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Showing posts from January, 2023

स्मार्टफोने मे कैद बचपन

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     आज स्मार्टफोन और इंटरनेट ने पूरी दुनिया को एक-दुसरे से जोड़ रखा है। जानकारी का आदान-प्रदान बड़ी आसानी से हो जाता है। मगर रफ्तार के इस युग में एवं तेजी से बढ़ते स्मार्टफोन और इंटरनेट ने बच्चों के बचपन पर भी असर डाला है। खेलकूद की उम्र में बच्चे अब एक जगह बैठकर वीडियो गेम खेलने में व्यस्त हो गए हैं।                            Image from  https://images.app.goo.gl/KjR3aWcDJWwftAgy7      यह गेम अब बच्चों को भाने भी लगे हैं। बच्चों का मोबाइल फ़ोन के प्रति क्रेज कोरोना काल में या उसके बाद से ज्यादा देखने को मिला। बच्चों की यह लत अब ऐसी बढ़ चुकी है कि कहीं सारे अभिभावकों को अब साइकोलॉजिस्ट के चक्कर तक काटने पड़ रहे हैं। यह लत बच्चों को अपने माता-पिता, दोस्त और पढ़ाई से दूर कर रही है। उनका ध्यान भटकाकर अनावश्यक चीजों में लगा रही है जो उनके विचारों और व्यवहार में देखने को भी मिल रहा है।                       ...

बनारस घाट पर एक शाम

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(  Image : Adobe stock ) यूं  तो मुंबई शहर मुझे हमेशा से ही अच्छा लगता है। ये शहर मेरे दिल में बसा हुआ है क्योंकि ये मेरी कर्मभूमी है। मैं यहां पिछले तीन साल से एडवरटाइजिंग एजेंसी में काम कर रहा हूं। लेकिन कभी कभी काम का तनाव कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है। मैंने अपने दोस्त को इस तनाव भरी ज़िन्दगी के बारे में बताया। उसने सीधा एक रास्ता मुझे बता दिया। उसने कुछ दिनों के लिए मुझे बनारस आने का न्योता दे दिया। मैं इस न्योते को इंकार ना कर सका। मैंने जॉब से कुछ दिनों की छुट्टियां ले ली। मैं  बनारस सुरक्षित पहुंच गया था। इस पवित्र शहर को बनारस, वाराणसी, काशी तीनों नामों से जाना जाता है। इस सुंदर से शहर को लोग 'महादेव की नगरी' भी कहते है। मैं अब बनारस की गोद में खड़ा था, जहां की हवा, मिट्टी, पानी सबकुछ एक अलग अहसास दिला रही थी। ये नगरी हिंदी साहित्यकारों, कवि, लेखक, संगीतकारों और अनेक कलाकारों की जननी भी रही है। बनारस  में अनेकों घाट है, लेकिन मेरे लिए अस्सी घाट सबसे नजदीक था क्योंकि मेरा मित्र इस घाट के करीब ही रहता है। मैं अकेला ही अस्सी घाट की तरफ चल दिया। ये पहली बार हुआ जब म...

ये अंधेरा घना छाया हुआ

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ये अंधेरा घना छाया हुआ ( प्रेरणादायक कविता )       हम सब हमारी जिंदगी में किसी ना किसी लक्ष्य का पीछा जरूर करते हैं। इस लक्ष्य को हासिल करने मेंं कई दफा हमको असफलताओं का सामना भी करना पड़ता है, जोकि जरुरी भी है। कुछ लोग इन असफलताओं से लड़कर आगे बढ़़ जाते है तो कुछ लोग डिमोटिवेट होकर हार मान लेते हैं और घर के किसी एक कोने मेंं बैठकर दिन का गुजारा करने लगते हैं। इसी ख्याल को लेकर एक कविता लिखी गई है।                 picture from : unsplash.com    https://unsplash.com/s/photos/success ये अंधेरा घना छाया हुआ  अंधेरे से कब तक डरोगे ?  रखो कदम बाहर की दुनिया मे, यू चार दिवारी मे कब तक रहोगे ? जलना है तुम्हे अब इस भट्टी मे , मजबुत रखो दिल अपना । स्पष्ट नही यहाँ आगे बढ़ना , जटिल बहुत है रास्ता अपना । क्यो डरते हो जमाने से ? जमाने की परवाह मत करो । चार लोग क्या कहेंगे, ये सोचकर , वक्त की बर्बादी मत करो ।  उठो अभी, कदम बढ़ाओ , वक्त की कमी बहुत है । सफ़र तुम्हारा विशाल होगा , यहाँ मुसाफिरो की भीड़ बहुत है । कही...

गोरा उपन्यास का सारांश

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     रवींद्रनाथ टैगोर के सर्वश्रेष्ठ उपन्यास गोरा का सारांश।      उपन्यास में गोरा मुख्य पात्र है। गोरा कट्टर हिन्दू ब्राह्मण है। उनके पिता का नाम कृष्णदयाल है। माता का नाम आनंदमयी हैं। गोरा ब्राह्मणत्व को बनाए रखने की कोशिश करता है। आसपास के लोग गोरा को महान मानते है और युवा तो उन्हें गुरु मानते है।       गोरा छुआ-छूत और जाति में विश्वास करता है। गोरा बचपन में अपनी नौकरानी लक्षमिनिया के हाथों पानी भी नहीं पिया करता था। लक्षमिनिया के माँ के कमरे में जाने पर गोरा अपनी माँ के कमरे में भी नहीं जाता था।       गोरा का एक दोस्त है जिसका नाम विनय है। विनय को अपनी सौतेली माँ से प्यार कभी नहीं मिला लेकिन गोरा की माँ ने विनय को भी अपने बेटे की तरह ही प्रेम किया और इसी कारण विनय हमेशा गोरा के घर आता जाता रहता है। गोरा के विचार, ब्राह्मण समाज के प्रति इतनी सेवा देख, निष्ठा देख विनय भी गोरा के मार्ग पर चलने लगा। कुछ दिनों बाद विनय को एक ब्रम्ह समाज में विश्वास करने वाले परेश बाबू की बेटी ललिता से प्रेम हो जाता है। विनय...