए थे। लोग बाहर निकल रहे थे। दरवाज़े खुलने पर बाहर की दुनिया का शोर मेट्रो के अंदर आया। मैं वो 'कॉमन' चीज़ जानने के लिए और थोड़ी जिद्द करने वाला था लेकिन स्टेशन आ चुका था।
"Bye Prince. Think about what could be 'common'. This is your assignment."- काव्या ने एक मीठी सी हँसी होठों पर लाते हुए कहा। बोलते वक्त बालों की एक लट काव्या के चेहरे पर आ गई। उसने बालों की लट को कान के पीछे रख दिया। मेरे चेहरे पर हँसी भी थी और एक गहरी सोच कि क्या हो सकती है वो 'कॉमन' चीज़। मैं बस "बाय" कहकर, मेट्रो का दरवाज़ा बंद होने के 2 सेकंड पहले मेट्रो से निकल गया।
'क्या हो सकती है 'कॉमन' चीज़।' - दिमाग़ ने दोहराया जब में एस्केलेटर से नीचे उतर रहा था।
© रविंद्र मुंडेतिया
( 'मेट्रो... उन दिनों' की कहानी अभी जारी है...
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बहुत अच्छा लिखा है।
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