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Showing posts from August, 2025

मेट्रो... उन दिनों ( काव्या का ईमेल ) - 10

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  लोग आते है और चले जाते है। कुछ ही दिनों का सही लेकिन कभी कभी एक इंसान आपको बहुत कुछ सिखा के चला जाता है। हम सभी का एक दूसरे से मिलना हमारे हाथ में नहीं होता है। 'हम मिलते है' बस यही सच्चाई है। किसी नए व्यक्ति से अचानक मुलाकात होना तो सामान्य सी बात है लेकिन उसकी और हमारी वाइब मैच होना कुछ अलग ही बात होती है। ऑफिस के काम के चलते मैंने अपना ईमेल खोल रखा था। केबिन में कोई नहीं था। ऑफिस में कुछ ही लोग बचे थे बाकी घर चले गए थे। शाम हो चुकी थी। मेरी नज़र एक मेल पर पड़ी जिसमें शुरुआती नाम काव्या लिखा हुआ था। ये ईमेल कल आया था। मुझे याद आया कि काव्या ने ईमेल लिखने का कहा था। उसने कहा था कि वो लखनऊ जाने के बाद ईमेल करेगी और कल उसने ईमेल कर दिया।  मैंने ईमेल खोला। व्हाट्सअप लैंग्वेज में एक लंबा सा ईमेल काव्या ने लिखा था साथ ही उसने लखनऊ की तमाम तस्वीरें भी भेजी थी। मैंने ईमेल पढ़ना शुरू किया - Kaise ho Prince ? Umeed hai tumhari sehat acchi hogi aur tum aise hi muskura rahe honge jaise maine hamesha tumko dekha hai. Wo hasi aur tumhara mazakia andaaz abhi bhi yaad aata hai yaar. Na ja...

मेट्रो... उन दिनों ( 'ट्रेन - स्टेशन थ्योरी' ) - 9

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  वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड देके छोड़ना अच्छा है। वर्सोवा बीच बहुत शांत था। बहुत कम लोग थे आज तट पर। शाम का वक्त था। मेरे हाथ में बैग था। मैं ऑफिस से सीधा यहाँ आ गया था। आज लेट नहीं होना चाहता था क्योंकि ये मेरी काव्या के साथ अंतिम मुलाक़ात थी। पिछली बार उसके बर्थडे के दिन मैं लेट हो गया था। मैं कुछ देर इस विशाल से समुद्र को देखता रहा। ये एक अच्छी बात थी कि आज आसमान में बादल नहीं थे। तट से कुछ दूर स्थानीय बच्चें क्रिकेट खेल रहे थे। मैं जहाँ खड़ा था उसी जगह बैठ गया। मैंने अपना बैग साइड में रख दिया और काव्या का इंतज़ार करने लगा।  काव्या ने छः बजे का टाइम दिया था। मैं उससे पहले आ गया। लेकिन अब तो छः बज गए थे। वो अभी तक नहीं आई थी। मैं रह - रहकर पीछे देख लेता था इस उम्मीद में कि इस बार पीछे मुड़ने पर वो दिख जाए। मैं वक्त गुजारने के लिए तट की रेत को मुट्ठी में भरके उसे हवा में उड़ा रहा था। मुट्ठी से निकली रेत दक्षिण दिशा की ओर उड़ी जा रही थी। वजन में भारी कण उसी जगह गिर रहे थे। जो बारीक कण थे वो उड़ जा रहे थे। ये प्रक्रिया मैं कुछ मिनटों तक करता र...

मेट्रो... उन दिनों ( सेकंड लास्ट मुलाकात ) - 8

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  मेट्रो में दो लोग लड़ रहे थे। भीड़ में मेट्रो में चढ़ते वक्त दोनों आपस में टकरा गए थे इसलिए लड़कर मुद्दा सुलझा रहे थे। उन दोनों की तू तू मैं मैं हल्की फुल्की गाली गलौज तक पहुंच ही रही थी कि एक का स्टेशन आ गया। वो उतर गया। दूसरा बचा हुआ आदमी अपनी कहानी बता रहा था लेकिन वो वाला हिस्सा हटा के जिसमें वो विलेन था।  खैर ये तो मेट्रो में अक्सर होता रहता है। कभी कोई सीट के लिए लड़ जाता है, कभी कोई धक्का लगने पर लड़ जाता है, कभी कोई स्वस्थ व्यक्ति भी दिव्यांग सीट के लिए लड़ जाता है। ये सब रोज की कहानी है। लेकिन मंजे हुए लोग वे है जो दूसरों को भी जगह दे देते है और खुद इतनी भीड़ में भी खड़े हो जाते है वो भी बिना किसी से झगड़ा किए।  मैं हर रोज की तरह मेट्रो में खड़ा था। एक हाथ मेट्रो का ग्रेब हैंडल पकड़ा हुआ था और दूसरा जेब में। कान में एयरबड्स लगे हुए थे। मेट्रो में लोग क्या बातें कर रहे थे ये मुझे नहीं पता और न सिर्फ मुझे बल्कि उन तमाम लोगों को नहीं पता जो मेरी ही तरह काम में एयरबड्स ठुसे हुए थे।  काव्या ने आते ही मेरे कान से एयरबड्स निकाले और मेरे हाथ में थमा दिए। "Very goo...

मेट्रो... उन दिनों ( जन्मदिन मुबारक हो काव्या ) - 7

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  शाम का समय  मैं ऑफिस में अपनी डेस्क के सामने बैठा स्टोरी लिख रहा था जिसे अर्जेंट ब्यूरो चीफ़ को भेजना था। विक्रम अपनी डेस्क पर बैठा अपनी प्रेमिका से बतिया रहा था। जब कभी उसके पास काम नहीं रहता वो अपनी प्रेमिका से बतियाने लगता है। वो कहता है मेरे लिए ये भी एक काम है। कुर्सी पर आराम से एक तरफ झुक के बैठ जाना, कोहनी को कुर्सी के हत्थे पर टिका देना और फिर चक्के वाली कुर्सी को धीरे धीरे पैरों से कभी दाएं तो कभी बाएं घुमाना, बस यही सब दो प्रेमियों की बातों को खास बना देता है। चक्के वाली कुर्सी जितनी ज्यादा और स्मूद घूमती, समझ लो विक्रम और उसकी प्रेमिका के बीच बातें उतनी ही रोमांटिक होती। मैं अक्सर उन दोनों के बीच होने वाली बातों पर मुस्कुरा देता हूँ और सोचता हूँ कि क्या प्यार में हर व्यक्ति एक बच्चा बन जाता है ? मुझे इसका जवाब "हाँ" ही लगता है क्योंकि मैंने प्रेम में डूबे हर व्यक्ति को कुछ ऐसा ही पाया है।  मैंने अपने कंप्यूटर की स्क्रीन पर टाइम देखा। साढ़े आठ बजने में अभी पांच मिनट बाकी थे। मैंने आराम की सांस की छोड़ी क्योंकि अब मेरे पास कोई पेंडिंग काम नहीं बचा था। लेकिन तभी...