Posts

Showing posts from July, 2025

मेट्रो...उन दिनों ( काव्या का स्पेशल दिन ) - 6

Image
  वर्तमान   ( वर्तमान की थोड़ी सी कहानी यहाँ से शुरू हुई थी। ) "कोई ऐसे ही इतनी अच्छी ड्रेस थोड़ी न पहनता है। कुछ स्पेशल है क्या आज ?"- उसने दुप्पटे के एक छोर को उठाया और अपने कंधे पर रख दिया।  "तुमको ऐसा क्यों लग रहा है भला ?"- उसने कंधे उचकाते हुए कहा। "तुमको देखकर लग रहा है।" "कोई इंसान बिना किसी वजह के नई ड्रेस नहीं पहन सकता क्या ?"- यह कहते हुए उसने अपनी गर्दन हिलाई जिससे उसके कानों में झूल रहे झुमकों ने आवाज़ की।  "पहन सकता है।" "हाँ तो मैंने भी पहन लिया।" - काव्या ने कहा। "ओके... मुझे ऐसा लगा कि कुछ ख़ास हो सकता है।"- उसने मेरी ओर तिरछी नज़र से देखा और मुस्कुराने लगी।  'मरोल नाका' के बाद भीड़ तो कम हुई पर ज्यादा नहीं। अभी भी मेट्रो में लोग थे। काव्या और मेरे बीच में थोड़ी भी जगह नहीं बची थी।  "तुमको पता है। ऐसे दुप्पटे राजस्थानी लड़कियाँ बहुत इस्तेमाल करती है।"- मैंने कहा। "ह्म्म... अच्छा है ये कपड़ा।"- उसने दुप्पटे के कपड़े की क्वालिटी देखने के लिए दुप्पटा मेरे हाथ में दिया।  ...

मेट्रो... उन दिनों ( प्यार क्या है ? ) - 5

Image
"सो फाइनली, तुम ग्रेजुएट हो गए।" - काव्या ने कहा। "Yessssss.... काव्या जी।"- 'काव्या जी' बोलते वक्त मैंने उसकी आँखों में देखा। "जी!"- उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।  "तुमको याद था मेरे कन्वोकेशन के बारे में ?"- मैंने कहा।  "हाँ, मैं जल्दी भूलती नहीं हूँ। कन्वोकेशन में सभी दोस्त आए होंगे ?" "हाँ, लगभग सभी।" "तुमने फोटोज़ क्लिक की ?" "ज्यादा नहीं, लगभग ना के बराबर फोटोज़ क्लिक की।" "क्यों ? तुमको तो फोटोज़ का शौक भी है।"- काव्या ने कहा। "मेरे बाकी क्लासमेट्स ने फोटोज़ निकाली लेकिन मैंने नहीं।" "पर क्यों ?" "Actually I was miss my one friend."- ये कहने के बाद मैं दूसरी ओर देखने लगा।  "सिर्फ एक दोस्त नहीं आया तो तुमने एंजॉयमेंट भी नहीं किया।" "ख़ास दोस्त है इसीलिए। और बाकी सब तो उस दिन अपने अपने ग्रुप के लोगों के साथ फोटोज़ क्लिक करने में लगे थे।" "तो तुमको भी उनके बीच चला जाना चाहिए था।" "मैंने सोचा था, लेकिन कर नहीं पाया। बस खड़...

मेट्रो... उन दिनों ( कहानी काव्या की ) - 4

Image
  बस अपना ही गम देखा है। तूने कितना कम देखा है। मुंबई, अगर इस शहर में जीना है, तो व्यक्ति को धक्के खाना और भीड़ में अपनी जगह बनाना सीख ही लेना चाहिए। यहाँ हर दिन न जाने कितने लोग आपसे टकराते हैं और साथ में सफ़र करते है। सड़कों पर, लोकल में, बस में और मेट्रो में, हर जगह लोग ही लोग है। सभी एक साथ सफ़र करते है लेकिन एक दूसरे से अंजान है। हर चेहरे के पीछे छुपी होती है एक अनकही कहानी। हर किसी के पास अपनी परेशानियाँ, अपनी जद्दोजहद और उम्मीदों से भरी एक दुनिया है। मैं भी इस अनंत भीड़ का एक हिस्सा हूँ और आप भी। हम सब एक ही शहर की लहर में बह रहे हैं, जहां रिश्ते कम, रफ्तार ज़्यादा है। ( अपने हिस्से की जगह लिए लोग ) काव्या और मैं मेट्रो का ग्रेब हैंडल पकड़े खड़े थे। वो ग्रीन टॉप और ब्ल्यू जींस पहनी थीं। उसको देखकर कभी ऐसा लगता नहीं है कि वो वीडियो एडिटर है। मैंने आज तक वीडियो  एडिटर सिर्फ़ लड़कों को ही देखा है। काव्या मुझे उसके द्वारा एडिट किए हुए वीडियो बता रही थी। वो एक लोकप्रिय पॉडकास्टर के चैनल के लिए वीडियो एडिट करती है।  काव्या अंतिम बार रविवार को मिली थी जब मेरा एक एयरबड्स उसक...

मेट्रो... उन दिनों ( 'BMM' ग्रेजुएट लड़की ) - 3

Image
रविवार था लिहाज़ा मेट्रो में भीड़ बहुत कम थी। आज बैठने की सीट मिल गई। मेट्रो निर्धारित समय पर थी। 'This train terminate at versova station.' मेट्रो में रोज़ की तरह अनाउंसमेंट हो रही थी। नए यात्रियों के लिए सुनने लायक और रोज़ सफ़र करने वालों के लिए नजरअंदाज करने लायक। मैंने भी हर बार की तरह नजरअंदाज कर दिया। मेट्रो में बैठें ज्यादा लोग फोन में व्यस्त हो गए। इसके अलावा जिनके साथ अपने दोस्त और रिश्तेदार थे वे बातों में व्यस्त हो गए।  ( किसी एक रविवार की तस्वीर ) मैं 'मरोल नाका' स्टेशन का इंतजार कर रहा था। और उससे भी ज्यादा काव्या का। 'मरोल नाका' स्टेशन का आना तो निश्चित है लेकिन काव्या आज भी मिलेगी या नहीं, इस बारे में कुछ कह नहीं सकते। अंतिम बार गुरुवार को मिली। "हम दोनों में एक चीज़ कॉमन है।" बस यह कहकर उसने उस दिन बाय कह दिया था। मैं उस दिन के बाद अभी तक उस 'कॉमन' चीज़ का अनुमान लगा रहा हूँ। काफ़ी सोचने के बाद मैंने कुछ चीजें एक तरफ़ की जो मुझे दोनों में 'कॉमन' लगी। शुक्रवार को वो नहीं मिली थी और शनिवार को मिलना नामुमकिन है क्योंकि उस दि...