मेट्रो...उन दिनों ( काव्या का स्पेशल दिन ) - 6
वर्तमान ( वर्तमान की थोड़ी सी कहानी यहाँ से शुरू हुई थी। ) "कोई ऐसे ही इतनी अच्छी ड्रेस थोड़ी न पहनता है। कुछ स्पेशल है क्या आज ?"- उसने दुप्पटे के एक छोर को उठाया और अपने कंधे पर रख दिया। "तुमको ऐसा क्यों लग रहा है भला ?"- उसने कंधे उचकाते हुए कहा। "तुमको देखकर लग रहा है।" "कोई इंसान बिना किसी वजह के नई ड्रेस नहीं पहन सकता क्या ?"- यह कहते हुए उसने अपनी गर्दन हिलाई जिससे उसके कानों में झूल रहे झुमकों ने आवाज़ की। "पहन सकता है।" "हाँ तो मैंने भी पहन लिया।" - काव्या ने कहा। "ओके... मुझे ऐसा लगा कि कुछ ख़ास हो सकता है।"- उसने मेरी ओर तिरछी नज़र से देखा और मुस्कुराने लगी। 'मरोल नाका' के बाद भीड़ तो कम हुई पर ज्यादा नहीं। अभी भी मेट्रो में लोग थे। काव्या और मेरे बीच में थोड़ी भी जगह नहीं बची थी। "तुमको पता है। ऐसे दुप्पटे राजस्थानी लड़कियाँ बहुत इस्तेमाल करती है।"- मैंने कहा। "ह्म्म... अच्छा है ये कपड़ा।"- उसने दुप्पटे के कपड़े की क्वालिटी देखने के लिए दुप्पटा मेरे हाथ में दिया। ...