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Showing posts from November, 2025

हम सबको रेशम का कीड़ा क्यों बनना चाहिए ?

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  ये कौन लोग हैं जो बम बनाते हैं ? इनसे अच्छे तो कीड़े है जो रेशम बनाते हैं। मैं अक्सर सोचता हूँ, क्या हमारे जीवन का मतलब सच में मंज़िल तक पहुँचना है या फिर ये सफ़र ही असल जीवन है ? जब कभी शहतूत की डाल पर रेंगते किसी रेशम के कीड़े को देखता हूँ, तो उसकी तन्मयता में दुनिया का सबसे बड़ा राज़ छिपा लगता है। वह चुपचाप बस चलता जाता, एक-एक पल को जीता, कड़कड़ाहट की दुनिया से अलग खुद की दुनिया में खोया हुआ। कोई लालच नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, बस निरंतर कर्म। हम सभी ये चाहते हैं कि हमारे प्रयासों का फल स्वयं देखें, उसे चखें, महसूस करें। पर रेशम का कीड़ा तो बिना शिकायत, बिना उम्मीद के काम करता है। उसने मान लिया है कि उसकी मेहनत का सबसे खूबसूरत पर्दा उसके जाने के बाद ही तैयार होता है। कभी-कभी सोचता हूँ, अगर इंसान भी अपने कर्मों का परिणाम देखने के मोह से ऊपर उठ जाए, तो शायद उसकी जिंदगी ज्यादा सच्ची और सुंदर बन सकती है। एक दूसरे मोड़ पर तितली उड़ती दिखाई देती है। उसकी चमक, उसके रंग सबको आकर्षित कर लेते हैं। वह अपने रंगों से इस दुनिया को खुशियों की सौगात देती है। अपने नाम में बस मुस्कानों का मायाजाल छ...

मर्द को भी दर्द होता है।

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  हमारे घरों में एक चेहरा हमेशा स्थिर दिखता है जो कभी थकता नहीं, कभी टूटता नहीं। वो चेहरा आपके पिता का हो सकता है, आपके पति का हो सकता है, आपके भाई का हो सकता है या बेटे का हो सकता है। लेकिन क्या कभी हमने रुककर सोचा कि उनकी मुस्कान के पीछे कितनी थकान छिपी होती है ? हमारे समाज ने पुरुषों के लिए एक अदृश्य ढांचा बना दिया है जिसमें कठोरता, जिम्मेदारी और सहनशीलता शामिल है। उन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है कि “लड़के रोते नहीं”, “मर्द को दर्द नहीं होता।” नतीजा यह होता है कि जब वे सच में परेशान या किसी मुसीबत में होते है, तो भी चुप रहते हैं। वे अपनी भावनाओं की दीवार के पीछे छिप जाते हैं, ताकि कोई उन्हें कमजोर न कह दे। लेकिन क्या ताकत सिर्फ शरीर की होती है ? या दर्द छिपा लेना ही साहस है ? शायद नहीं। असली ताकत तो तब दिखती है जब कोई इंसान अपने डर, अपनी कमजोरी और अपने आँसुओं को स्वीकार करता है। हर घर में एक ऐसा पुरुष ज़रूर होता है, जो बिना कुछ कहे हर ज़िम्मेदारी निभाता है। सुबह से देर रात तक काम करने वाला पिता, जो अपनी थकान छिपाकर बच्चों को मुस्कान देता है। वह पति, जो चुपचाप घर के खर्चों की चि...

टिफिन

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ऑफिस में हलचल शुरू हो गई थी। ये लंच का टाइम था। खाने की खुशबू आ रही थी। सारे लोग टिफिन लिए उस बड़े से केबिन की ओर बढ़ रहे थे जहाँ खाना खाया जाता है। मैं अपनी डेस्क पर बैठा काम में व्यस्त था। अभी वो लोग नहीं खा रहे थे जिनके साथ मैं अक्सर खाना खाया करता हूँ।  कुछ देर बाद वो मेरे केबिन के डोर पर आकर खड़ी हो गई और बोली "ओय, खाना नहीं खाना क्या ?" उसने खाने का न्योता दिया जो अक्सर वो देती है। हम दोनों खाने से पहले एक-दूसरे को लंच का न्योता देते हैं। मैं अचानक अपने खोए हुए काम से बाहर निकलता हूँ और जवाब देता हूँ "हाँ खाते है न। बस दो मिनट रुक यार। काम खत्म करता हूँ और आता हूँ।" वो हल्की सी स्माइल करती है और अपने बैग में से टिफिन निकालने लगती है।  मैं उससे पूछता हूँ "आज क्या लाई है खाने में ?" उसने कहा "करेला" "अरे यार। करेला मुझे नहीं पसंद।"- मैंने मुँह सिकुड़ते हुए कहा। "तुम क्या लाए हो ?"- उसने पूछा। "लौकी की सब्जी।"- मैंने फिर मुँह सिकुड़ते हुए कहा क्योंकि मुझे लौकी भी नहीं पसंद।  "आज करेला ही ट्राई करो। और वैसे भी...