हम सबको रेशम का कीड़ा क्यों बनना चाहिए ?
ये कौन लोग हैं जो बम बनाते हैं ? इनसे अच्छे तो कीड़े है जो रेशम बनाते हैं। मैं अक्सर सोचता हूँ, क्या हमारे जीवन का मतलब सच में मंज़िल तक पहुँचना है या फिर ये सफ़र ही असल जीवन है ? जब कभी शहतूत की डाल पर रेंगते किसी रेशम के कीड़े को देखता हूँ, तो उसकी तन्मयता में दुनिया का सबसे बड़ा राज़ छिपा लगता है। वह चुपचाप बस चलता जाता, एक-एक पल को जीता, कड़कड़ाहट की दुनिया से अलग खुद की दुनिया में खोया हुआ। कोई लालच नहीं, कोई अपेक्षा नहीं, बस निरंतर कर्म। हम सभी ये चाहते हैं कि हमारे प्रयासों का फल स्वयं देखें, उसे चखें, महसूस करें। पर रेशम का कीड़ा तो बिना शिकायत, बिना उम्मीद के काम करता है। उसने मान लिया है कि उसकी मेहनत का सबसे खूबसूरत पर्दा उसके जाने के बाद ही तैयार होता है। कभी-कभी सोचता हूँ, अगर इंसान भी अपने कर्मों का परिणाम देखने के मोह से ऊपर उठ जाए, तो शायद उसकी जिंदगी ज्यादा सच्ची और सुंदर बन सकती है। एक दूसरे मोड़ पर तितली उड़ती दिखाई देती है। उसकी चमक, उसके रंग सबको आकर्षित कर लेते हैं। वह अपने रंगों से इस दुनिया को खुशियों की सौगात देती है। अपने नाम में बस मुस्कानों का मायाजाल छ...